Friday , 1 May 2026

इंजीनियर पर कीचड़ उछालना पड़ा भारी : नितेश राणे को एक महीने की जेल, क्या है पूरा मामला?

मुंबई/सिंधुदुर्ग: महाराष्ट्र की राजनीति के फायरब्रांड नेता और भाजपा विधायक नितेश राणे एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गए हैं। साल 2019 के बहुचर्चित ‘कीचड़ कांड’ में सिंधुदुर्ग की एक अदालत ने सोमवार, 27 अप्रैल 2026 को बड़ा फैसला सुनाते हुए उन्हें दोषी करार दिया है। हालांकि, सजा के साथ-साथ उन्हें कानूनी राहत भी मिल गई है।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद 4 जुलाई 2019 का है, जब नितेश राणे कांग्रेस में हुआ करते थे। उस समय मुंबई-गोवा महामार्ग के खराब काम और जलभराव से नाराज होकर उन्होंने समर्थकों के साथ कनकवली में एनएचएआई (NHAI) के उप-अभियंता प्रकाश शेडेकर पर सार्वजनिक रूप से कीचड़ फेंक दिया था। इतना ही नहीं, उन्हें पुल से बांधने की कोशिश भी की गई थी।

अदालत का फैसला और सजा

सिंधुदुर्ग की अतिरिक्त सत्र अदालत के न्यायाधीश वी.एस. देशमुख ने इस कृत्य को ‘सत्ता का दुरुपयोग’ और सरकारी कर्मचारी का अपमान माना।

  • सजा: अदालत ने नितेश राणे को एक महीने के साधारण कारावास और 1 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।

  • राहत: सजा सुनाने के तुरंत बाद अदालत ने इसे स्थगित (Suspend) कर दिया। इससे राणे को ऊपरी अदालत में अपील करने के लिए समय मिल गया है, जिसका मतलब है कि उन्हें फिलहाल जेल नहीं जाना होगा।

  • बाकी आरोपी: इस मामले में उनके साथ 29 अन्य लोग भी आरोपी थे, जिन्हें सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया है।

विवादों से पुराना नाता

नितेश राणे केवल इस कानूनी मामले तक सीमित नहीं हैं। वे अपने आक्रामक तेवरों और विवादित बयानों के लिए भी जाने जाते हैं:

  1. मदरसों पर टिप्पणी: हाल ही में उन्होंने मदरसों को लेकर तीखे बयान दिए, जिसमें उन्होंने वहां दी जाने वाली शिक्षा पर सवाल उठाए। उनके इस बयान पर विपक्ष और सामाजिक संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई थी।

  2. नाम बदलने की मांग: उन्होंने महाराष्ट्र के ‘इस्लामपुर’ का नाम बदलकर ‘ईश्वरपुर’ करने की वकालत की है, जिसे लेकर राज्य की राजनीति में काफी बहस छिड़ गई है।

  3. विरोधियों को चुनौती: अपने भाषणों में वे अक्सर “सख्ती के दौर” का जिक्र करते हुए अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को सीधी चुनौती देते नजर आते हैं।

आगे क्या?

अदालत के इस फैसले ने राणे के लिए कानूनी मुश्किलें तो खड़ी की हैं, लेकिन निलंबन के कारण उन्हें फौरी राहत मिली हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में वे इस फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं। फिलहाल, यह देखना होगा कि यह कानूनी लड़ाई उनके राजनीतिक भविष्य को किस तरह प्रभावित करती है।

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