कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के महामुकाबले का अंतिम परिणाम आने में अब कुछ ही घंटे शेष हैं। 4 मई को होने वाली मतगणना से पहले देश की तमाम बड़ी एजेंसियों के एग्जिट पोल ने सियासी गलियारों में भूकंप ला दिया है। अधिकांश एग्जिट पोल बंगाल में कमल खिलने और ममता बनर्जी की विदाई की भविष्यवाणी कर रहे हैं। अगर ये आंकड़े हकीकत में बदलते हैं, तो यह न केवल बंगाल बल्कि देश की राजनीति के लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित होगा।
विपक्ष का ‘पावर सेंटर’ खतरे में: क्या बिखर जाएगी एकजुटता?
ममता बनर्जी मौजूदा समय में देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्ष का सबसे मजबूत और मुखर चेहरा मानी जाती हैं। बंगाल का यह चुनाव केवल दीदी बनाम मोदी नहीं, बल्कि पूरे विपक्ष की साख का सवाल बन गया है। उत्तर प्रदेश से अखिलेश यादव, बिहार से तेजस्वी यादव और दिल्ली से अरविंद केजरीवाल ने ममता के समर्थन में पूरी ताकत झोंकी थी। जानकारों का मानना है कि यदि ममता की हार होती है, तो यह केवल टीएमसी की नहीं, बल्कि उन तमाम क्षेत्रीय क्षत्रपों की हार मानी जाएगी जो 2029 की तैयारी में जुटे हैं।
सत्ता गई तो टीएमसी को बचाना होगा बड़ी चुनौती
तृणमूल कांग्रेस के लिए सत्ता से बाहर होना एक अस्तित्व का संकट भी पैदा कर सकता है। जिस तरह 2011 में वामपंथियों की हार के बाद कैडर और बड़े नेता टीएमसी में शामिल हो गए थे, वही खतरा अब ममता की पार्टी पर मंडरा रहा है। हार की स्थिति में टीएमसी के भीतर ‘पुराने बनाम नए’ नेताओं का टकराव तेज हो सकता है। विशेष रूप से अभिषेक बनर्जी की रणनीति और उनके नेतृत्व पर सवाल उठने तय हैं। हालांकि, ममता बनर्जी को एक ‘स्ट्रीट फाइटर’ माना जाता है; सत्ता जाने पर वह फिर से सड़क पर उतरकर संघर्ष का रास्ता चुन सकती हैं, जिससे आने वाले दिनों में बंगाल में राजनीतिक टकराव और बढ़ सकता है।
अगर जीतीं ममता, तो दिल्ली की राह होगी आसान
एग्जिट पोल के उलट अगर ममता बनर्जी अपना किला बचाने में कामयाब रहती हैं, तो उनका कद हिमालय जैसा ऊंचा हो जाएगा। यह संदेश जाएगा कि तमाम केंद्रीय जांच एजेंसियों और बीजेपी की मशीनरी के बावजूद ‘बंगाल की बेटी’ को हिलाया नहीं जा सका। बिहार में बीजेपी के मुख्यमंत्री बनने और अन्य राज्यों में विपक्ष की हार के बीच ममता की जीत उन्हें 2029 के लिए विपक्षी गठबंधन का निर्विवाद नेता और ‘किंगमेकर’ बना देगी। ममता पहले ही संकेत दे चुकी हैं कि उन्हें कुर्सी का मोह नहीं है, लेकिन वह केंद्र के खिलाफ मोर्चा खोलती रहेंगी।
भगवामय बंगाल: दक्षिणपंथ की नई प्रयोगशाला?
यदि बीजेपी बंगाल में ऐतिहासिक जीत दर्ज करती है, तो यह 2014 की जीत जैसी ही बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी। वामपंथ और टीएमसी के इस गढ़ में ‘जय श्री राम’ का उद्घोष यह साबित कर देगा कि बंगाल ने अब हिंदुत्व और दक्षिणपंथी विचारधारा को स्वीकार कर लिया है। ममता का ‘बाहरी’ वाला कार्ड फेल माना जाएगा और यह जीत बीजेपी के लिए दक्षिण भारत के द्वार खोलने की चाबी बन सकती है। बंगाल की जीत पीएम मोदी की लोकप्रियता पर एक और बड़ी मुहर होगी।
बंपर वोटिंग क्या बताती है?
- उत्तर प्रदेश में 2012 के चुनाव में 13.40% वोटिंग बढ़ी. चुनाव नतीजे आए तो BSP की सत्ता चली गई और SP को सत्ता मिली.
- 2011 के पश्चिम बंगाल चुनाव में कुल वोटिंग में 2.36% का इजाफा हुआ. CPM की सत्ता गई और TMC को सत्ता मिल गई.
- 1982 में पश्चिम बंगाल के ही चुनाव में वोट 20.60% का इजाफा हुआ और CPM की सत्ता बरकरार.
- 2018 में मध्य प्रदेश के चुनाव में वोटिंग में 3.17% का इजाफा हुआ. BJP की सत्ता चली गई. कांग्रेस को सत्ता मिल गई.
- 2008 में त्रिपुरा चुनाव में 12.51% वोटिंग ज्यादा हुई. CPM की सत्ता बरकरार रही.
बंगाल में बंपर वोटिंग का क्या मतलब है?
| वर्ष | राज्य | कुल वोटिंग (%) | पिछली बार से वोटिंग में बदलाव | चुनावी नतीजा |
|---|---|---|---|---|
| 2011 | पश्चिम बंगाल | 84.33% | +2.36% | CPM गई, TMC आई |
| 1982 | पश्चिम बंगाल | 76.80% | +20.60% | CPM की सत्ता बरकरार |
| 2016 | असम | 84.49% | +8.57% | कांग्रेस गई, BJP आई |
| 2013 | राजस्थान | 75.40% | +9.15% | कांग्रेस गई, BJP आई |
| 2018 | मध्य प्रदेश | 75.20% | +3.17% | BJP गई, कांग्रेस आई |
| 2003 | मध्य प्रदेश | 67.30% | +7.08% | कांग्रेस गई, BJP आई |
| 2012 | उत्तर प्रदेश | 59.40% | +13.40% | BSP गई, SP आई |
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