कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में हुई 92 फीसदी से ज्यादा की ‘बंपर वोटिंग’ ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। लोकतंत्र के इस उत्सव में बंगाल के मतदाताओं ने जिस तरह से बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है, उसने चुनावी पंडितों को भी चकरा दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस ऐतिहासिक मतदान के मायने क्या हैं? क्या यह बदलाव की आंधी है या फिर सत्ता की दोबारा वापसी का मजबूत संकेत?
रिकॉर्ड वोटिंग: एंटी-इनकंबेंसी या प्रो-इनकंबेंसी?
आमतौर पर यह माना जाता है कि जब भी मतदान का प्रतिशत बढ़ता है, तो वह मौजूदा सरकार के खिलाफ गुस्से (Anti-incumbency) का प्रतीक होता है। लेकिन बंगाल का इतिहास कुछ और ही कहानी कहता है। 2021 के चुनाव में भी 82% मतदान हुआ था और तब भी कयास लगाए जा रहे थे कि टीएमसी की विदाई तय है, लेकिन नतीजों ने सबको चौंका दिया और ममता बनर्जी ने प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता बरकरार रखी। यह साबित करता है कि ज्यादा वोटिंग का मतलब हमेशा सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता के पक्ष में मजबूत लामबंदी भी हो सकती है।
दिल्ली से यूपी और त्रिपुरा तक: जब मतदान ने पलटी बाजी
भारत के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो रिकॉर्ड वोटिंग ने कई बार बड़े ‘सियासी किलों’ को ढहाया है:
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त्रिपुरा (2018): यहां 89% की भारी वोटिंग ने वामपंथियों के 25 साल पुराने शासन को उखाड़ फेंका और बीजेपी की सरकार बनी।
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उत्तर प्रदेश (2017): 61% मतदान ने समाजवादी पार्टी को सत्ता से बाहर किया और योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी का उदय हुआ।
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दिल्ली (2015): 67% की रिकॉर्ड वोटिंग ने अरविंद केजरीवाल की ‘आप’ को 70 में से 67 सीटें दिलाकर इतिहास रच दिया।
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बिहार (2015): महागठबंधन के पक्ष में भारी मतदान ने नीतीश-लालू की जोड़ी को सत्ता तक पहुंचाया।
लोकसभा चुनाव: मोदी लहर और सहानुभूति का प्रभाव
राष्ट्रीय स्तर पर भी ज्यादा मतदान के परिणाम दिलचस्प रहे हैं। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में क्रमशः 66.44% और 67.40% मतदान हुआ। 2014 में यह बदलाव (Change) के लिए था जिससे मोदी सरकार आई, जबकि 2019 में उसी मतदान ने सरकार को और मजबूती दी। वहीं, 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुई रिकॉर्ड वोटिंग ने कांग्रेस को 414 सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दिलाई थी।
कम मतदान और सरकार गिरने का गणित
दिलचस्प बात यह है कि कम मतदान होने पर भी नतीजे एकतरफा नहीं रहे हैं। 1971 में मात्र 41.33% वोटिंग के बावजूद कांग्रेस सत्ता में रही। पिछले 12 लोकसभा चुनावों का विश्लेषण करें तो पांच बार वोटिंग का प्रतिशत गिरा, जिनमें चार बार सरकार बदल गई। यानी कम वोटिंग सत्ताधारी दल के लिए ज्यादा खतरनाक साबित हुई है।
निष्कर्ष: केवल आंकड़ों से नतीजा निकालना है मुश्किल
बंगाल की 92% वोटिंग ने यह तो साफ कर दिया है कि मतदाता खामोश नहीं है। लेकिन यह ‘खामोशी’ किसी तूफान का संकेत है या फिर मौजूदा व्यवस्था पर भरोसे की मुहर, यह तो नतीजों के दिन ही साफ होगा। स्थानीय मुद्दे, सामाजिक समीकरण और ध्रुवीकरण जैसे कारक अक्सर प्रतिशत के गणित को फेल कर देते हैं।
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