Friday , 8 May 2026

NIA का बड़ा खुलासा: डॉक्टर ने घर को बनाया ‘डेथ लैब’, ISIS की हजारों लोगों को जहर देने की थी साजिश

देश की सुरक्षा एजेंसियों ने आतंक के एक ऐसे खौफनाक चेहरे को बेनकाब किया है, जिसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाएं। नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) ने बुधवार को अहमदाबाद की स्पेशल कोर्ट में ISIS से जुड़े एक ‘बायो-टेररिज्म’ (Bio-Terrorism) मॉड्यूल के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की है। इस साजिश का मास्टरमाइंड कोई अनपढ़ अपराधी नहीं, बल्कि हैदराबाद का एक डॉक्टर है, जिसने मानवता को बचाने वाले पेशे की आड़ में हजारों लोगों को मौत की नींद सुलाने का ब्लूप्रिंट तैयार किया था।

हैदराबाद का डॉक्टर और बायो-टॉक्सिन का ‘खूनी’ प्लान

NIA की चार्जशीट में हैदराबाद के डॉ. सैयद अहमद मोहीउद्दीन, उत्तर प्रदेश के आजाद और मोहम्मद सुहेल को मुख्य आरोपी बनाया गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि डॉ. मोहीउद्दीन ने हैदराबाद स्थित अपने ही घर को एक गुप्त लैब में बदल दिया था। यहाँ वह ‘रिसिन’ (Ricin) नामक एक घातक जैविक टॉक्सिन तैयार कर रहा था। रिसिन इतना खतरनाक जहर है कि इसकी मामूली मात्रा भी सार्वजनिक स्थानों पर हजारों लोगों की जान ले सकती है।

ISIS का ‘अमीर’ बनने का लालच और विदेशी हैंडलर्स

जांच में सामने आया है कि ये सभी आरोपी ISIS के विदेशी आकाओं के सीधे संपर्क में थे। डॉ. मोहीउद्दीन को लालच दिया गया था कि इस हमले के बाद उसे दक्षिण एशिया में ISIS का ‘अमीर’ (सरगना) बनाया जाएगा। मॉड्यूल की योजना भीड़भाड़ वाले इलाकों में इस जैविक जहर का इस्तेमाल कर बड़े पैमाने पर जनहानि करने की थी। इस पूरे नेटवर्क की मुख्य कड़ी मोहम्मद सुहेल था, जो फंड जुटाने से लेकर युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और हथियारों की सप्लाई तक का काम देख रहा था।

हनुमानगढ़ से गुजरात तक फैला था नेटवर्क

NIA ने जनवरी 2026 में इस केस की कमान संभाली थी। आरोपियों ने राजस्थान के हनुमानगढ़ से हथियारों और नकदी के पार्सल इकट्ठा किए थे, जिन्हें गुजरात के छत्राल में डंप किया गया था। जांच एजेंसी ने बताया कि ये आतंकी न केवल बायो-वेपन्स बल्कि प्रतिबंधित आधुनिक हथियारों से भी हमले की फिराक में थे। इससे पहले दिसंबर 2025 में पकड़े गए आतंकियों ने खुलासा किया था कि उनके निशाने पर RSS का लखनऊ मुख्यालय और दिल्ली के कई इलाके भी थे।

क्या है बायो-टेररिज्म, जिससे दुनिया कांपती है?

बायो-टेररिज्म आतंकवाद का वह अदृश्य रूप है जिसमें वायरस, बैक्टीरिया या जहरीले टॉक्सिन का इस्तेमाल किया जाता है। इसे ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है क्योंकि इसका पता लगाना बेहद मुश्किल होता है और यह हवा या पानी के जरिए महामारी की तरह फैल सकता है। NIA की इस कार्रवाई ने देश पर मंडरा रहे एक बहुत बड़े जैविक खतरे को टाल दिया है, लेकिन एजेंसी अब भी इस नेटवर्क के अन्य स्लीपर सेल्स की तलाश में जुटी है।

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