
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का अलीगंज इलाका सोमवार को एक ऐसे भयावह मंजर का गवाह बना, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। यहाँ एक अवैध रूप से संचालित गेमिंग ज़ोन और एनीमेशन सेंटर में लगी भीषण आग ने 15 मासूम बच्चों की जिंदगी को हमेशा के लिए लील लिया। घटना के बाद जब अग्निशमन कर्मी (फायर ब्रिगेड) राख बन चुकी इमारत के भीतर दाखिल हुए, तो वहां का नजारा देखकर उनके भी रोंगटे खड़े हो गए। पूरी बिल्डिंग में सुरक्षा मानकों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही थीं। एक आवासीय इमारत को व्यावसायिक रूप देकर उसमें अवैध रूप से गेमिंग ज़ोन, पेट शॉप और कई दुकानें संचालित की जा रही थीं। हैरान करने वाली बात यह है कि इस बिल्डिंग को साल 2016 में ही अवैध निर्माण के चलते गिराने का आदेश दिया गया था, लेकिन रसूख के दम पर महज दो महीने के भीतर ही इस आदेश को वापस ले लिया गया, जिसने आज इस बड़ी त्रासदी को जन्म दिया।
बायोमेट्रिक लॉक सिस्टम बना काल, 40 मिनट देरी से पहुंची फायर ब्रिगेड
पीड़ित परिवारों ने प्रशासन और मैनेजमेंट पर गंभीर आरोप लगाते हुए बताया कि गेमिंग ज़ोन और एनीमेशन सेंटर का पूरा ढांचा पूरी तरह ऑटोमैटिक था। मुख्य दरवाजे पर बायोमेट्रिक थंब इंप्रेशन (अंगूठे का निशान) सिस्टम लगा था, यानी बिना पंच किए दरवाजा नहीं खुल सकता था। जैसे ही इमारत में आग लगी, बिजली गुल होते ही यह ऑटोमैटिक लॉक सिस्टम फेल हो गया और दरवाजा हमेशा के लिए जाम हो गया। बाहर निकलने का यही एकमात्र रास्ता था, जहां से बच्चे कुछ ही मिनटों में सुरक्षित बाहर आ सकते थे। परिजनों का गुस्सा इस बात पर भी फूटा कि फायर ब्रिगेड की टीम को सूचना देने के करीब 40 मिनट बाद दमकल गाड़ियां मौके पर पहुंचीं। तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
खिड़की से कूदा युवक नुकीली रेलिंग पर गिरा, तड़पकर तोड़ा दम
जब आग की लपटों ने पूरी इमारत को घेर लिया, तो अंदर चीख-पुकार और भगदड़ मच गई। जान बचाने की जद्दोजहद में कुछ बच्चे बिल्डिंग के किनारे लगी पाइपलाइन और लटके हुए बिजली के तारों के सहारे नीचे कूदने का प्रयास करने लगे। इसी बीच, एक युवक ने जान बचाने के लिए तीसरी मंजिल की खिड़की का शीशा तोड़ा और नीचे छलांग लगा दी। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था; वह सीधे नीचे लगी लोहे की नुकीली रेलिंग पर जा गिरा। रेलिंग उसके पेट को चीरती हुई आर-पार हो गई और अत्यधिक खून बह जाने के कारण उसने मौके पर ही तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया।
चक्रव्यूह जैसी थी इमारत, बाहर निकलने का था सिर्फ एक रास्ता
इस मौत की इमारत का नक्शा किसी चक्रव्यूह से कम नहीं था। अलीगंज की इस तीन मंजिला बिल्डिंग से बाहर निकलने और प्रवेश करने का केवल एक ही संकरा रास्ता था। इसके बाकी तीनों तरफ दूसरी इमारतें सटी हुई थीं। आग सबसे पहले बिल्डिंग के ठीक सामने (फ्रंट साइड) वाले हिस्से में लगी। आगे आग की ऊंची लपटें देखकर दहशत में आए बच्चे जान बचाने के लिए पीछे के कमरों की तरफ भागे। लेकिन वेंटिलेशन न होने के कारण कुछ ही मिनटों में जहरीला और काला धुआं पीछे के हिस्से में भी भर गया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, ज्यादातर बच्चों की मौत जलने से नहीं, बल्कि दम घुटने (Asphyxiation) के कारण हुई।
बाथरूम में नल खोलकर छिपे रहे बच्चे, पर धुएं ने छीन ली सांसें
घटना के चश्मदीदों ने बताया कि हवा के झोंकों के साथ आग ने विकराल रूप ले लिया था। आग इतनी भयानक थी कि लोग चाहकर भी बच्चों को बचाने ऊपर नहीं जा पा रहे थे। बाहर खड़े कुछ लोगों ने पत्थरों से खिड़कियों के शीशे तोड़ने की नाकाम कोशिश भी की। इस बीच, अंदर फंसे कई मासूम बच्चों ने गर्मी और आग की लपटों से बचने के लिए बाथरूम का रुख किया और खुद को अंदर लॉक कर लिया। वो लगातार नल खोलकर पानी गिराते रहे ताकि आग की तपिश उन तक न पहुंचे, लेकिन उनका यह सुरक्षात्मक कदम आत्मघाती साबित हुआ। बाथरूम में कोई खिड़की न होने से वहां तेजी से कार्बन मोनोऑक्साइड गैस और धुआं भर गया, जिससे तड़पते हुए मासूमों का दम घुट गया।
न स्मोक डिटेक्टर, न फायर सिलेंडर; दीवारें तोड़कर घुसे दमकलकर्मी
अग्निशमन विभाग की शुरुआती जांच में जो खुलासे हुए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं। इस पूरी कमर्शियल एक्टिविटी वाली बिल्डिंग में न तो कोई स्मोक डिटेक्टर (धुएं की चेतावनी देने वाला यंत्र) लगा था और न ही आग बुझाने वाले फायर एक्सटिंग्यूशर (सिलेंडर) मौजूद थे। इसी वजह से शुरुआती कीमती मिनटों में आग पर काबू पाने का कोई प्रयास नहीं किया जा सका। आखिरकार, दमकल कर्मियों ने आसपास की छतों पर चढ़कर बड़े हथौड़ों से कंक्रीट की दीवारें तोड़ीं और फिर अंदर दाखिल हुए। बाहर खड़े मां-बाप रोते-बिलखते हुए अपने बच्चों को बचाने की भीख मांग रहे थे, लेकिन जब तक मदद पहुंचती, तब तक कई हंसते-खेलते परिवार हमेशा के लिए तबाह हो चुके थे।
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