Thursday , 28 May 2026

जानें क्या है ‘परिसीमन’ और क्यों उत्तर-दक्षिण भारत के बीच छिड़ी है रार….आसान भाषा में समझें पूरा गणित !

नई दिल्ली। भारतीय राजनीति के गलियारों में इन दिनों ‘परिसीमन’ शब्द की गूंज सबसे तेज है। आम आदमी के लिए भले ही यह शब्द थोड़ा तकनीकी हो, लेकिन देश के लोकतांत्रिक ढांचे और सत्ता के भविष्य के लिए यह सबसे बड़ा मोड़ साबित होने वाला है। सरल शब्दों में कहें तो परिसीमन का अर्थ है जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का नए सिरे से निर्धारण करना। यह जिम्मेदारी एक स्वतंत्र परिसीमन आयोग की होती है, जिसका गठन राष्ट्रपति की अधिसूचना के जरिए किया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि इस आयोग की ताकत इतनी असीमित है कि इसके किसी भी फैसले को देश की किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।

लोकतंत्र में क्यों जरूरी है सीमाओं का दोबारा खिंचना

जैसे-जैसे किसी शहर या क्षेत्र की आबादी का घनत्व बढ़ता है, वहां की बुनियादी जरूरतों और प्रशासनिक व्यवस्था को संभालने के लिए नए निर्वाचन क्षेत्रों की आवश्यकता होती है। परिसीमन का मूल उद्देश्य ‘एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को जीवित रखना है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि देश के हर सांसद या विधायक के पास प्रतिनिधित्व करने के लिए लगभग बराबर की आबादी हो, ताकि किसी भी क्षेत्र की जनता की आवाज कमतर न रह जाए।

850 सांसदों वाली नई संसद का रोडमैप

भारत फिलहाल साल 1971 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर चल रहा है। पिछले 55 वर्षों में देश की जनसंख्या लगभग 2.25 गुना बढ़ चुकी है। काम का बोझ और जनता की बढ़ती संख्या को देखते हुए अब लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर लगभग 850 करने की तैयारी है। जब सीटों का बंटवारा नई आबादी के हिसाब से होगा, तो उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों की झोली में सबसे ज्यादा सीटें आएंगी। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इससे संसद में इन राज्यों का सियासी दबदबा काफी बढ़ जाएगा।

दक्षिण भारत की चिंता: ‘अच्छे काम की सजा’ का डर

जहां उत्तर भारतीय राज्यों में उत्साह है, वहीं तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में गहरी चिंता देखी जा रही है। इन राज्यों ने दशकों से जनसंख्या नियंत्रण के मोर्चे पर बेहतरीन काम किया है। अब उन्हें डर सता रहा है कि कम आबादी के कारण उनकी सीटों की संख्या उतनी नहीं बढ़ेगी, जितनी उत्तर भारत की। दक्षिण भारतीय दलों का तर्क है कि परिवार नियोजन को सफलतापूर्वक लागू करने के बदले उन्हें संसद में कमजोर आवाज के रूप में ‘सजा’ मिल रही है।

सियासी घमासान और संतुलन की चुनौती

कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेर रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि परिसीमन के इस स्वरूप से राज्यों के बीच का शक्ति संतुलन बिगड़ सकता है। चर्चा यह भी है कि इससे उन क्षेत्रों को अधिक राजनीतिक लाभ मिलेगा जहां सत्ताधारी दल मजबूत स्थिति में है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि भविष्य का परिसीमन आयोग देश की एकता और प्रतिनिधित्व के बीच कैसे तालमेल बिठाता है।

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