नई दिल्ली: 24 अप्रैल 2026 की तारीख आम आदमी पार्टी (AAP) के वजूद के लिए किसी बड़े सियासी भूकंप से कम नहीं रही। पार्टी के संसदीय दल में अब तक की सबसे बड़ी सेंधमारी हो चुकी है, जहां बागी गुट ने एक-तिहाई सांसदों के साथ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में विलय का ऐलान कर दिया। हालांकि, इस टूट में सबसे हैरान करने वाला और ‘आप’ को भीतर तक हिला देने वाला नाम राज्यसभा सांसद और राष्ट्रीय संगठन महासचिव संदीप पाठक का रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राघव चड्ढा का साथ छूटना तो महज एक संख्या कम होना है, लेकिन संदीप पाठक का जाना अरविंद केजरीवाल के लिए उनके दाहिने हाथ के कट जाने जैसा है।
केजरीवाल के ‘चाणक्य’ ने बदला पाला, सन्न रह गया आप नेतृत्व
संदीप पाठक केवल एक सांसद नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी की रीढ़ की हड्डी माने जाते थे। साल 2016 में पार्टी से जुड़ने वाले पाठक पर्दे के पीछे रहकर रणनीति बनाने के माहिर खिलाड़ी थे। पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की ‘प्रचंड जीत’ का खाका उन्होंने ही तैयार किया था, जिसके बाद अरविंद केजरीवाल ने उन पर अटूट भरोसा जताते हुए उन्हें राज्यसभा भेजा और संगठन महासचिव की कमान सौंपी। जब केजरीवाल जेल में थे, तब उनसे मुलाकात करने और जेल से सरकार व संगठन चलाने के लिए जिन चंद चेहरों को अधिकृत किया गया था, उनमें संदीप पाठक सबसे ऊपर थे। शुक्रवार की प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब वह राघव चड्ढा, स्वाति मालीवाल, अशोक मित्तल और हरभजन सिंह के साथ नजर आए, तो सियासी गलियारों में सन्नाटा पसर गया।
राघव और स्वाति का जाना था तय, पाठक ने दिया ‘धोखा’
पार्टी सूत्रों की मानें तो राघव चड्ढा और स्वाति मालीवाल की पिछले डेढ़ साल से कम होती सक्रियता को देखते हुए उनके पाला बदलने की आशंका पहले से थी। हरभजन सिंह और अशोक मित्तल जैसे चेहरों के जाने को भी पार्टी ने एक सामान्य घटनाक्रम की तरह लिया, लेकिन संदीप पाठक का बागी होना ‘आप’ के लिए एक बड़ी वैचारिक हार है। संदीप पाठक पार्टी की ‘पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी’ (PAC) के मजबूत स्तंभ थे और दिल्ली डायलॉग कमीशन से लेकर गुजरात और गोवा में पार्टी के विस्तार का पूरा श्रेय उन्हें ही जाता था।
अब कैसे संभलेगा केजरीवाल का संगठन?
संदीप पाठक के भाजपा में जाने से न केवल ‘आप’ का संसदीय गणित बिगड़ा है, बल्कि भविष्य के चुनावी समीकरणों और सांगठनिक ढांचे को भी गहरी चोट पहुंची है। पाठक के पास पार्टी के एक-एक कार्यकर्ता और जमीनी नेटवर्क का डेटा और जानकारी थी, जो अब सीधे तौर पर प्रतिद्वंद्वी खेमे के पास चली गई है। केजरीवाल के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसे भरोसेमंद रणनीतिकार को तलाशने की है, जो पाठक की भरपाई कर सके। जानकारों का कहना है कि यह ‘आप’ के इतिहास का सबसे कठिन दौर है, जहाँ पार्टी अपने सबसे कुशल ‘सॉफ्टवेयर’ को खो चुकी है।
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