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हिमालय पर महासंकट: एशिया का ‘वॉटर टावर’ हो रहा खाली, दोगुनी रफ्तार से पिघल रहे ग्लेशियर

नई दिल्ली/देहरादून। दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत श्रृंखला और एशिया की जीवनरेखा माना जाने वाला हिमालय आज अपने अस्तित्व के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। हालिया वैज्ञानिक शोधों ने एक ऐसी डरावनी तस्वीर पेश की है, जिसने पर्यावरणविदों की नींद उड़ा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, हिमालय के ग्लेशियर अब 20वीं सदी के मुकाबले दोगुनी रफ्तार से पिघल रहे हैं। यह महज बर्फ का पिघलना नहीं है, बल्कि भारत की ‘गंगा’ और ‘ब्रह्मपुत्र’ जैसी सदानीरा नदियों के सूखने की पहली आहट है।

30 सालों में गायब हो गया 12% ग्लेशियर क्षेत्र

हिंदू कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र से प्राप्त आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 1990 से 2020 के बीच इस क्षेत्र ने अपने ग्लेशियर क्षेत्र का लगभग 12 प्रतिशत हिस्सा खो दिया है। वहीं, बर्फ के कुल भंडार में 9 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि 2010 के बाद से ग्लेशियरों के सिमटने की गति में अप्रत्याशित तेजी आई है। अगर यही हाल रहा, तो आने वाले दशकों में छोटे ग्लेशियरों का नामोनिशान मिट सकता है।

गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिन पर मंडराया सूखा

हिमालय के पिघलने का सबसे विनाशकारी प्रभाव मैदानी इलाकों पर पड़ने वाला है। पिछले तीन दशकों में गंगा बेसिन के ग्लेशियरों में 21 प्रतिशत और ब्रह्मपुत्र बेसिन में 16 प्रतिशत की कमी आई है। ये नदियां न केवल करोड़ों लोगों की प्यास बुझाती हैं, बल्कि भारत की कृषि और अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। ग्लेशियर खत्म होने का मतलब है कि गर्मियों के मौसम में इन नदियों का जलस्तर बेहद कम हो जाएगा, जिससे खेती, पीने के पानी और बिजली उत्पादन (हाइड्रोपावर) पर सीधा प्रहार होगा।

5500 मीटर से कम ऊंचाई वाले ग्लेशियरों को सबसे ज्यादा खतरा

शोध के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग का सबसे ज्यादा असर 5500 मीटर से कम ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियरों पर पड़ रहा है। इसके अलावा, दक्षिण और पूर्व दिशा की ओर ढलान वाले ग्लेशियर, जो सीधे सूर्य की रोशनी के संपर्क में आते हैं, वे सबसे तेजी से असुरक्षित हो गए हैं। वर्षा के बदलते चक्र और बढ़ते वैश्विक तापमान ने इस प्राकृतिक ‘वॉटर टावर’ के संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ दिया है।

करोड़ों लोगों के सामने खड़ा होगा पानी का भीषण संकट

हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में करीब 63,000 ग्लेशियर हैं, जो प्राकृतिक जल भंडार के रूप में काम करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक क्षेत्रीय समस्या नहीं बल्कि एक वैश्विक आपदा है। यदि समय रहते कार्बन उत्सर्जन और ग्लोबल वार्मिंग पर लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में जल युद्ध (Water Wars) जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। हिमालय का यह संकट चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि अब प्रकृति के संरक्षण के लिए ठोस अंतरराष्ट्रीय प्रयासों की सख्त जरूरत है।

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