
यरुशलम। इजरायल के सियासी गलियारों में पूर्व सेना प्रमुख (IDF Chief) गादी आइजनकोट मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरे हैं। संसद (नेसेट) में यदि उनका विपक्षी गठबंधन 61 सीटों का जादुई आंकड़ा जुटाने में सफल रहता है, तो वह देश के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं। हालांकि, गाजा युद्ध, हमास, ईरान और फिलिस्तीन जैसे संवेदनशील भू-राजनीतिक मुद्दों पर आइजनकोट का रुख नेतन्याहू से किसी भी मायने में नरम नहीं है।
अक्टूबर 2023 में युद्ध शुरू होने के बाद वह आपातकालीन युद्ध कैबिनेट का अहम हिस्सा थे, लेकिन जून 2024 में नेतन्याहू की युद्ध नीति और राजनीतिक प्राथमिकताओं से असहमति जताते हुए बेनी गैंट्ज के साथ सरकार से अलग हो गए थे। आइए 5 प्रमुख बिंदुओं में समझते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़े मुद्दों पर आइजनकोट का विजन क्या है:
1. हमास का पूर्ण खात्मा और शासन समाप्त करने का संकल्प
आइजनकोट हमास को इजरायल की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा तात्कालिक खतरा मानते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि गाजा पट्टी से हमास के राजनीतिक शासन और सैन्य ढांचे को पूरी तरह नेस्तनाबूद करना अनिवार्य है। उन्होंने स्पष्ट शर्त रखी है कि जो भी राजनीतिक दल हमास को आतंकी संगठन नहीं मानता और उसके खात्मे का समर्थन नहीं करता, उसे उनकी सरकार में शामिल नहीं किया जाएगा। हालांकि, वह मानते हैं कि केवल सैन्य कार्रवाई से स्थायी शांति संभव नहीं है, बल्कि इसके साथ कूटनीतिक प्रयासों का होना भी उतना ही आवश्यक है।
2. ईरान को सबसे बड़ी बाहरी चुनौती मानना और परमाणु खतरे पर सख्त रुख
आइजनकोट की नजर में ईरान इजरायल के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ी बाहरी सुरक्षा चुनौती है। उनकी प्राथमिक चिंता तेहरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर है और वह किसी भी कीमत पर ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के पक्षधर हैं। रणनीति के स्तर पर वह सीधे सैन्य टकराव के बजाय कड़े अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबंधों और रणनीतिक बातचीत को प्राथमिकता देते हैं ताकि ईरान को पीछे हटने पर मजबूर किया जा सके। हालांकि, आवश्यकता पड़ने पर वह परमाणु ठिकानों पर सटीक सैन्य हमलों के भी समर्थक हैं, लेकिन ईरान में सत्ता परिवर्तन (Regime Change) को एक व्यावहारिक लक्ष्य नहीं मानते।
3. टू-स्टेट सॉल्यूशन का पुरजोर विरोध और बस्तियों का समर्थन
गादी आइजनकोट स्वतंत्र फिलिस्तीन राष्ट्र के निर्माण यानी ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ (दो-राष्ट्र समाधान) के कड़े विरोधी हैं। उन्होंने वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम और गाजा को मिलाकर एक संप्रभु फिलिस्तीनी देश बनाने की अवधारणा को पूरी तरह खारिज किया है। इसके साथ ही वह वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों (Settlements) के विस्तार के समर्थक रहे हैं। हालांकि, उनका कहना है कि इन बस्तियों का विस्तार मनमाने ढंग से नहीं, बल्कि इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा हितों और स्थापित कानूनी दायरे के भीतर होना चाहिए।
4. ‘दहिया डॉक्ट्रिन’ के जनक और कठोर सैन्य जवाबी कार्रवाई के पैरोकार
इजरायली सेना की चर्चित और विवादित ‘दहिया डॉक्ट्रिन’ (Dahiya Doctrine) के निर्माण में आइजनकोट की केंद्रीय भूमिका रही है। वर्ष 2006 के लेबनान युद्ध के दौरान बेरूत के दहिया इलाके में हुई भीषण तबाही के बाद यह सिद्धांत सामने आया था, जब आइजनकोट उत्तरी कमान के प्रमुख थे। इस सिद्धांत के तहत, यदि किसी नागरिक क्षेत्र या गांव से इजरायल पर मिसाइल या रॉकेट दागे जाते हैं, तो उसे सीधे तौर पर सैन्य अड्डा माना जाएगा और वहां अनुपातहीन (Disproportionate) सैन्य ताकत का इस्तेमाल कर भारी तबाही मचाई जाएगी। मानवाधिकार संगठन इस नीति की कड़ी आलोचना करते रहे हैं क्योंकि इसमें आम नागरिकों और बुनियादी ढांचे के बड़े पैमाने पर नुकसान का जोखिम रहता है।
5. गाजा युद्ध में व्यक्तिगत क्षति और नेतन्याहू से रणनीतिक मतभेद
अक्टूबर 2023 में आपातकालीन सरकार में शामिल होने के बाद आइजनकोट युद्ध कैबिनेट में पर्यवेक्षक रहे। गाजा में जारी संघर्ष के दौरान उन्होंने अपने बेटे और दो भतीजों को भी खोया। इसके बावजूद उन्होंने नेतन्याहू पर युद्ध को लंबा खींचने, सही सैन्य रणनीति की अनदेखी करने और राष्ट्रीय हितों के बजाय अपनी कुर्सी बचाने के लिए राजनीतिक फैसले लेने का आरोप लगाया। वर्ष 2018 में गाजा सीमा पर हुए ‘ग्रेट मार्च ऑफ रिटर्न’ के दौरान भी वह सेना प्रमुख थे, जहां इजरायली बलों की कार्रवाई पर संयुक्त राष्ट्र जांच आयोग ने अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों के उल्लंघन के सवाल उठाए थे।
सरकार गठन में हमास पर शर्त और सहयोगी पार्टी ‘राम’ का पेंच
नेतन्याहू के खिलाफ होने के बावजूद आइजनकोट की नीतियां सुरक्षा के मोर्चे पर अत्यंत कठोर हैं। दोनों के बीच बुनियादी अंतर विचारधारा का नहीं, बल्कि युद्ध प्रबंधन और फैसलों की पारदर्शिता को लेकर है। इस बीच, सरकार बनाने की दिशा में आइजनकोट के सामने एक बड़ा राजनीतिक पेंच फंस गया है।
आइजनकोट की इस सख्त शर्त पर कि सरकार में शामिल होने वाली हर पार्टी को हमास को आतंकी संगठन मानना होगा, उनकी संभावित सहयोगी अरब पार्टी ‘राम’ (Ra’am) के नेता मंसूर अब्बास ने हमास को आतंकी संगठन कहने से इनकार कर दिया है। अब्बास ने राष्ट्रपति इसाक हर्जोग से मिलकर आइजनकोट को समर्थन देने की सिफारिश तो की है, लेकिन हमास पर रुख स्पष्ट नहीं किया। अब्बास का कहना है कि वह हिंसा के विरोधी हैं और टू-स्टेट सॉल्यूशन के तहत सभी सशस्त्र गुटों से हथियार डालने की अपील करते हैं, लेकिन फिलिस्तीनियों और इजरायल के बीच एक संवाद सेतु बने रहने के लिए वह ऐसा कोई बयान नहीं देंगे जिससे उनके और उनके परिवार के लिए सुरक्षा संकट खड़ा हो।
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