
नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब अदालती चौखट से निकलकर देश की मुख्यधारा की राजनीति का केंद्र बन गया है। सामान्य वर्ग के संगठनों के व्यापक विरोध और सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बीच केंद्र सरकार ने इन विवादास्पद नियमों की नए सिरे से समीक्षा के लिए एक विशेष समिति गठित करने पर विचार करने की बात कही है। यह मामला अब केवल उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक और सियासी समीकरणों पर भी सीधा असर डाल रहा है।
16 दिन में ही सुप्रीम कोर्ट ने लगा दी थी रोक, फिलहाल 2012 के नियम लागू
उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता लाने के उद्देश्य से 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किए गए ‘UGC Equity Regulations 2026’ को लागू हुए महज 16 दिन ही हुए थे कि सुप्रीम कोर्ट ने इनके अमल पर अंतरिम रोक लगा दी। शीर्ष अदालत ने पहली नजर में पाया कि नए नियम अस्पष्ट हैं और इनके दुरुपयोग की पूरी आशंका है। इसके बाद से ही 2026 के नियम ठंडे बस्ते में हैं और फिलहाल परिसरों में 2012 के पुराने दिशा-निर्देश ही प्रभावी हैं। जहां एक ओर सामान्य वर्ग ने कुछ विशेष प्रावधानों को लेकर आपत्ति जताई, वहीं दलित और पिछड़े वर्ग के संगठनों का तर्क है कि नियमों को रोकने से परिसरों में भेदभाव विरोधी सुरक्षा तंत्र कमजोर पड़ सकता है।
रोहित वेमुला और पायल तडवी केस से कैसे शुरू हुई नए नियमों की कहानी
नए नियमों की पृष्ठभूमि सालों पुराने दो चर्चित मामलों से जुड़ी है। वर्ष 2016 में हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के पीएचडी छात्र रोहित वेमुला और 2019 में मुंबई में भील समुदाय से आने वाली मेडिकल छात्रा पायल तडवी द्वारा कथित जातिगत उत्पीड़न के बाद आत्महत्या का मामला सामने आया था। इसके बाद दोनों की माताओं ने सुप्रीम कोर्ट में ‘अबेदा सलीम तडवी बनाम भारत सरकार’ याचिका दायर कर परिसरों में कड़े सुरक्षा उपायों की मांग की। फरवरी 2025 में इसका ड्राफ्ट तैयार हुआ और जनवरी 2026 में अंतिम नियम जारी हुए, जिसके तुरंत बाद सामान्य वर्ग के याचिकाकर्ताओं ने इसे कोर्ट में चुनौती दे दी।
सामान्य वर्ग क्यों कर रहा है नए नियमों का कड़ा विरोध?
नए नियमों को लेकर सामान्य वर्ग के छात्रों और संगठनों ने मुख्य रूप से तीन गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं:
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रेगुलेशन 3(1)(c) में भेदभाव की परिभाषा: इस प्रावधान के तहत जाति-आधारित भेदभाव (Caste-based Discrimination) के दायरे में केवल एससी (SC), एसटी (ST) और ओबीसी (OBC) को ही रखा गया, जबकि सामान्य वर्ग को इससे पूरी तरह बाहर रखा गया। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यदि सामान्य वर्ग के छात्र के साथ जातिगत आधार पर कोई भेदभाव होता है, तो उसे यह कानूनी सुरक्षा क्यों नहीं मिलेगी?
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रेगुलेशन 3(1)(e) बनाम 3(1)(c) का दोहरा मापदंड: जब नियम 3(1)(e) में सभी हितधारकों के लिए जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र व दिव्यांगता के आधार पर अनुचित व्यवहार को भेदभाव माना गया, तो फिर अलग से 3(1)(c) बनाकर केवल चुनिंदा वर्गों को शामिल करने का क्या औचित्य था।
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झूठी शिकायत पर दंडात्मक प्रावधान का हटना: शुरुआती ड्राफ्ट में दुर्भावनापूर्ण या झूठी शिकायत दर्ज कराने पर जुर्माने और अनुशासनात्मक कार्रवाई का नियम था, लेकिन जनवरी 2026 के अंतिम गजट में इसे हटा दिया गया। इससे दुरुपयोग की आशंका और गहरी हो गई।
इन प्रावधानों के विरोध में राजस्थान में राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना के अध्यक्ष महिपाल सिंह मकराना के नेतृत्व में जयपुर सहित कई शहरों में ‘UGC RollBack’ आंदोलन हुए और अगस्त में दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी छात्रों ने बड़ा प्रदर्शन किया।
सुप्रीम कोर्ट के 5 कड़े सवाल और केंद्र सरकार का रुख
सर्वोच्च अदालत ने नए नियमों की संवैधानिक वैधता की जांच करते हुए पांच प्रमुख बिंदुओं पर सवाल उठाए:
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जब रेगुलेशन 3(1)(e) में भेदभाव की व्यापक परिभाषा मौजूद है, तो 3(1)(c) की अलग व्याख्या की क्या जरूरत थी?
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क्या एससी, एसटी और ओबीसी के भीतर सबसे वंचित और अत्यंत पिछड़े समुदायों को इन नियमों से सुरक्षा मिल पाएगी?
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हॉस्टल, क्लासरूम और मेंटरशिप ग्रुप में ‘सेग्रिगेशन’ (अलगाव) की व्यवस्था का व्यावहारिक मतलब क्या निकाला जाए?
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वर्ष 2012 के नियमों में रैगिंग का स्पष्ट उल्लेख था, लेकिन 2026 के ड्राफ्ट में इसे अलग से जगह क्यों नहीं दी गई?
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क्या ये नए प्रावधान संविधान के तहत मिले समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करते हैं?
गुरुवार को चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि केंद्र सरकार इन नियमों की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाने पर विचार कर रही है ताकि किसी भी वर्ग का छात्र खुद को असुरक्षित या उपेक्षित महसूस न करे। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी है।
राजनीतिक नफा-नुकसान: 2027 चुनाव से पहले बीजेपी की रणनीति
यद्यपि नए नियम लागू नहीं हो सके, लेकिन इसका राजनीतिक असर दिखाई देने लगा है। हालिया विधान परिषद (MLC) चुनावों में सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी की वजह से बीजेपी को झटके का सामना करना पड़ा। पार्टी को यह चिंता सता रही है कि यह असंतोष युवा और नए मतदाताओं में और गहरा सकता है।
यही कारण है कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी ने डैमेज कंट्रोल की कवायद तेज कर दी है। संविधान, यूजीसी, एसआईआर और आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर विपक्ष के नैरेटिव का मुकाबला करने के लिए बीजेपी ने अपने विभिन्न प्रकोष्ठों को महीने भर का विशेष जनसंपर्क अभियान चलाने का निर्देश दिया है। इसके तहत शिक्षकों, वकीलों, डॉक्टरों, व्यापारियों और युवाओं के साथ सीधा संवाद स्थापित किया जाएगा और मतदाता सूची पुनरीक्षण पर फोकस रहेगा। हालांकि, बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह बनी हुई है कि एक वर्ग के असंतोष को थामने की कोशिश कहीं दूसरे वर्ग की नाराजगी न बढ़ा दे।
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