
नई दिल्ली। सरकारी नौकरियों में आरक्षण के नियमों और उनके प्रभाव को लेकर एक बेहद पेचीदा मामला देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के सामने पहुंचा है। यह मामला एक ऐसे अभ्यर्थी का है जिसने भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने के लिए शुरुआत में आरक्षित वर्ग के तहत ‘आयु सीमा में छूट’ (Age Relaxation) का लाभ लिया, लेकिन परीक्षा में सामान्य श्रेणी के चयनित अभ्यर्थी से अधिक अंक हासिल करने के बावजूद उसका अंतिम चयन रुक गया। त्रिपुरा हाई कोर्ट द्वारा अभ्यर्थी के पक्ष में दिए गए फैसले को केंद्र सरकार ने अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
उम्र में छूट लेकर परीक्षा दी, फिर ज्यादा अंक लाकर भी नहीं हुआ चयन
त्रिपुरा के रहने वाले ओबीसी (OBC) अभ्यर्थी जयंत देबनाथ की उम्र सामान्य श्रेणी (General Category) के उम्मीदवारों के लिए निर्धारित अधिकतम आयु सीमा से अधिक हो चुकी थी। हालांकि, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए लागू नियमों के तहत उन्हें आयु सीमा में छूट मिली, जिसके आधार पर वह वर्ष 2018 में आयोजित केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs), एनआईए (NIA), सचिवालय सुरक्षा बल (SSF) और असम राइफल्स में कांस्टेबल/राइफलमैन भर्ती परीक्षा में बैठने के पात्र बने।
परीक्षा में शामिल होने के बाद जब परिणाम घोषित हुए, तो जयंत देबनाथ ने 55.1 अंक हासिल किए। वहीं दूसरी ओर, सामान्य वर्ग के एक उम्मीदवार सागर देबनाथ का चयन महज 46.26 अंकों के साथ हो गया। सामान्य वर्ग के चयनित अभ्यर्थी की तुलना में लगभग 9 अंक अधिक लाने के बावजूद जयंत का चयन सूची में नाम नहीं आया।
केंद्र सरकार का तर्क: उम्र की छूट लेने के बाद नहीं मिल सकता सामान्य वर्ग का लाभ
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने बताया कि इस विसंगति की मुख्य वजह पदों की सीमित संख्या और भर्ती प्रक्रिया के तय नियम हैं। सरकार के अनुसार, उस भर्ती में ओबीसी श्रेणी के लिए कट-ऑफ अंक 60 निर्धारित हुए थे, जो कि सामान्य वर्ग के कट-ऑफ से भी ऊपर चले गए थे। सीमित रिक्तियों के चलते 55.1 अंक हासिल करने वाले जयंत देबनाथ ओबीसी कट-ऑफ (60 अंक) को पार नहीं कर सके।
केंद्र की ओर से दलील दी गई कि स्थापित भर्ती नियमों के मुताबिक, यदि कोई आरक्षित श्रेणी का उम्मीदवार परीक्षा के लिए अपनी योग्यता पूरी करने हेतु उम्र में छूट का लाभ ले लेता है, तो बाद में चयन प्रक्रिया के दौरान उसे सामान्य श्रेणी (अनारक्षित श्रेणी) में माइग्रेट करने या सामान्य सीट पर दावा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसी नियम के चलते जयंत को अधिक अंक मिलने के बावजूद सामान्य वर्ग की सीट पर चयनित नहीं किया गया।
हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
इससे पहले त्रिपुरा हाई कोर्ट की सिंगल-जज बेंच और उसके बाद डिवीजन बेंच—दोनों ने ही जयंत देबनाथ के पक्ष में फैसला सुनाते हुए निर्देश दिया था कि अधिक अंक हासिल करने के आधार पर कांस्टेबल पद के लिए उनके चयन पर विचार किया जाना चाहिए।
हाई कोर्ट के इस रुख के खिलाफ केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सोमवार को केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष सरकार का पक्ष रखा। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने पीठ को स्पष्ट रूप से बताया कि भर्ती नियमावली में यह प्रावधान पूरी तरह स्पष्ट है कि यदि किसी आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार ने भर्ती के शुरुआती चरण में ही आयु सीमा में छूट का लाभ लिया है, तो अंतिम मेरिट सूची में उसे आरक्षित वर्ग तक ही सीमित रखा जाएगा और वह सामान्य श्रेणी में ट्रांसफर नहीं हो सकता।
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