Sunday , 25 October 2026

महंगाई और बदहाल व्यवस्था पर सुलगा यूरोप: पेरिस से मैड्रिड तक सड़कों पर उतरा जनसैलाब, 3 हजार दुकानें फूंकीं, फ्रांस में सेना और बख्तरबंद गाड़ियां तैनात

पेरिस। यूरोप के कई देशों में जनता का आक्रोश अब ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा है। स्कूलों के बुनियादी बजट में कटौती, कम वेतन, बदहाल सरकारी सेवाओं और कमरतोड़ महंगाई के खिलाफ शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब भीषण अराजकता में तब्दील हो चुका है। फ्रांस की राजधानी पेरिस से लेकर स्पेन के मैड्रिड और इटली के मिलान तक लाखों नागरिक सरकारी नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। फ्रांस में हालात इस कदर बेकाबू हो चुके हैं कि उपद्रवियों ने करीब 3,000 दुकानों और सार्वजनिक संपत्तियों को आग के हवाले कर भारी लूटपाट की। हालात पर काबू पाने के लिए सरकार को कानून-व्यवस्था की बहाली हेतु सड़कों पर बख्तरबंद गाड़ियां और सेना के जवान तैनात करने पड़े हैं।

आंसू गैस के गोले और वाटर कैनन, पेरिस बना जंग का मैदान

राजधानी पेरिस सहित फ्रांस के प्रमुख शहरों में शनिवार को हालात बेहद तनावपूर्ण रहे। सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, देशभर में आयोजित रैलियों में 4 लाख 10 हजार से अधिक नागरिकों ने भागीदारी की, जिनमें से अकेले पेरिस के मुख्य मार्च में 1 लाख 10 हजार लोग शामिल हुए। पेरिस में यह विरोध मार्च पहले तो शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ा, लेकिन जैसे ही भीड़ अपने अंतिम पड़ाव ‘पोर्ट डी विन्सेनेस’ के पास पहुंची, माहौल हिंसक हो गया। कुछ उपद्रवी तत्वों ने सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी और अन्य वस्तुएं फेंकना शुरू कर दिया। इसके जवाब में पुलिस ने भीड़ को खदेड़ने के लिए आंसू गैस के गोले दागे और वॉटर कैनन (पानी की बौछारों) का जोरदार इस्तेमाल किया, जिससे पूरा इलाका छावनी में तब्दील हो गया।

राष्ट्रपति मैक्रों की शांति की मार्मिक अपील

हिंसा और आगजनी की बढ़ती घटनाओं के बीच फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने खुद एक वीडियो संदेश जारी कर देशवासियों से शांति बनाए रखने की अपील की है। राष्ट्रपति मैक्रों ने बेहद भावुक होते हुए कहा कि फ्रांस के लोग ही अपने ही देश के साथ ऐसा बर्ताव कैसे कर सकते हैं? जो कुछ भी सड़कों पर घट रहा है, उसे किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता। हम सभी को इस हिंसा पर बेहद शर्मिंदगी महसूस हो रही है। पूरे यूरोप में इस तरह फैल रही अशांति एक गहरे संकट का संकेत दे रही है, जिसका सीधा असर आने वाले लंबे समय तक महाद्वीप की अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति पर पड़ना तय माना जा रहा है।

हाई स्कूल से उठी चिंगारी, जिसने पूरे देश को झुलसाया

इस व्यापक जनाक्रोश की जड़ें पेरिस के एक हाई स्कूल से जुड़ी हैं। पिछले महीने वहां शिक्षकों और सहायक कर्मचारियों की भारी कमी के विरोध में छात्रों ने आवाज उठाई थी। धीरे-धीरे यह असंतोष पूरे देश में जंगल की आग की तरह फैल गया। छात्र संगठनों ने सरकार के समक्ष 10 सूत्रीय मांग पत्र पेश किया है, जिसमें शिक्षा तंत्र में तत्काल सुधार, शिक्षकों की नई भर्तियां और विद्यार्थियों के लिए वित्तीय सहायता बढ़ाने की मांग प्रमुख है। छात्रों के समर्थन में श्रमिक और कर्मचारी संगठन भी मैदान में कूद पड़े हैं, जो अब वेतन बढ़ोतरी और पेंशन में वृद्धि की मांग को लेकर अडिग हैं।

महंगाई और अव्यवस्था के बीच उपद्रवियों की मंशा पर उठे सवाल

फ्रांस की जनता लंबे समय से आसमान छूती ईंधन कीमतों, रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की महंगाई, सामाजिक असमानता और सरकारी तंत्र के भारी खर्चों को लेकर त्रस्त थी। सार्वजनिक सेवाओं की बदहाली ने इस आग में घी का काम किया। हालांकि, प्रदर्शन की आड़ में जिस तरह सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है और नकाबपोशों द्वारा बड़े पैमाने पर दुकानों में लूटपाट की जा रही है, उससे प्रदर्शनकारियों के मूल मकसद पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

2027 में राजनीति से विराम लेंगे मैक्रों

साल 2017 से सत्ता की कमान संभाल रहे राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने प्रदर्शनकारियों को व्यवस्था में बड़े सुधारों का भरोसा दिया है। इसके बावजूद छात्र संगठनों का रुख कड़ा है; उनका साफ कहना है कि जब तक सरकार इन वादों को धरातल पर लागू नहीं करती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। ध्यान रहे कि फ्रांसीसी संविधान के अनुसार कोई भी व्यक्ति लगातार दो बार से अधिक राष्ट्रपति पद पर नहीं रह सकता, जिसके चलते मैक्रों का कार्यकाल 2027 में समाप्त हो रहा है। मैक्रों पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि कार्यकाल पूरा होने के बाद वे सक्रिय राजनीति से अल्पविराम लेंगे।

 

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