Wednesday , 21 October 2026

Mecca Defence Pact: पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के ऐतिहासिक सैन्य समझौते की शर्तें आईं सामने, 10 साल तक कोई देश नहीं हो सकता अलग; तुर्की की संसद में पहुंचा ड्राफ्ट

सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए बहुचर्चित ‘संयुक्त रक्षा समझौते’ (Mecca Joint Defence Agreement) की अंदरूनी और बेहद अहम शर्तें अब सार्वजनिक हो चुकी हैं। इस ऐतिहासिक सैन्य गठबंधन का सबसे बड़ा नियम यह है कि तीनों ही देशों को अनिवार्य रूप से कम से कम 10 वर्षों तक इस समझौते से बंधे रहना होगा। 10 साल की यह तय अवधि पूरी होने के बाद भी यदि कोई सदस्य देश गठबंधन से अलग होने का फैसला लेता है, तो उसे बाकायदा तीन महीने पहले लिखित में आधिकारिक नोटिस देना अनिवार्य होगा। इस त्रिपक्षीय समझौते का सीधा उद्देश्य पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के समीकरणों के बीच तीनों देशों की संप्रभुता, साझा सुरक्षा और सैन्य तालमेल को अभेद्य बनाना है।

मक्का में तीन दिग्गजों ने किए थे हस्ताक्षर, 16 अनुच्छेदों में बंधा गठबंधन

इस रणनीतिक समझौते की नींव 7 अगस्त 2026 को मक्का में रखी गई थी, जहां तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने औपचारिक दस्तखत किए थे। इस संधि में कुल 16 अनुच्छेद शामिल किए गए हैं। समझौते के अनुच्छेद 16 के विशेष प्रावधान के मुताबिक, 10 साल के बंधन की उलटी गिनती हस्ताक्षर वाले दिन से नहीं गिनी जाएगी, बल्कि जब गठबंधन के नवगठित सचिवालय में सभी देशों के अनुसमर्थन (Ratification) का अंतिम कानूनी दस्तावेज जमा हो जाएगा, उस तिथि से यह प्रभावी माना जाएगा। इसी के बाद किसी सदस्य के अलग होने की समयावधि का निर्धारण होगा।

एक पर हमला तो क्या बाकी दो करेंगे जवाबी सैन्य कार्रवाई?

समझौते का सबसे अहम पहलू इसका अनुच्छेद 2 है, जिसमें सामूहिक सुरक्षा का संकल्प दोहराया गया है। इसके तहत यदि गठबंधन के किसी भी एक सदस्य देश पर किसी बाहरी देश या देशों के समूह द्वारा कोई सशस्त्र हमला होता है, तो बाकी दोनों सदस्यों को पीड़ित देश की सुरक्षा के लिए फौरन आगे आना होगा। हालांकि, इसका यह मतलब कतई नहीं है कि तीनों देश हर हमले की स्थिति में एक जैसी ही जवाबी सैन्य कार्रवाई या युद्ध छेड़ देंगे। मदद का वास्तविक पैमाना, स्तर और तरीका क्या होगा, यह संकटग्रस्त देश की वास्तविक जरूरत और सहयोगी देशों के पास मौजूद तत्कालीन सैन्य संसाधनों व क्षमताओं के विस्तृत आकलन के आधार पर ही तय किया जाएगा।

तुर्की की संसद में पहुंचा प्रस्ताव, संयुक्त युद्धाभ्यास और इंटेलिजेंस शेयरिंग पर जोर

अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, तुर्की ने इस रक्षा समझौते को औपचारिक कानूनी मंजूरी दिलाने के लिए अपनी संसद में पेश कर दिया है। इस समझौते के क्रियान्वयन के साथ ही तीनों देशों की सेनाओं के बीच बड़े पैमाने पर संयुक्त सैन्य अभ्यास, सामरिक खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान और आधुनिक रक्षा उपकरणों के उत्पादन में साझेदारी को नई गति दी जाएगी।

हूती हमलों के बीच सऊदी की सुरक्षा को मिला बड़ा कवच

हाल के दिनों में सऊदी अरब के कई इलाकों पर यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा दागी जा रही बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन हमलों की घटनाओं ने रियाद की सुरक्षा चिंताएं बढ़ा दी हैं। ऐसे नाजुक दौर में इस त्रिपक्षीय गठबंधन का धरातल पर उतरना रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है। तुर्की ने इसे किसी देश के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने के बजाय विशुद्ध रक्षात्मक साझेदारी बताया है। समझौते का मुख्य ध्येय यही सुनिश्चित करना है कि किसी भी विषम परिस्थिति में सहयोगी देशों की रक्षा आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।

 

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