
नवरात्रि के पावन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की विधि-विधान से पूजा-अर्चना और उपवास करने का विशेष महत्व है। हालांकि, कई बार पूजा के दौरान अनजाने में विधि-विधान में चूक हो जाती है, किसी मंत्र का सही उच्चारण नहीं हो पाता या फिर पूजन सामग्री में कोई जरूरी चीज छूट जाती है। ऐसी स्थिति में अक्सर भक्तों के मन में संशय और भय पैदा हो जाता है कि क्या इस भूल की वजह से उनकी नौ दिनों की तपस्या और पूजा अधूरी रह जाएगी। धर्मग्रंथों और वैदिक मान्यताओं के अनुसार, इसके लिए परेशान होने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। मां भगवती अत्यंत दयालु और वात्सल्यमयी हैं। व्रत का पारण करने से पहले यदि सच्चे मन, पूर्ण समर्पण और विनम्रता के साथ एक विशेष स्तुति का पाठ कर लिया जाए, तो मां दुर्गा हर अनजानी भूल को क्षमा कर पूजा का संपूर्ण फल प्रदान करती हैं।
श्री देव्यपराध क्षमापन स्तोत्र: अज्ञानता और भूलों से मुक्ति का मार्ग
नवरात्रि अनुष्ठान अथवा देवी पूजन में हुई किसी भी प्रकार की त्रुटि के प्रायश्चित के लिए ‘श्री देव्यपराध क्षमापन स्तोत्र’ (दुर्गा क्षमा प्रार्थना) का पाठ सर्वश्रेष्ठ माना गया है। आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा रचित यह स्तोत्र भक्त और मां के बीच के निश्छल प्रेम का प्रतीक है। इसमें भक्त मां के चरणों में शीश नवाकर अपनी अज्ञानता, मंत्रहीनता और साधनहीनता को स्वीकार करता है। मान्यता है कि अष्टमी-नवमी की पूजा संपन्न होने के बाद, कन्या पूजन और पारण से ठीक पहले श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करने से पूजा में रह गई हर कमी दूर हो जाती है और अंतःकरण को असीम शांति प्राप्त होती है।
॥ श्री देव्यपराध क्षमापन स्तोत्रम् ॥
न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथा: ।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥ 1 ॥
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ 2 ॥
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहव: सन्ति सरला:
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुत: ।
मदीयोऽयं त्याग: समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ 3 ॥
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ 4 ॥
परित्यक्ता देवा विविधविधिसेवाकुलतया
मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥ 5 ॥
श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातंको रंको विहरति चिरं कोटिकनकै: ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जन: को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥ 6 ॥
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपति: ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥ 7 ॥
न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुन: ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपत: ॥ 8 ॥
नाराधितासि विधिना विविधोपचारै:
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभि: ।
श्यामे त्वमेव यदि किंचन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥ 9 ॥
आपत्सु मग्न: स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथा:
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥ 10 ॥
जगदम्ब विचित्रमत्र किं
परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।
अपराधपरम्परावृतं
न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥ 11 ॥
मत्सम: पातकी नास्ति
पापघ्नी त्वत्समा न हि ।
एवं ज्ञात्वा महादेवि
यथा योग्यं तथा कुरु ॥ 12 ॥
‘कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति’ का भावार्थ
इस स्तोत्र की मूल भावना यह है कि संसार में पुत्र कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता नहीं हो सकती। भक्त देवी से कहता है कि हे मां, मुझे न तंत्र-मंत्र का ज्ञान है, न ध्यान की विधि पता है और न ही मेरे पास पूजा के लिए पर्याप्त साधन थे। प्रमाद, आलस्य और अज्ञानतावश पूजा में जो भी गलतियां हुई हैं, उन्हें अपनी संतान की नादानी समझकर क्षमा करें।
पारण से पहले कैसे करें पाठ? इन बातों का रखें ध्यान
नवरात्रि के समापन पर व्रत का पारण करने से पहले हाथ में जल, अक्षत या पुष्प लेकर मां भगवती के समक्ष बैठें। इसके बाद शुद्ध उच्चारण के साथ ‘श्री देव्यपराध क्षमापन स्तोत्र’ का पाठ करें या विनम्र भाव से श्रवण करें। पाठ पूर्ण होने के बाद मां से मन ही मन कहें कि ‘मुझसे जो भी त्रुटि हुई हो, उसे क्षमा कर इस पूजन को स्वीकार करें।’ इसके बाद ही कन्या पूजन कराएं और स्वयं व्रत का पारण करें। सच्चे भाव से की गई यह क्षमा याचना पूजा को संपूर्णता और साधक को देवी की अक्षय कृपा प्रदान करती है।
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