
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने देश के ‘राष्ट्रीय हित’ का हवाला देते हुए रूस और ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाने वाले कानून के तहत लागू होने वाले प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों से छूट देने का बड़ा फैसला किया है। ट्रंप द्वारा शुक्रवार शाम जारी किए गए इस कार्यकारी आदेश से रूसी तेल और गैस के प्रमुख खरीदार देशों, विशेष रूप से भारत और चीन को बड़ी राहत मिली है। अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक गलियारों में अमेरिकी राष्ट्रपति के इस अचानक बदले रुख को एक बड़े कूटनीतिक ‘यू-टर्न’ के रूप में देखा जा रहा है।
प्रतिबंध लागू होने से ठीक एक दिन पहले जारी हुआ कार्यकारी आदेश
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने कार्यकारी आदेश में स्पष्ट किया, “मैं इसके तहत ग्राहम कानून में उल्लिखित प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों के प्रभावी होने से छूट प्रदान कर रहा हूं।” उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में ऐसी छूट देना सीधे तौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रीय हितों के अनुकूल है। इस निर्णय से संबंधित औपचारिक प्रमाणपत्र उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस को भी सौंप दिया है। उल्लेखनीय है कि ये दंडात्मक शुल्क और प्रतिबंध पिछले महीने ट्रंप द्वारा हस्ताक्षरित विधेयक के तहत 18 अक्तूबर से स्वतः लागू होने वाले थे, लेकिन समयसीमा खत्म होने से ठीक एक दिन पहले उन्होंने यह कदम उठाया।
क्यों बदला ट्रंप का रुख? मॉस्को से डीजल डील और जेलेंस्की पर तल्खी
ट्रंप का यह फैसला ऐसे वक्त सामने आया है जब उनका रुख रूस के प्रति लगातार नरम दिखाई दे रहा है। ट्रंप सार्वजनिक मंचों पर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की की कार्यशैली की खुलकर आलोचना कर चुके हैं और यहां तक कह चुके हैं कि यूक्रेन को अब एक नया नेतृत्व चुनना चाहिए। इसके अतिरिक्त, पिछले ही सप्ताह ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ एक अहम ऊर्जा समझौते का ऐलान किया था। इस द्विपक्षीय समझौते के तहत रूस अमेरिका को तत्काल 3 लाख टन से अधिक डीजल की आपूर्ति करेगा, जिसके बाद आगामी महीनों में अन्य बड़ी खेपें भी भेजी जाएंगी। जेलेंस्की ने वाशिंगटन और मॉस्को के बीच हुई इस डीजल डील पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे ‘कमजोर और अशोभनीय निर्णय’ करार दिया था और आरोप लगाया था कि रूस इस समझौते की कीमत यूक्रेन पर हमले तेज करके चुका रहा है।
भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ का मंडरा रहा था संकट
यदि ट्रंप प्रशासन ग्राहम कानून के प्रावधानों को पूरी तरह अमल में लाता, तो भारत से होने वाले आयात पर 100 प्रतिशत तक का भारी-भरकम टैरिफ लग सकता था। यह शुल्क अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर पहले से लागू 10 प्रतिशत शुल्क के अतिरिक्त होता, जिसे जबरन मजदूरी की रोकथाम से जुड़े नियमों के तहत लगाया गया था। हालांकि, शुल्क दरों के वास्तविक प्रभाव का सटीक आकलन आधिकारिक घोषणा के बाद ही संभव हो पाता। रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर बीते साल भी नई दिल्ली और वाशिंगटन के रिश्तों में तल्खी देखी गई थी, जब ट्रंप ने 25 प्रतिशत का अतिरिक्त टैरिफ थोप दिया था। हालांकि, फरवरी 2026 में अतिरिक्त टैरिफ को वापस ले लिया गया था और द्विपक्षीय व्यापार ढांचे के तहत जवाबी शुल्क को घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया था।
ऊर्जा सुरक्षा पर भारत का रुख: ‘1.4 अरब नागरिकों का हित सर्वोपरि’
पिछले महीने अमेरिकी कांग्रेस द्वारा प्रतिबंध विधेयक पारित किए जाने के बाद भारत ने अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया था। विदेश मंत्रालय ने दृढ़ता से कहा था कि भारत अपने व्यापारिक और आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने को प्रतिबद्ध है। विदेश मंत्रालय के बयान के अनुसार, भारत अपने 1.4 अरब नागरिकों की निर्बाध ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह संकल्पित है और इसके लिए देश विभिन्न वैश्विक स्रोतों से ऊर्जा आपूर्ति जारी रखेगा तथा बाजार के रुख के अनुसार स्वतंत्र फैसले लेता रहेगा।
क्या है ‘ग्राहम कानून’ और इसमें क्या थे कड़े प्रावधान?
‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ का मसौदा पूर्व अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर तैयार किया गया था। ग्राहम अमेरिकी संसद में यूक्रेन के कट्टर समर्थकों में शामिल थे, जिनका जुलाई 2026 में कीव दौरे से लौटने के कुछ समय बाद निधन हो गया था। इस कड़े कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले पांच देशों—भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान—से आयात होने वाले तमाम उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने के लिए 30 दिनों का समय दिया गया था। साथ ही, कानून में कई रूसी संस्थाओं को काली सूची में डालने और अमेरिका में आयात होने वाले रूसी ऊर्जा उत्पादों पर 500 प्रतिशत तक का शुल्क लगाने का प्रावधान भी शामिल था। इस एक महीने की अंतिम समयसीमा 18 अक्तूबर को समाप्त हो रही थी, जिस पर ट्रंप ने ऐन वक्त पर रोक लगा दी।
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