
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के भीतर सियासी बिसात बिछने लगी है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीटों के तालमेल पर औपचारिक बातचीत शुरू होने से ठीक पहले कांग्रेस हाईकमान ने प्रदेश संगठन में बड़ा फेरबदल करते हुए आराधना मिश्रा ‘मोना’ को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नया अध्यक्ष नियुक्त कर दिया है। रामपुर खास से तीन बार की विधायक आराधना मिश्रा और उनके पिता, वरिष्ठ सांसद प्रमोद तिवारी के समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ मधुर और पुराने राजनीतिक संबंध रहे हैं। हालांकि, प्रदेश कांग्रेस की शीर्ष कोर टीम में सहारनपुर सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने से सियासी समीकरण बेहद दिलचस्प हो गए हैं, क्योंकि मसूद समय-समय पर सपा के रुख पर खुलकर सवाल खड़े करते रहे हैं। इसके साथ ही स्वामी प्रसाद मौर्य की पार्टी ‘अपनी जनता पार्टी’ (AJP) के कांग्रेस के पाले में आने से सीटों के बंटवारे का पेंच और उलझ गया है।
150 से शुरू होकर 100 से कम पर समझौता न करने की जिद
कांग्रेस संगठन के भीतर से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, पार्टी इस बार सपा के सामने बैकफुट पर खेलने के मूड में बिल्कुल नहीं है। प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि ‘संगठन सृजन’ अभियान के जरिए पार्टी ने राज्य की सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में अपना सांगठनिक ढांचा खड़ा कर लिया है। आंतरिक रणनीतिक बैठकों में कांग्रेस का साफ रुख है कि सीटों के बंटवारे की बातचीत का आगाज भले ही 150 सीटों की मांग के साथ किया जाएगा, लेकिन पार्टी किसी भी सूरत में 100 सीटों से कम पर राजी नहीं होगी। पार्टी का मानना है कि जमीन पर कार्यकर्ता तभी मजबूती से लड़ेंगे जब दोनों सहयोगी दल सभी 403 सीटों पर संगठन को सक्रिय रखें।
कांग्रेस की अपनी ‘सोशल इंजीनियरिंग’: ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम समीकरण
सपा के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के समानांतर कांग्रेस ने भी प्रदेश में अपना मजबूत सामाजिक समीकरण तैयार किया है। प्रदेश नेतृत्व की कमान ब्राह्मण चेहरे के तौर पर आराधना मिश्रा को सौंपी गई है, जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मजबूत पकड़ रखने वाले मुस्लिम नेता इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर अहम जिम्मेदारी दी गई है। वहीं, दलित नेतृत्व के रूप में प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम की मौजूदगी से बहुजन समाज पार्टी का एक बड़ा कोर इकोसिस्टम कांग्रेस की ओर आकर्षित हो रहा है। गौतम स्वयं को कांशीराम के विचारों का सच्चा पैरोकार बताते हुए मायावती को गठबंधन में शामिल करने की संभावनाओं से भी इनकार नहीं कर रहे हैं।
सपा का गणित: ’60 सीटों से ज्यादा का औचित्य नहीं’
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी के रणनीतिकारों का तर्क बिल्कुल उलट है। सपा सूत्रों का कहना है कि 100 सीटों की मांग जमीनी हकीकत से परे और अत्यधिक है। सपा का आकलन है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में 6 सीटें जीती थीं, जिसके अनुपात में विधानसभा स्तर पर उसकी दावेदारी अधिकतम 30 से 60 सीटों के बीच ही बनती है। इसके उलट, कांग्रेस नेताओं का पलटवार है कि यदि इसी फॉर्मूले को माना जाए तो 37 लोकसभा सीटें जीतने वाली सपा को भी 185 सीटों तक ही सीमित रहना चाहिए, जबकि चुनावी गठबंधन गणित के सीधे जोड़-घटाव से कहीं ज्यादा राजनीतिक प्रभाव और माहौल पर निर्भर करते हैं।
2022 का सबक बनाम 2024 का उत्साह, राहुल-अखिलेश की मेज पर सुलझेगा पेंच
उत्तर प्रदेश के हालिया चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने आरएलडी, सुभासपा, अपना दल (कमेरावादी) और महान दल जैसे क्षेत्रीय दलों का बड़ा मोर्चा बनाकर चुनाव लड़ा था, लेकिन गठबंधन 111 सीटों पर ही सिमट गया था (हालांकि भाजपा की सीटें 57 घटी थीं)। इसके विपरीत, 2024 के आम चुनाव में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ सीधी साझेदारी की और दोनों दलों ने मिलकर राज्य की 80 में से 43 लोकसभा सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की।
इस बड़ी कामयाबी और लोकसभा में राहुल गांधी के नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद कांग्रेस का सियासी वजन काफी बढ़ा है। यही वजह है कि दोनों दलों के बीच बयानबाजी और मोलभाव का दौर चाहे जितना तेज दिखे, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अंतिम मुहर राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव के बीच आमने-सामने होने वाली शीर्ष बैठक में ही लगेगी, जहां दोनों दल मिलकर भाजपा को सीधी चुनौती देने का रास्ता निकालेंगे।
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