Wednesday , 21 October 2026

विधानसभा चुनाव से 5 महीने पहले पंजाब कांग्रेस में बड़ा फेरबदल, वड़िंग की छुट्टी… समझिए 12 राज्यों के डराने वाले आंकड़े

पंजाब विधानसभा चुनाव की बिसात बिछने से ठीक पांच महीने पहले कांग्रेस आलाकमान ने बड़ा राजनीतिक दांव चलते हुए प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग से इस्तीफा ले लिया है। राजा वड़िंग पिछले साढ़े चार साल से पंजाब कांग्रेस की कमान संभाल रहे थे, लेकिन चुनावी मोड़ पर नेतृत्व परिवर्तन का यह फैसला पार्टी के पुराने इतिहास को देखते हुए कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। कांग्रेस के लिए चुनावी मुहाने पर प्रदेश प्रमुख बदलने का यह कोई पहला प्रयोग नहीं है। 2019 से लेकर अब तक पार्टी ने 12 अलग-अलग राज्यों में विधानसभा चुनावों से ऐन पहले अपने प्रदेश अध्यक्ष बदले हैं, जिनमें से 10 राज्यों में पार्टी को करारी पराजय का सामना करना पड़ा।

2019 से अब तक 12 राज्यों में नेतृत्व परिवर्तन, 10 जगह मिली मात

चुनावी इतिहास के पन्ने बताते हैं कि आखिरी वक्त में सेनापति बदलने का कांग्रेस का फॉर्मूला अमूमन नाकाम साबित हुआ है। साल 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से ठीक तीन महीने पहले पार्टी ने दिग्गज नेता अशोक चव्हाण को हटाकर बालासाहेब थोरात को सूबे की कमान दी, लेकिन चुनावी नतीजों में कांग्रेस खिसककर चौथे नंबर की पार्टी बन गई। उसी साल हरियाणा में चुनाव से महज 47 दिन पहले अशोक तंवर की विदाई कर कुमारी शैलजा को अध्यक्ष पद सौंपा गया, जहां पार्टी को भारी शिकस्त झेलनी पड़ी और बाद में शैलजा ने भी प्रदेश की सक्रिय सियासत से दूरी बना ली। वहीं 2019 में झारखंड के भीतर अजय कुमार की जगह रामेश्वर उरांव को अध्यक्ष बनाया गया; हालांकि जेएमएम गठबंधन के दम पर सरकार जरूर बन गई, पर सत्ता में कांग्रेस की हैसियत बेहद कमजोर रही।

बंगाल में शून्य तो छत्तीसगढ़ में सत्ता गंवाई

साल 2020 में पश्चिम बंगाल चुनाव से सात महीने पहले पार्टी ने फायरब्रांड नेता अधीर रंजन चौधरी पर दांव लगाया, लेकिन 2021 के नतीजों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया और पार्टी शून्य पर सिमट गई। इसी क्रम में 2021 के त्रिपुरा चुनाव से पहले बिराजीत सिन्हा को अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन वे भी कोई चुनावी चमत्कार नहीं दिखा सके। साल 2023 में छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव से चार महीने पहले कांग्रेस ने मोहन मरकाम को हटाकर दीपक बैज को अध्यक्ष की कुर्सी सौंपी। उस समय राज्य में भूपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस की मजबूत सरकार थी, लेकिन चुनाव में पार्टी सत्ता से बाहर हो गई और खुद प्रदेश अध्यक्ष बैज अपने गृह क्षेत्र तक में पार्टी को जीत नहीं दिला सके।

जम्मू-कश्मीर से बिहार, असम और दिल्ली तक फ्लॉप रहे प्रयोग

साल 2024 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव से पहले विकास रसूल वानी की जगह तारिक हमीद कर्रा को घाटी की कमान दी गई। वहां नेशनल कॉन्फ्रेंस गठबंधन की सरकार बनने के बावजूद कांग्रेस को संगठनात्मक स्तर पर कोई खास राजनीतिक फायदा नहीं मिला। 2024 में ही झारखंड में चुनाव से तीन महीने पहले राजेश सिंह को हटाकर केशव महतो कमलेश को लाया गया, जहां जेएमएम का सियासी दबदबा और बढ़ गया जबकि कांग्रेस मंत्रिमंडल में तरजीह पाने के लिए संघर्ष करती दिखी।

साल 2025 में भी यही सिलसिला जारी रहा। बिहार में विधानसभा चुनाव से आठ महीने पहले अखिलेश प्रसाद सिंह की जगह दलित चेहरे के तौर पर राजेश राम को अध्यक्ष बनाया गया, जहां कांग्रेस बुरी तरह धराशायी हुई और खुद राजेश राम अपनी विधानसभा सीट भी नहीं बचा पाए। असम में चुनाव से 11 महीने पहले भूपेन बोरा की जगह सांसद गौरव गोगोई को प्रदेश की कमान सौंपी गई, मगर गोगोई खुद अपना चुनाव हार गए और पार्टी महज 18 सीटों पर सिमट गई। दिल्ली में भी चुनाव से पहले देवेंद्र यादव को आगे किया गया, लेकिन देश की राजधानी में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुल सका। इस लंबे दौर में एकमात्र अपवाद केरल रहा, जहां 2025 में संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के करीबी सनी जोसेफ को अध्यक्ष बनाया गया और 2026 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सरकार बनाने में सफल रही।

पंजाब में 2022 का दांव भी पड़ा था उल्टा, इस बार राह और मुश्किल

पंजाब की बात करें तो कांग्रेस को पिछली बार भी चुनाव से ठीक पहले नेतृत्व बदलना बेहद भारी पड़ा था। 2022 के विधानसभा चुनाव से सात महीने पहले सुनील जाखड़ को हटाकर नवजोत सिंह सिद्धू को कमान सौंपी गई थी। इतना ही नहीं, सत्ता में बैठी पार्टी ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया था। इस दोहरे फेरबदल के बावजूद कांग्रेस सत्ता में वापसी नहीं कर पाई और तत्कालीन सीएम चन्नी खुद अपनी दोनों सीटों से चुनाव हार गए।

आगामी विधानसभा चुनाव में भी पंजाब कांग्रेस की राह कांटों भरी नजर आ रही है। संगठन के भीतर गुटबाजी चरम पर है, वहीं राज्य के सियासी पटल पर ‘वारिस दा पंजाब’ संगठन का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। दूसरी ओर सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी की जमीनी पकड़ मजबूत है और भारतीय जनता पार्टी भी खुद गृह मंत्री अमित शाह की अगुवाई में आक्रामक प्रचार के साथ चुनावी रण में ताल ठोक चुकी है। ऐसे में राजा वड़िंग की विदाई के बाद कांग्रेस के सामने पुराने इतिहास को झुठलाते हुए वापसी की उम्मीद जगाने की बड़ी चुनौती है।

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