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पीएम मोदी का 76वां जन्मदिन: वडनगर के चाय स्टॉल से सत्ता के शीर्ष तक, 25 वर्षों के बेमिसाल सफर की पूरी दास्तान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 सितंबर को अपना 76वां जन्मदिन मना रहे हैं। इस बार का जन्मदिन उनके सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन के लिहाज से ऐतिहासिक पड़ाव लेकर आया है। 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में पहली बार संवैधानिक पद की शपथ लेने वाले नरेंद्र मोदी के सत्ता के शीर्ष पर लगातार 25 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस खास उपलब्धि पर भारतीय जनता पार्टी 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक पूरे देश में महीने भर चलने वाले ‘सेवा संकल्प अभियान’ का आयोजन कर रही है, जिसके अंतर्गत देशव्यापी सेवा कार्य और व्यापक जनसंपर्क कार्यक्रम चलाए जाएंगे। एक सामान्य परिवार से निकलकर देश के प्रधान सेवक बनने तक का यह सफर कई चुनौतीपूर्ण और रोचक पड़ावों से होकर गुजरा है।

वडनगर से शुरू हुआ संघर्ष और देशभक्ति का जज्बा नरेंद्र मोदी का जन्म 17 सितंबर 1950 को गुजरात के मेहसाणा जिले के वडनगर में दामोदरदास मूलचंद मोदी और हीराबेन के घर हुआ। साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि के बीच उन्होंने 1955 में वडनगर प्राथमिक कुमार शाला से अपनी प्रारंभिक शिक्षा शुरू की। परिवार का हाथ बंटाने के लिए 1957 के आसपास वे स्कूल की पढ़ाई के बाद अपने पिता की रेलवे स्टेशन स्थित चाय की दुकान पर मदद करने लगे। 1962 के भारत-चीन युद्ध ने बालक नरेंद्र के मन में राष्ट्रसेवा की गहरी भावना जगाई, जिसके चलते उन्होंने जामनगर के सैनिक स्कूल बालाचड़ी में प्रवेश के लिए प्रयास किया। करीब 12 साल की आयु में उन्होंने गोरक्षा के समर्थन में पहला उपवास भी रखा। वहीं 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय वे मेहसाणा स्टेशन से गुजरने वाले भारतीय सैनिकों को चाय पिलाकर उनकी सेवा में जुटे रहते थे।

आध्यात्मिक खोज, बेलूर मठ से हिमालय तक की यात्रा 1967 में बीएन हाई स्कूल से माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के बाद महज 17 वर्ष की उम्र में उन्होंने आध्यात्मिक खोज में घर छोड़ दिया। इस दौरान उनकी भेंट एकनाथ रानाडे से हुई और वे कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानंद रॉक मेमोरियल के निर्माण हेतु एक-एक रुपये का चंदा जुटाने के जन-अभियान से जुड़े। 1968 में वे कोलकाता के बेलूर मठ पहुंचे और रामकृष्ण मिशन से जुड़ने की इच्छा जताई, लेकिन औपचारिक डिग्री पूरी करने की सलाह के बाद वे असम, सिलीगुड़ी होते हुए अल्मोड़ा के अद्वैत आश्रम पहुंचे। कड़ाके की ठंड में गरुड़ चट्टी की गुफाओं में ध्यान लगाने और आपदा के समय राहत कार्यों में जुटने के बाद उन्होंने उत्तर भारत के विस्तृत भूभाग का भ्रमण किया। अंततः राजकोट रामकृष्ण मिशन में स्वामी आत्मस्थानंद ने उन्हें सन्यास के बजाय कर्मयोग और समाजसेवा के मार्ग पर चलने का पाथेय दिया।

आरएसएस प्रचारक के रूप में संगठन का विस्तार करीब डेढ़ वर्ष की यात्रा के बाद 1970 में वडनगर लौटकर वे अहमदाबाद चले गए, जहां उन्होंने गीता मंदिर बस स्टैंड के पास अपने चाचा बाबूभाई की कैंटीन में काम शुरू किया। पास ही स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के डॉ. हेडगेवार भवन में नियमित आवाजाही से वे संघ के संपर्क में आए। 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के समर्थन में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में हुए सत्याग्रह में भाग लेने पर उन्हें गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेजा गया। 1972 में वे पूर्णकालिक प्रचारक बने और सुबह पांच बजे से देर रात तक संगठन को मजबूत करने में जुट गए। 1974 के नवनिर्माण आंदोलन और 1975 के आपातकाल के दौरान उन्होंने भूमिगत रहकर गुजरात लोक संघर्ष समिति के जरिए तानाशाही के खिलाफ कड़ा संघर्ष किया। उनकी कार्यकुशलता को देखते हुए 1978 में वडोदरा-मध्य गुजरात का विभाग प्रचारक और 1980 में संभाग प्रचारक बनाया गया।

भाजपा में रणनीतिकार की भूमिका और राष्ट्रीय पटल पर दस्तक 1987 में नरेंद्र मोदी को भाजपा संगठन में भेजा गया, जहां उन्होंने गुजरात प्रदेश संगठन सचिव का पद संभाला। उनके रणनीतिक कौशल के दम पर भाजपा ने अहमदाबाद नगर निगम में ऐतिहासिक जीत दर्ज की। 1989 की लोक शक्ति यात्रा और 1990 के गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 67 सीटें जीतीं। 1991 में डॉ. मुरली मनोहर जोशी की कन्याकुमारी से कश्मीर तक की ऐतिहासिक ‘एकता यात्रा’ के संयोजक के तौर पर उन्होंने अपनी अद्वितीय सांगठनिक क्षमता का लोहा मनवाया। 1995 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 121 सीटों के साथ पहली बार पूर्ण बहुमत मिला। उनकी क्षमताओं को देखते हुए 1998 में उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बनाकर दिल्ली बुलाया गया, जहां उन्होंने 1999 के लोकसभा चुनाव सहित कई राज्यों के चुनावों में पार्टी के अभियान की कमान संभाली।

7 अक्टूबर 2001: आपदा के बीच संभाली गुजरात की कमान तमाम संगठनात्मक अनुभवों के बाद 7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यह वह दौर था जब राज्य 26 जनवरी 2001 के विनाशकारी भुज भूकंप की त्रासदी से जूझ रहा था। मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने गुजरात राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (GSDMA) के जरिए दुनिया का सबसे प्रभावी ‘ओनर ड्रिवन रीकंस्ट्रक्शन’ (मालिक-आधारित पुनर्वास) मॉडल जमीन पर उतारा। उनके इस संकट प्रबंधन और पुनर्वास मॉडल की सराहना वैश्विक स्तर पर हुई, जिसकी रूपरेखा आगे चलकर देश के 2005 के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम की आधारशिला बनी। यहीं से सुशासन, विकास और आत्मनिर्भरता का वह सफर शुरू हुआ जो आज वैश्विक मंच पर भारत का नेतृत्व कर रहा है।

 

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