
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का अलीगंज इलाका बीते दिनों एक ऐसी चीख का गवाह बना, जिसने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया। अलीगंज सेक्टर-डी स्थित एक चार मंजिला व्यावसायिक इमारत में हुए भीषण अग्निकांड में 15 हंसते-खेलते छात्रों की दर्दनाक मौत हो गई। यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि रसूखदारों, मकान मालिक और भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र के गठजोड़ से किया गया एक सुनियोजित कत्ल है। एक समाज और जागरूक नागरिक के नाते अब हमें यह कड़ा संकल्प लेना होगा कि हम अपने बच्चों को ऐसे ‘मौत के बंकरों’ में भेजने से पहले वहां की सुरक्षा खुद जांचेंगे। वहीं, सरकार को भी एलडीए (LDA) और बिजली विभाग के उन भ्रष्ट चेहरों को बेनकाब कर सलाखों के पीछे भेजना होगा, जिन्होंने चंद रुपयों के लालच में 15 परिवारों को जीवन भर का रोना दे दिया।
इस दिल दहला देने वाले अग्निकांड की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे वो 10 आत्मघाती कमियां सामने आ रही हैं, जिन्होंने मासूम बच्चों को सीधे मौत के मुंह में धकेल दिया। आइए जानते हैं इस ‘डेथ ट्रैप’ की वो खौफनाक सच्चाई:

1. कवर्ड एरिया 100%: लालच में 40% खुली जगह को निगल गए
बिल्डिंग बायलॉज और सरकारी नियमों के मुताबिक, किसी भी व्यावसायिक या आवासीय भूखंड पर निर्माण करते समय लगभग 35 से 40 प्रतिशत हिस्सा खुला (Open Space) छोड़ना अनिवार्य होता है। यह नियम इसलिए है ताकि आपातकाल में वेंटिलेशन रहे और राहत व बचाव कार्य आसानी से किया जा सके। लेकिन इस इमारत के मालिक वीरेंद्र शुक्ला ने लालच की सारी हदें पार करते हुए शत-प्रतिशत (100%) एरिया में कंक्रीट का जाल बिछा दिया और खुली जगह का नामोनिशान मिटा दिया।
2. अफसरों की रहस्यमयी सांठगांठ और ‘कागजी’ नक्शा
जब नियमतः 40 फीसदी जगह खाली छोड़नी थी, तो लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के इंजीनियरों और सुपरवाइजरों ने इस अवैध भवन का नक्शा कैसे पास होने दिया? या तो यह पूरी तरह से अवैध निर्माण था जिस पर हर महीने मलाई खाकर आंखें मूंद ली गईं, या फिर मोटी रकम के दम पर कागजों में हेरफेर किया गया। यह प्रशासनिक भ्रष्टाचार का सबसे जीवंत और बड़ा सबूत है, जिसने आज 15 बच्चों की जान ले ली।
3. केवल एक ही संकरा निकास, कोई इमरजेंसी एग्जिट नहीं
इस बहुमंजिला इमारत में एक साथ एनीमेशन कोचिंग सेंटर, गेमिंग स्टूडियो, लाइब्रेरी और पेट शॉप चल रहे थे, जहां हर वक्त सैकड़ों युवाओं की मौजूदगी रहती थी। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि पूरी बिल्डिंग में आने-जाने के लिए केवल एक ही संकरा रास्ता और बेहद पतली सीढ़ी थी। आपातकालीन निकास (Emergency Exit) की कोई व्यवस्था नहीं थी। जब आग ग्राउंड या फर्स्ट फ्लोर पर भड़की, तो एकमात्र रास्ता धुएं और लपटों से घिर गया, जिससे बच्चों के भागने का रास्ता पूरी तरह ब्लॉक हो गया।
4. लॉक सिस्टम; छत का दरवाजा ही बन गया ‘मौत का जाल’
ग्राउंड फ्लोर पर आग लगने के बाद जान बचाने के लिए कई बच्चे स्वाभाविक प्रतिक्रिया के तहत भागकर छत की तरफ गए। बच्चों को उम्मीद थी कि वे छत पर जाकर सुरक्षित हो जाएंगे, लेकिन वहां उनकी उम्मीदें टूट गईं। भवन मालिक ने सुरक्षा या किसी अन्य बहाने से छत के मुख्य दरवाजे पर कड़ा ‘लॉक सिस्टम’ लगा रखा था। जहरीले धुएं के गुबार और घबराहट के बीच बच्चे उस ताले को खोल नहीं पाए और दम घुटने से वहीं तड़प-तड़प कर ढेर हो गए।
5. वेंटिलेशन की भारी कमी, गैस चैंबर में तब्दील हुई बिल्डिंग
शवपोस्टमार्टम और शुरुआती फॉरेंसिक जांच में सामने आया है कि ज्यादातर बच्चों की मौत आग से जलने के बजाय दम घुटने (Suffocation) से हुई। पूरी बिल्डिंग को आधुनिक दिखाने के चक्कर में चारों तरफ से शीशों और कंक्रीट से इस तरह पैक किया गया था कि जहरीला धुआं बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था। छत का दरवाजा बंद होने और खिड़कियां न होने से चंद मिनटों में ही पूरी इमारत एक कसाईखाने और गैस चैंबर में बदल गई।

6. बिजली का लोड: स्वीकृत 20 किलोवाट, खपत पहुंच गई 34 पार!
पावर सेफ्टी और विद्युत नियमों की सबसे खौफनाक अनदेखी इस बिल्डिंग के बिजली कनेक्शन में देखने को मिली। इमारत के लिए कागजों पर केवल 20 किलोवाट का घरेलू/मिश्रित कनेक्शन लिया गया था। इसके विपरीत, भीतर चल रहे दर्जनों एसी, हाई-एंड कंप्यूटर, स्टूडियो लाइट्स और पेट शॉप के हैवी एप्लायंसेज के कारण वास्तविक लोड 34 किलोवाट के करीब पहुंच रहा था। इतने भारी ओवरलोड के कारण ही मुख्य केबल पिघली, शॉर्ट-सर्किट हुआ और एसी ब्लास्ट कर गया।
7. स्मोक डिटेक्टर्स और अलार्म सिस्टम का पूरी तरह गायब होना
अग्निशमन अधिकारियों के मुताबिक, अगर इमारत में बुनियादी स्मोक डिटेक्टर और अलार्म सिस्टम लगे होते, तो आग लगते ही या धुआं उठते ही हूटर (अलार्म) बज जाता। इससे कोचिंग में पढ़ रहे बच्चों और शिक्षकों को स्थिति को समझने और तुरंत बाहर भागने के लिए 3 से 5 मिनट का बेहद कीमती और जीवन रक्षक समय मिल जाता। अलार्म न होने से जब तक ऊपरी मंजिल के बच्चों को पता चला, तब तक सीढ़ियां मौत का रास्ता बन चुकी थीं।
8. फायर एक्सस्टिंग्यूशर (अग्निशामक सिलेंडर) का नामोनिशान नहीं
शुरुआती तफ्तीश में यह बात भी साफ हो गई है कि तीनों में से किसी भी व्यावसायिक प्रतिष्ठान (कोचिंग, स्टूडियो या पेट क्लिनिक) में आग बुझाने वाले सिलेंडर (Fire Extinguishers) नहीं रखे थे। अगर वहां एक-दो चालू सिलेंडर भी मौजूद होते, तो शुरुआत में ही एसी में लगी छोटी सी चिंगारी पर काबू पाया जा सकता था और इसे एक भीषण और दर्दनाक अग्निकांड बनने से आसानी से रोका जा सकता था।
9. बिना ‘फायर एनओसी’ के धड़ल्ले से चल रहा था मौत का व्यापार
नियमों के अनुसार, किसी भी ऐसे संस्थान या लाइब्रेरी को चलाने से पहले जहां 20 से अधिक बच्चे एक साथ बैठते हों, मुख्य अग्निशमन अधिकारी से ‘फायर एनओसी’ (अनापत्ति प्रमाण पत्र) लेना कानूनी रूप से अनिवार्य है। फायर विभाग की टीम मौके पर आकर आपातकालीन रास्तों और सुरक्षा उपकरणों की जांच करती है। लेकिन यहां मकान मालिक और कोचिंग संचालकों ने इस अनिवार्य नियम को पूरी तरह रद्दी की टोकरी में डाल दिया था।
10. रिहायशी इलाके में ‘बिल्डिंग बायलॉज’ का सरेआम उल्लंघन
एक शांत आवासीय और मिश्रित कॉलोनी के भीतर चल रही इस अवैध कमर्शियल बिल्डिंग का कभी कोई सेफ्टी ऑडिट नहीं हुआ। कोचिंग संस्थान और एनीमेशन स्टूडियो जैसे संवेदनशील प्रतिष्ठानों को संचालित करने के लिए जो कड़े ‘बिल्डिंग बायलॉज’ (जैसे चौड़े कॉरिडोर, पैनिक बटन, वेंटिलेटेड शाफ्ट) होने चाहिए, उनका यहां दूर-दूर तक कोई वजूद नहीं था। यह भ्रष्ट तंत्र का वो काला खेल है, जिसने आज लखनऊ के 15 परिवारों के चिराग बुझा दिए। अब समय आ गया है कि इन ‘मौत के सौदागरों’ पर बुलडोजर एक्शन के साथ ऐसी कठोरतम कार्रवाई हो जो नजीर बने।
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