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लखनऊ: किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के यूरोलॉजी विभाग में हुए करीब 2.5 करोड़ रुपये के दवा घोटाले के बाद हड़कंप मच गया है। इस महाघोटाले से सबक लेते हुए केजीएमयू प्रशासन ने अब उन सभी सातों विभागों में गहन स्पेशल ऑडिट कराने का एक बड़ा फैसला लिया है, जहां कैंसर मरीजों का इलाज और महंगी कीमोथेरेपी की जाती है। इस जांच के दायरे में 5,000 रुपये से अधिक कीमत वाली सभी दवाओं के बिल, वाउचर और पर्चे आएंगे। दूसरी तरफ, उत्तर प्रदेश शासन ने भी इस मामले का कड़ा संज्ञान लेते हुए पिछले वित्तीय वर्ष में मुफ्त इलाज के लिए जारी किए गए बजट और लाभान्वित मरीजों की सत्यापित सूची तलब कर ली है।
इन 7 विभागों में खंगाला जाएगा पिछले 5 महीनों का पूरा रिकॉर्ड
केजीएमयू के जिन सात प्रमुख विभागों में कैंसर पीड़ितों का इलाज होता है, वहां ऑडिट के लिए पांच सदस्यीय विशेष जांच कमेटी का गठन किया गया है। इन विभागों में शामिल हैं:
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रेडियोथेरेपी (Radiotherapy)
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सर्जिकल आंकोलॉजी (Surgical Oncology)
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यूरोलॉजी (Urology)
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स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग (Obstetrics & Gynaecology)
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गायनी आंकोलॉजी (Gynecological Oncology)
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मेडिकल आंकोलॉजी (Medical Oncology)
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इंडोक्राइन सर्जरी विभाग (Endocrine Surgery)
जांच कमेटी बीते 5 महीनों के भीतर असाध्य रोग योजना, बीपीएल (BPL) और विपन्न श्रेणी के तहत मुफ्त इलाज पाने वाले मरीजों का पूरा कच्चा-चिट्ठा खंगालेगी। इसमें मरीजों के नाम, पते, मोबाइल नंबर, राशन कार्ड, डॉक्टर के पर्चे, भर्ती के दस्तावेज और उन्हें दी गई दवाओं के ब्यौरे का गहन मिलान किया जाएगा। विशेष रूप से महंगी कीमोथेरेपी और इम्यूनोथेरेपी (Immunotherapy) वाले मामलों की अलग से फोरेंसिक स्क्रूटनी होगी।
3 कर्मचारी बर्खास्त, रिकवरी शुरू; अब वित्तीय गड़बड़ी पर नपेंगे विभागाध्यक्ष
केजीएमयू के प्रवक्ता डॉ. केके सिंह ने बताया कि यूरोलॉजी विभाग में ढाई करोड़ के दवा घोटाले के मामले में त्वरित एक्शन लेते हुए तीन आरोपी कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया गया है। आउटसोर्सिंग के जरिए कर्मचारी उपलब्ध कराने वाली सेवा प्रदाता एजेंसी को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया है और घोटाले की रकम की वसूली (Recovery) की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है।
इस घटना से सबक लेते हुए भविष्य के लिए कड़े नियम लागू किए गए हैं। अब केजीएमयू में किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता (Financial Irregularity) पाए जाने पर सीधे तौर पर संबंधित विभागाध्यक्ष (HOD) की जवाबदेही तय की जाएगी। विभागाध्यक्षों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे किसी भी सरकारी योजना या खरीद से जुड़े प्रस्ताव और दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से पहले उसकी पूरी सत्यता जांच लें।
घोटाले रोकने के लिए OTP आधारित डिजिटल व्यवस्था, इमरजेंसी फंड भी बंद
अस्पताल में भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े की गुंजाइश को पूरी तरह खत्म करने के लिए केजीएमयू प्रशासन कई अहम प्रक्रियाओं को ऑनलाइन (Digitalization) करने जा रहा है। नई व्यवस्था के तहत:
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किसी भी सरकारी योजना के माध्यम से जब दवा, सर्जिकल आइटम या उपकरण का इंडेंट (मांग पत्र) जनरेट किया जाएगा, तो वह ओटीपी (OTP) आधारित सत्यापन के बाद ही पास होगा।
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यह ओटीपी मरीज के पंजीकृत मोबाइल नंबर और संबंधित विभाग के नोडल अधिकारी दोनों के पास एक साथ जाएगा, जिससे फर्जी मरीजों के नाम पर दवाएं निकालना नामुमकिन हो जाएगा।
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इसके अलावा, केजीएमयू में पहले से चली आ रही 20 हजार रुपये तक के इमरजेंसी फंड व्यवस्था को पूरी तरह बंद कर दिया गया है। डॉक्टरों को मरीजों की तत्काल जरूरत के लिए यह नकद राशि दी जाती थी, लेकिन इसमें गड़बड़ी की आशंका को देखते हुए इसे तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया गया है।
उत्तर प्रदेश शासन सख्त, चिकित्सा शिक्षा विभाग ने तलब की पूरी रिपोर्ट
यूरोलॉजी विभाग की इस गंभीर आपराधिक साजिश पर उत्तर प्रदेश शासन की नजरें भी टेढ़ी हो गई हैं। चिकित्सा शिक्षा विभाग के अनु सचिव ज्ञानेंद्र कुमार शुक्ला ने केजीएमयू की कुलसचिव (Registrar) अर्चना गहरवार को एक कड़ा पत्र भेजा है। इस पत्र के माध्यम से वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान बीपीएल, अंत्योदय, लावारिस और विपन्न कल्याण योजना के तहत मुफ्त इलाज पाने वाले सभी मरीजों का पूरा डेटा मांगा गया है। शासन ने केजीएमयू प्रशासन से विभागवार सत्यापित मरीजों की सूची, उनके मोबाइल नंबर और इलाज से जुड़े आधिकारिक दस्तावेजों की हार्ड कॉपी तुरंत भेजने के निर्देश दिए हैं ताकि सरकारी धन की हेराफेरी करने वाले बड़े चेहरों को बेनकाब किया जा सके।
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