Thursday , 21 May 2026

इस्तीफे के बाद भी नहीं थमीं पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा की मुश्किलें; लोकसभा अध्यक्ष को सौंपी गई जांच रिपोर्ट, जानिए अब क्या होगा आगे ?

नई दिल्ली।   इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा की मुश्किलें पद छोड़ने के बाद भी कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। उनके खिलाफ लगे गंभीर आरोपों की जांच कर रही तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति ने आखिरकार अपनी गोपनीय रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दी है। इस कदम के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले संसद सत्र में इस मुद्दे पर भारी हंगामा देखने को मिल सकता है।

संसद के दोनों सदनों में रखी जाएगी रिपोर्ट; कानूनी प्रक्रिया तेज

लोकसभा सचिवालय द्वारा साझा की गई आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत पूरी वैधानिक प्रक्रिया का पालन करते हुए यह रिपोर्ट सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष को सुपुर्द की गई। इस जांच रिपोर्ट को बेहद जल्द संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के पटल पर विचार के लिए पेश किया जाएगा। हालांकि न्यायमूर्ति वर्मा पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं, लेकिन इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद उनके खिलाफ कानूनी शिकंजा और कस सकता है।

दिल्ली वाले सरकारी बंगले में मिली थीं जले हुए नोटों की गड्डियां

यह पूरा हाई-प्रोफाइल मामला पिछले साल तब अचानक सुर्खियों में आया था, जब न्यायमूर्ति वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर छापेमारी के दौरान कथित रूप से जले हुए नोटों की गड्डियां बरामद हुई थीं। देश के एक वरिष्ठ न्यायाधीश के घर से इस तरह नोट बरामद होने की घटना ने पूरे न्यायिक और राजनीतिक गलियारे में हड़कंप मचा दिया था। इस सनसनीखेज मामले के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों ने एकजुट होकर उनके खिलाफ महाभियोग (Impeachment) चलाने के प्रस्ताव का नोटिस दिया था, जिसे स्वीकार करते हुए यह जांच शुरू की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट के जज और बॉम्बे HC के चीफ जस्टिस की कमेटी ने की जांच

मामले की संवेदनशीलता और गंभीरता को देखते हुए एक बेहद कड़क और निष्पक्ष जांच समिति का गठन किया गया था। इस तीन सदस्यीय समिति में उच्चतम न्यायालय के माननीय न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, बंबई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति चन्द्रशेखर और कर्नाटक उच्च न्यायालय के बेहद वरिष्ठ वकालत विशेषज्ञ बी.वी. आचार्य शामिल थे। इस विशेष समिति का पुनर्गठन इसी साल 25 फरवरी को किया गया था, जिसने रिकॉर्ड समय में अपनी जांच पूरी की है।

इस्तीफे से महाभियोग तो टला, पर कानूनी पचड़े से बचना मुश्किल

चारों तरफ से बढ़ते चौतरफा दबाव और विवादों के बीच, न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने पिछले महीने 10 अप्रैल को अपना इस्तीफा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दिया था। वैधानिक नियमों के मुताबिक, उनके पद छोड़ते ही संसद में चलने वाली महाभियोग की कार्यवाही तकनीकी रूप से निष्प्रभावी (बेअसर) हो गई, क्योंकि महाभियोग केवल पद पर बने हुए जज को हटाने के लिए लाया जाता है। लेकिन, जांच समिति ने अपने कदम पीछे नहीं खींचे और भ्रष्टाचार व अन्य आरोपों से जुड़ी जांच को जारी रखा। अब जबकि यह रिपोर्ट संसद में पेश होने वाली है, देश के कानूनी और राजनीतिक मंच पर एक नई बहस छिड़ना पूरी तरह तय माना जा रहा है।

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