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इजरायल-ईरान युद्ध: आखिर क्यों नेतन्याहू ने सैन्य ऑपरेशन का नाम रखा ‘रोरिंग लायन’? बाइबिल और यहूदी इतिहास से जुड़ा है ये गहरा राज

तेल अवीव/वाशिंगटन: मिडिल ईस्ट में एक बार फिर बारूद की गंध तेज हो गई है। 28 फरवरी 2026 की तारीख इतिहास के पन्नों में एक बड़े सैन्य टकराव के रूप में दर्ज हो गई है, जब इजरायल और अमेरिका ने मिलकर ईरान पर भीषण हमला शुरू कर दिया। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस निर्णायक सैन्य अभियान को ‘रोरिंग लायन’ (दहाड़ता शेर) का नाम दिया है। जहां इजरायली डिफेंस फोर्सेस (IDF) इसे ‘शील्ड ऑफ जुडाह’ (यहूदा की ढाल) कह रही हैं, वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मिशन को ‘एपिक फ्यूरी’ करार दिया है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा ‘शेर’ शब्द की हो रही है। आखिर इजरायल अपने हर बड़े वार में शेर का जिक्र क्यों करता है?

बाइबिल और यहूदी परंपरा में शेर का महत्व

सैन्य विशेषज्ञों और इतिहासकारों का मानना है कि इजरायल द्वारा ‘रोरिंग लायन’ या जून 2025 में किए गए ‘राइजिंग लायन’ जैसे नामों का चुनाव महज इत्तेफाक नहीं है। इसका सीधा संबंध यहूदी धर्मग्रंथ और हजारों साल पुरानी विरासत से है। हिब्रू बाइबिल (ओल्ड टेस्टामेंट) में शेर का उल्लेख 150 से भी ज्यादा बार मिलता है। यहूदी परंपरा में शेर को केवल एक जंगली जानवर नहीं, बल्कि अजेय शक्ति, अटूट साहस और स्वयं ईश्वर के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

यहूदा का शेर: विरासत और पहचान की कहानी

इजरायल की पहचान ‘यहूदा के शेर’ (Lion of Judah) से जुड़ी है। मान्यताओं के अनुसार, याकूब के 12 बेटों में से एक ‘यहूदा’ को उनके पिता ने मृत्युशैया पर अपना मुख्य वारिस चुना था। यहूदा के वंशजों से ही ‘ज्यूडिया’ और वर्तमान ‘यहूदी’ शब्द की उत्पत्ति हुई। आगे चलकर राजा डेविड (दाऊद) के राजवंश का मुख्य चिन्ह भी शेर बना। इजरायल आज भी खुद को उसी शेर की संतान मानता है जो अपनी रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।

सैमसन की बहादुरी और राजा डेविड का पराक्रम

बाइबिल की कहानियों में शेर की ताकत को परास्त करने वाले योद्धाओं का विशेष स्थान है। महान योद्धा सैमसन ने नंगे हाथों से एक हमलावर शेर को चीर दिया था, जो उनकी अलौकिक शक्ति का पहला प्रमाण बना। वहीं, गोलियथ को धूल चटाने वाले चरवाहे से राजा बने डेविड ने भी शासन संभालने से पहले शेर और भालू का शिकार कर अपनी वीरता सिद्ध की थी। इजरायली नेतृत्व इन प्रतीकों का इस्तेमाल यह संदेश देने के लिए करता है कि उनकी शक्ति ईश्वरीय है और वे अपने दुश्मनों के लिए ‘भयानक शेर’ साबित होंगे।

मिडिल ईस्ट से शेरों का विलुप्त होना और सांस्कृतिक छाप

इतिहास गवाह है कि कभी जॉर्डन नदी की घाटी और पूरे इजरायल-फिलिस्तीन क्षेत्र में एशियाई शेरों का बसेरा हुआ करता था। पुरातत्वविदों के अनुसार, 9500 ईसा पूर्व से लेकर लौह युग तक यहाँ शेरों की भारी मौजूदगी थी। हालांकि, 1200-1300 ईस्वी के क्रूसेड युद्धों के दौरान शिकार और युद्धों के कारण ये इस क्षेत्र से विलुप्त हो गए। भले ही आज मध्य पूर्व के जंगलों में शेर न दहाड़ते हों, लेकिन इजरायल की सैन्य रणनीति और सांस्कृतिक चेतना में उनकी दहाड़ आज भी उतनी ही प्रभावशाली है।

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