Saturday , 26 September 2026

UNGA में बरसे नेतन्याहू: कई देशों का वॉकआउट, तुर्की, ब्रिटेन और फ्रांस पर तीखा हमला; जानें क्या है इजराइल की नाराजगी की असली वजह

न्यूयॉर्क/नई दिल्ली संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) का मंच उस वक्त अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक टकराव का अखाड़ा बन गया, जब इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने संबोधन शुरू किया। तीखे तेवरों और बेबाक अंदाज में दिए गए इस भाषण में नेतन्याहू ने ईरान के साथ-साथ तुर्की, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों को भी सीधे निशाने पर लिया। जैसे ही इजराइली प्रधानमंत्री पोडियम पर पहुंचे, कई देशों के राजनयिक हॉल छोड़कर बाहर चले गए। इस कूटनीतिक वॉकआउट के बावजूद नेतन्याहू रुके नहीं, बल्कि उन्होंने विरोध दर्ज कराने वालों पर तंज कसते हुए अपनी बात पूरी ताकत से रखी। उनका यह भाषण महज कुछ मुल्कों के प्रति तात्कालिक नाराजगी नहीं था, बल्कि इसके तार गाजा युद्ध, फिलिस्तीन को मान्यता देने की वैश्विक कवायद, हमास पर रुख और इजराइल पर बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव से गहराई से जुड़े हैं।

तुर्की के साथ सीधे टकराव की वजह क्या है?

तुर्की और इजराइल के संबंधों में लंबे समय से उतार-चढ़ाव देखने को मिलता रहा है, लेकिन गाजा संघर्ष छिड़ने के बाद दोनों देशों के रिश्ते बेहद निचले स्तर पर पहुंच गए। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने गाजा में इजराइली सैन्य अभियानों की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए फिलिस्तीनी नागरिकों के समर्थन में आवाज उठाई। तुर्की का आरोप है कि सैन्य कार्रवाई की आड़ में आम नागरिकों और बुनियादी ढांचे को व्यापक नुकसान पहुंचाया गया है। इसके उलट, नेतन्याहू ने संयुक्त राष्ट्र के मंच से एर्दोगन पर हमास के शीर्ष नेताओं को पनाह देने और यहूदी विरोधी माहौल बनाने का सीधा आरोप लगाया। नेतन्याहू ने एर्दोगन की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए उन्हें तानाशाह तक कह डाला। दोनों देशों के बीच असल विवाद की जड़ हमास है। इजराइल जहां हमास को अपनी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा और आतंकी संगठन मानता है, वहीं तुर्की इसे फिलिस्तीनी अधिकारों के आंदोलन से जोड़कर देखता है।

ब्रिटेन और फ्रांस जैसे पुराने पश्चिमी साझेदारों पर क्यों भड़के नेतन्याहू?

ब्रिटेन और फ्रांस पारंपरिक तौर पर पश्चिमी खेमे में इजराइल के मजबूत सहयोगी रहे हैं, मगर गाजा संकट पर दोनों देशों के रुख ने तेल अवीव को असहज किया है। नेतन्याहू ने संयुक्त राष्ट्र में पश्चिमी नेताओं को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि जो मुल्क इजराइल पर उपनिवेशवाद का आरोप लगाते हैं, उन्हें पहले अपना औपनिवेशिक इतिहास देखना चाहिए। हालांकि, ब्रिटेन और फ्रांस की मौजूदा चिंता उनके अतीत से नहीं, बल्कि गाजा में बिगड़ते मानवीय हालात, आम नागरिकों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय सहायता की निर्बाध आपूर्ति से जुड़ी है। दोनों देशों ने कई मौकों पर इजराइल की सैन्य रणनीतियों पर सवाल खड़े किए हैं। नेतन्याहू इन सवालों को इजराइल की सुरक्षा संप्रभुता पर अनुचित अंतरराष्ट्रीय दबाव के रूप में देखते हैं, जबकि लंदन और पेरिस इसे मानवीय जवाबदेही का तकाजा बताते हैं।

फिलिस्तीन को स्वतंत्र राज्य की मान्यता देने पर गहराया विवाद

ब्रिटेन और फ्रांस के प्रति इजराइली नेतृत्व की नाराजगी की एक प्रमुख वजह फिलिस्तीन को औपचारिक राज्य के रूप में मान्यता देने की वैश्विक बहस भी है। दो-राज्य समाधान (टू-स्टेट सॉल्यूशन) के पैरोकारों का मानना है कि फिलिस्तीन को संप्रभु देश का दर्जा दिए बिना पश्चिम एशिया में स्थायी शांति संभव नहीं हो सकती। वहीं, नेतन्याहू इस तरह के किसी भी कदम का पुरजोर विरोध करते रहे हैं। उनका तर्क है कि फिलिस्तीन को एकतरफा मान्यता मिलने से हमास जैसे उग्रवादी गुटों का हौसला बढ़ेगा, जिससे इजराइल की सीमाओं की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय समुदाय का एक बड़ा धड़ा इसे फिलिस्तीनी जनता के लोकतांत्रिक और मानवीय अधिकारों की बहाली के रूप में देखता है। सुरक्षा बनाम राजनीतिक अधिकारों का यही अंतर कूटनीतिक दरार को गहरा कर रहा है।

गाजा युद्ध और नरसंहार के आरोपों पर अलग-अलग दावे

संबोधन के दौरान नेतन्याहू ने इजराइली सेना पर लग रहे नरसंहार के तमाम आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने दावा किया कि इजराइल ने कोई नरसंहार नहीं किया, बल्कि नागरिकों पर होने वाले हमलों को रोकने के लिए सटीक कदम उठाए। गौरतलब है कि 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा इजराइल पर किए गए भीषण हमले के बाद यह सैन्य अभियान शुरू हुआ था। इस युद्ध में बड़े पैमाने पर आम नागरिकों के हताहत होने के चलते दुनिया भर में चिंता बढ़ी है और तत्काल युद्धविराम की मांगें उठ रही हैं। इजराइल का कहना है कि हमास लड़ाके रिहायशी बस्तियों, अस्पतालों और स्कूलों की आड़ लेकर लड़ते हैं, इसलिए बंधकों को छुड़ाने और आतंकी ढांचे को खत्म करने के लिए सैन्य कार्रवाई अनिवार्य है।

UN में वॉकआउट का क्या है कूटनीतिक संदेश?

नेतन्याहू के भाषण के दौरान हॉल से राजनयिकों का बाहर जाना एक स्पष्ट कूटनीतिक संदेश था कि इजराइल की मौजूदा नीतियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में गहरा विभाजन है। नेतन्याहू ने विरोध जताने वाले प्रतिनिधियों को नैतिक रूप से कमजोर बताते हुए उन पर कटाक्ष किया, वहीं हॉल में मौजूद उनके समर्थकों ने तालियां बजाकर उनका हौसला बढ़ाया। यह घटनाक्रम दर्शाता है कि संयुक्त राष्ट्र के भीतर गाजा मुद्दे पर आम सहमति नहीं है। हर मुल्क अपनी घरेलू राजनीति, सामरिक हितों और क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखकर अपना पक्ष तय कर रहा है।

भाषण का घरेलू और वैश्विक फलक पर क्या होगा असर?

नेतन्याहू का यह भाषण सिर्फ बाहरी दुनिया को जवाब देने के लिए नहीं था, बल्कि यह इजराइल की घरेलू जनता और उनके समर्थकों को दिया गया एक मजबूत राजनीतिक संदेश भी था। उन्होंने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि चाहे कितना भी वैश्विक दबाव क्यों न हो, देश की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जाएगा। तुर्की के साथ सीधा वैचारिक और रणनीतिक टकराव है, जबकि ब्रिटेन और फ्रांस के साथ मतभेद फिलिस्तीनी राज्य की मान्यता और युद्ध के तौर-तरीकों को लेकर हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा के इस भाषण ने इन मतभेदों को पाटने के बजाय लकीरों को और गहरा कर दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि युद्धविराम, मानवीय सहायता और बंधकों की रिहाई के प्रयासों पर वैश्विक शक्तियां किस तरह आगे बढ़ती हैं।

 

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