Wednesday , 8 July 2026

ईरान-इजरायल युद्ध की तपिश अब भारतीय खेतों तक: खाद संकट गहराने के आसार, यूरिया-फॉस्फेट की कीमतों में उछाल से किसान परेशान !

 (बिजनेस डेस्क): पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल के बीच जारी भीषण तनाव का सीधा असर अब भारतीय किसानों की रसोई और खेतों पर पड़ता दिख रहा है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि खाड़ी देशों में युद्ध जैसी स्थिति के कारण वैश्विक खाद (Fertilizer) बाजार चरमरा गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में शिपमेंट बाधित होने से सल्फर, यूरिया और फॉस्फेट जैसे प्रमुख रसायनों की सप्लाई चेन टूट गई है, जिससे आने वाले दिनों में भारत में खाद की किल्लत और कीमतों में भारी बढ़ोतरी की आशंका है।

होर्मुज संकट: वैश्विक खाद व्यापार का 30% हिस्सा खतरे में

रिपोर्ट्स के मुताबिक, दुनिया के कुल खाद व्यापार का लगभग 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। ईरान और पड़ोसी देशों से होने वाली इस सप्लाई के रुकने से वैश्विक बाजार में हाहाकार मचा है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी घातक है क्योंकि मार्च और अप्रैल का महीना खाद आयात के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि यह संकट लंबा खिंचता है, तो मई से शुरू होने वाली मक्का की बुवाई बुरी तरह प्रभावित हो सकती है, जो सबसे अधिक खाद पर निर्भर रहने वाली फसल है।

खाड़ी देशों से निर्यात घटा, अल-नीनो ने बढ़ाई सरकार की टेंशन

प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में कमी आने से नाइट्रोजन आधारित खादों का उत्पादन वैश्विक स्तर पर गिर गया है। सऊदी अरब, कतर, ओमान और बहरीन जैसे खाड़ी देशों से होने वाले निर्यात में आई गिरावट ने भारतीय बाजार पर अतिरिक्त दबाव बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह गतिरोध एक महीने से ज्यादा चला, तो देश में फसल उत्पादन और पैदावार (Yield) में भारी गिरावट आ सकती है। इसके साथ ही ‘अल-नीनो’ जैसी मौसमी चुनौतियां इस संकट को और भी गंभीर बना सकती हैं।

रूस बना उम्मीद की किरण, लेकिन लागत बढ़ना तय

भारत सरकार अब सप्लाई गैप को भरने के लिए रूस जैसे वैकल्पिक देशों से आयात बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। हालांकि, लंबी दूरी और बढ़ते फ्रेट चार्जेस (माल ढुलाई) के कारण खाद की कीमतों पर नियंत्रण पाना मुश्किल होगा। खाद महंगी होने से किसानों की खेती की लागत (Input Cost) बढ़ेगी और उनका शुद्ध मुनाफा घटेगा। संकट के इस दौर में कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को ‘जैविक विकल्पों’ की ओर मुड़ने की सलाह दी है।

विशेषज्ञों की सलाह: बायो-स्टिमुलेंट्स और जैविक खाद अपनाएं

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करने के लिए अब नाइट्रोजन फिक्सिंग माइक्रोब्स और बायो-स्टिमुलेंट्स का सहारा लेना जरूरी हो गया है। इससे न केवल मिट्टी की सेहत सुधरेगी, बल्कि वैश्विक संकट के समय किसानों की जेब पर भी कम बोझ पड़ेगा। फिलहाल, वैश्विक हालात को देखते हुए भारतीय कृषि क्षेत्र के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी नजर आ रही है।  

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