लखनऊ। अलीगंज के सेक्टर-डी में हुए भीषण अग्निकांड ने न सिर्फ कई जिंदगियों को खतरे में डाला, बल्कि लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) की कार्यप्रणाली और पुरानी फाइलों में दफन गहरे राज भी उजागर कर दिए हैं। सोमवार को जिस इमारत में आग की लपटों ने तांडव मचाया, वह दरअसल कागजों पर बहुत पहले ही ‘अवैध’ घोषित हो चुकी थी। चौंकाने वाली बात यह है कि साल 2016 में जिस बिल्डिंग को जमींदोज करने का सख्त आदेश जारी हुआ था, उसे महज दो महीने के भीतर ही रहमदिली दिखाते हुए निरस्त कर दिया गया। अब इस अग्निकांड के बाद एलडीए के वे पुराने दस्तावेज और अफसरों के फैसले गंभीर सवालों के घेरे में आ गए हैं।
लॉटरी से शुरू हुआ था इस विवादित इमारत का सफर
इस पूरी कहानी की शुरुआत आज से करीब 46 साल पहले हुई थी। अलीगंज योजना के सेक्टर-डी स्थित भवन संख्या एमएस/102/डी को मूल रूप से 11 जुलाई 1980 को लॉटरी प्रणाली के जरिए विजय कुमार (पुत्र रामेश्वर सहाय) को किराया-क्रय पद्धति पर आवंटित किया गया था। इसके बाद 4 नवंबर 1980 को कागजी अनुबंध पूरा हुआ और कब्जा आवंटी को सौंप दिया गया। साल 2005 में यह भवन विक्रय विलेख (सेल डीड) के जरिए विजय कुमार और उनकी पत्नी उषा के नाम पर दर्ज हो गया।
आवासीय नक्शे पर खड़ा कर दिया ‘अवैध’ साम्राज्य
समय बीतने के साथ इस प्रॉपर्टी का मालिकाना हक बदलता रहा। 19 जनवरी 2013 को इस भवन को वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला और सुरेन्द्र प्रताप शुक्ला नाम के दो भाइयों ने खरीद लिया। 7 अगस्त 2014 को लखनऊ विकास प्राधिकरण ने भी फुर्ती दिखाते हुए इन दोनों के पक्ष में नामांतरण (म्यूटेशन) की प्रक्रिया पूरी कर दी। करीब 1992 वर्गफीट क्षेत्रफल वाले इस बड़े भूखंड का मानचित्र 20 अगस्त 2014 को स्वतः मानचित्र योजना के तहत सिर्फ और सिर्फ ‘आवासीय उपयोग’ के लिए पास कराया गया था। लेकिन धरातल पर नियमों को ताक पर रखकर खेल शुरू हो चुका था।
दो महीने के भीतर पलट गया था बुलडोजर चलाने का फैसला
नक्शा पास होने के बाद इस आवासीय परिसर में धड़ल्ले से अनधिकृत निर्माण किया जाने लगा। शिकायतें बढ़ीं तो एलडीए की नींद टूटी और विभाग ने वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला के खिलाफ मुकदमा संख्या-08/2016 दर्ज कर जांच शुरू की। मामले की गंभीरता को देखते हुए विहित प्राधिकारी ने 10 मई 2016 को इस अवैध निर्माण को पूरी तरह से ध्वस्त (डिमोलीशन) करने का कानूनी आदेश पारित कर दिया।
लेकिन असली खेल यहीं से शुरू हुआ। एलडीए का जो बुलडोजर इस अवैध इमारत को गिराने के लिए तैयार था, वह अचानक थम गया। महकमे के भीतर ऐसी फाइलें घूमीं कि महज दो महीने के भीतर, यानी 5 जुलाई 2016 को ध्वस्तीकरण के उस कड़े आदेश को पूरी तरह निरस्त (कैंसल) कर दिया गया।
आज जब इस पूरी बिल्डिंग में आग लगने से हड़कंप मचा है, तब जनता और प्रशासन दोनों यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर दो महीने से भी कम समय में ऐसा क्या चमत्कार हुआ था कि एलडीए ने अपने ही ध्वस्तीकरण के आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया? क्या उस समय की गई लापरवाही और सांठगांठ ही आज के इस बड़े हादसे की वजह बनी है? इसकी परतें खुलना अभी बाकी हैं।
voice of india
