कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज एक नया अध्याय जुड़ गया है। कोलकाता का ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड ग्राउंड एक ऐसे पल का गवाह बना, जिसका इंतजार भाजपा कार्यकर्ता लंबे समय से कर रहे थे। सुवेंदु अधिकारी ने आज पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यह समारोह न केवल भव्यता के मामले में बल्कि भावनात्मक संदेश देने के लिहाज से भी अभूतपूर्व रहा।
महाशक्ति का जमावड़ा: पीएम मोदी और 20 राज्यों के सीएम पहुंचे कोलकाता
सुवेंदु अधिकारी के शपथ ग्रहण समारोह को यादगार बनाने के लिए दिल्ली से लेकर देश के कोने-कोने तक के दिग्गज नेता ब्रिगेड ग्राउंड पहुंचे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की मौजूदगी ने इस आयोजन को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बना दिया। उनके अलावा एनडीए (NDA) और भाजपा शासित राज्यों के 20 मुख्यमंत्री भी इस खास पल के साक्षी बने। मंच पर कदम रखते ही प्रधानमंत्री मोदी ने बंगाल की संस्कृति का सम्मान करते हुए सबसे पहले विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
मंच पर भावुक क्षण: जब प्रधानमंत्री ने छुए माखनलाल के पैर
समारोह के दौरान एक ऐसा दृश्य भी देखने को मिला जिसने वहां मौजूद हजारों लोगों का दिल जीत लिया। प्रधानमंत्री मोदी ने भाजपा के 90 वर्षीय बुजुर्ग कार्यकर्ता माखनलाल सरकार को मंच पर विशेष सम्मान दिया। पीएम मोदी सीधे माखनलाल के पास पहुंचे, उन्हें आदर के साथ शॉल ओढ़ाया और फिर झुककर उनके पैर छुए। इस भावुक पल ने कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भर दी। माखनलाल सरकार ने भी काफी देर तक प्रधानमंत्री को गले लगाकर अपना आशीर्वाद दिया।
सुवेंदु के साथ ये विधायक भी ले सकते हैं शपथ
सियासी गलियारों और मीडिया रिपोर्ट्स में इस बात की प्रबल चर्चा है कि सुवेंदु अधिकारी के साथ चार अन्य विधायक भी मंत्री पद की शपथ ले सकते हैं। हालांकि, अभी तक इन नामों को गोपनीय रखा गया है और आधिकारिक तौर पर कोई घोषणा नहीं की गई है। माना जा रहा है कि सुवेंदु की नई कैबिनेट में क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों का विशेष ध्यान रखा जाएगा ताकि बंगाल के हर कोने तक विकास का संदेश पहुंचाया जा सके।
सुवेंदु बेहद आध्यात्मिक, घरवाले डरते थे बेटा संन्यासी न बन जाए
1970 में पूर्व मेदिनीपुर के कोंतली गांव में जन्मे सुवेंदु का बचपन से ही आस्था की ओर झुकाव है। हर शनिवार रामकृष्ण मिशन जाना उनका तय रूटीन था। वे बचपन में इतने धार्मिक थे कि घरवालों को डर लगने लगा था कहीं बेटा संन्यासी न बन जाए।
घर में जमा सिक्के भी चुपचाप मिशन में दान कर आते थे। परिवार को लगता था, कभी भी घर छोड़ सकते हैं। लेकिन सुवेंदु ने दूसरा फैसला लिया… संन्यास नहीं, राजनीति करेंगे और शादी भी नहीं करेंगे।
80 के दशक के अंत में कांथी के प्रभात कुमार कॉलेज से सुवेंदु की छात्र राजनीति शुरू हुई। धीरे-धीरे पूर्व मेदिनीपुर में अपनी अलग पहचान बना ली।
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