Tuesday , 26 May 2026

नोएडा में ‘मजदूर क्रांति’ या सोची-समझी साजिश? जल उठा शहर, सड़कों पर तांडव और दिल्ली-NCR जाम; जानें क्यों भड़के श्रमिक

नोएडा। दिल्ली से सटे हाईटेक सिटी नोएडा में सोमवार का सूरज सुलगती सड़कों और चीखते सायरनों के साथ उगा। बरसों से सीने में दबे मजदूरों के गुस्से का गुबार सोमवार को इस कदर फटा कि शहर के कई सेक्टर कुरुक्षेत्र बन गए। पत्थरबाजी, आगजनी और तोड़फोड़ ने पुलिस प्रशासन के हाथ-पांव फुला दिए। हालात इस कदर बिगड़े कि दिल्ली की सीमाओं पर किलोमीटर लंबा जाम लग गया और घंटों तक जिंदगियां सड़कों पर रेंगती रहीं। पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि यह महज मजदूरों का आक्रोश है या इसके पीछे कोई ‘अदृश्य हाथ’ हवा दे रहा है।

रणक्षेत्र बना सेक्टर-62, गाड़ियों में लगाई आग

हिंसक प्रदर्शन की शुरुआत नोएडा के औद्योगिक क्षेत्रों से हुई। सेक्टर-62 में उपद्रवियों ने न केवल गाड़ियों के शीशे तोड़े, बल्कि कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया। पुलिस पर जमकर पथराव किया गया। यही स्थिति सेक्टर-84, फेज-2 और सेक्टर-60 में भी देखने को मिली। नेशनल हाईवे-9 (NH-9) पर प्रदर्शनकारियों के कब्जे की वजह से दिल्ली-नोएडा आवाजाही पूरी तरह ठप हो गई। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया गया है। अफवाहों को रोकने के लिए यूपी पुलिस ने दो सोशल मीडिया हैंडल पर कार्रवाई करते हुए सख्त चेतावनी दी है कि कानून हाथ में लेने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।

ठेकेदारी प्रथा: शोषण की चक्की में पिसते मजदूर

जब ‘अमर उजाला’ की टीम ने ग्राउंड जीरो पर प्रदर्शन कर रहे मजदूरों से बात की, तो दर्द की एक लंबी दास्तान सामने आई। मजदूरों का सबसे बड़ा आरोप ‘ठेकेदारी प्रथा’ पर है। एक महिला श्रमिक ने सिसकते हुए बताया, “हम दिन में 12-12 घंटे हड्डी तोड़ काम करते हैं, लेकिन ठेकेदार महीने के अंत में सिर्फ 13 हजार रुपये थमा देता है।” मजदूरों का कहना है कि कंपनियां सीधे भर्ती करने के बजाय ठेकेदारों को काम सौंप देती हैं, जो अपनी मर्जी से वेतन तय करते हैं और मजदूरों का पीएफ (PF) या ईएसआईसी (ESIC) जैसी मूलभूत सुविधाओं का पैसा डकार जाते हैं।

सुविधाओं के नाम पर ठगा महसूस कर रहे श्रमिक

प्रदर्शनकारियों के मुताबिक, नोएडा में दो तरह की दुनिया बसती है। एक वे जो कंपनियों के सीधे रोल पर हैं, जिन्हें वीकली ऑफ, बीमा और मेडिकल लीव मिलती है। दूसरी तरफ वे ‘अनधिकृत’ मजदूर हैं जिन्हें बीमार पड़ने पर इलाज तो दूर, नौकरी से ही हाथ धोना पड़ता है।

  • बीमारी का डर: अगर कोई मजदूर बीमार होकर गांव चला जाए, तो उसकी जगह तुरंत दूसरे को रख लिया जाता है।

  • वेतन की विसंगति: धागा काटने वाली महिलाओं को महज 10 हजार रुपये मिलते हैं, जबकि गार्ड्स को बीमार साथी की जगह डबल ड्यूटी करनी पड़ती है।

  • बोनस का मजाक: दिवाली पर बोनस के नाम पर नकद राशि के बजाय लंच बॉक्स या डिनर सेट देकर खानापूर्ति कर दी जाती है।

बढ़ती महंगाई और ‘कालाबाजारी’ ने तोड़ी कमर

मजदूरों का गुस्सा सिर्फ कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सिस्टम की नाकामी भी इसकी वजह है। श्रमिकों ने बताया कि सरकार न्यूनतम मजदूरी तय तो करती है, लेकिन वह फाइलों से निकलकर जमीन तक नहीं पहुंचती। नोएडा में मकान मालिक हर साल किराया बढ़ा देते हैं, लेकिन सैलरी में 200-300 रुपये से ज्यादा की बढ़ोतरी नहीं होती। हद तो तब हो गई जब कई मजदूरों ने गैस की कालाबाजारी का जिक्र करते हुए कहा कि उनके घर में चूल्हा जलना तक मुश्किल हो गया है। बिना ओवर टाइम के गुजारा नामुमकिन है और ओवर टाइम के पैसे भी सरकारी मानकों के हिसाब से नहीं मिलते।

फिलहाल, नोएडा पुलिस और प्रशासन शांति व्यवस्था बहाल करने में जुटे हैं, लेकिन यह उग्र प्रदर्शन कई सवाल छोड़ गया है। क्या प्रशासन इन मजदूरों की सुध लेगा या यह चिंगारी फिर कभी बड़ी आग बनकर लौटेगी?

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