Saturday , 30 May 2026

आरती के दौरान कपूर का बुझना शुभ या अशुभ? जानें क्या कहता है शास्त्र और इसके पीछे का गहरा आध्यात्मिक रहस्य

सनातन धर्म में देवी-देवताओं की उपासना का सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम सोपान ‘आरती’ को माना जाता है। मान्यता है कि यदि पूजा में कोई त्रुटि रह गई हो, तो श्रद्धापूर्वक की गई आरती उस कमी को पूरा कर देती है। आरती में कपूर (Camphor) का जलना अनिवार्य माना गया है, क्योंकि इसकी दिव्य ज्योति और सुगंध वातावरण को सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है। लेकिन अक्सर भक्तों के मन में यह सवाल उठता है कि यदि आरती के बीच में कपूर बुझ जाए, तो क्या यह किसी अनिष्ट या अपशगुन का संकेत है? आइए जानते हैं इसके पीछे के धार्मिक और वैज्ञानिक तथ्य।

आरती में कपूर का महत्व: अहंकार के नाश का प्रतीक

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आरती में कपूर का उपयोग बेहद खास संदेश देता है। कपूर की विशेषता यह है कि वह जलने के बाद कोई अवशेष या राख नहीं छोड़ता, बल्कि पूरी तरह अग्नि में विलीन हो जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि भक्त को भी ईश्वर की शरण में अपना अहंकार और ‘स्व’ पूरी तरह त्याग देना चाहिए। जिस प्रकार कपूर खुद को जलाकर सुगंध फैलाता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी परोपकारी होना चाहिए। वैज्ञानिक रूप से भी कपूर की महक वातावरण में मौजूद बैक्टीरिया और हानिकारक कीटों को नष्ट कर वायु को शुद्ध करती है।

क्या कपूर का बुझना ईश्वरीय क्रोध है?

अक्सर आरती करते समय अचानक कपूर के बुझ जाने पर भक्त डर जाते हैं और इसे किसी अशुभ घटना से जोड़कर देखने लगते हैं। हालांकि, आध्यात्मिक जानकार और ज्योतिषाचार्य इसे अपशगुन नहीं मानते। उनका कहना है कि कपूर का बुझना अक्सर हवा की तेज गति, कपूर की निम्न गुणवत्ता या किसी तकनीकी कारण से हो सकता है।

ईश्वर केवल भक्त के भाव और भक्ति के भूखे होते हैं, न कि ऐसी छोटी घटनाओं से वे रुष्ट होते हैं। यदि आरती के बीच कपूर बुझ जाए, तो घबराने या नकारात्मक सोचने के बजाय उसे श्रद्धापूर्वक पुनः प्रज्वलित कर आरती पूरी करनी चाहिए।

आरती की सही विधि और पंच तत्व का रहस्य

शास्त्रों में आरती करने की एक निश्चित विधि बताई गई है। कपूर को साफ पात्र में जलाकर भगवान की मूर्ति के चरणों से शुरू करते हुए नाभि और फिर मुख मंडल तक ले जाना चाहिए। आरती मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है— ‘एका आरती’ और ‘पंच आरती’। पंच आरती को सृष्टि के पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) का प्रतीक माना जाता है। आरती पूरी होने के बाद उस दिव्य लौ को दोनों हाथों से लेकर अपनी आंखों पर लगाना चाहिए, जिससे ईश्वर का आशीर्वाद और सकारात्मकता शरीर में प्रवाहित होती है।

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