Wednesday , 4 November 2026

ECI U-Turn on Form 6: चुनाव आयोग का बड़ा फैसला, फॉर्म-6 से हटाया SIR घोषणा पत्र; आयुक्तों के विरोध के बाद बदला रुख

नई दिल्ली। निर्वाचन आयोग (ECI) ने नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े नियमों में बड़ा फेरबदल करते हुए ऑनलाइन फॉर्म-6 से विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से संबंधित अनिवार्य घोषणा को अलग कर दिया है। आयोग द्वारा लिए गए इस महत्वपूर्ण निर्णय के बाद अब नए मतदाताओं को पंजीकरण के दौरान फॉर्म-6 के भीतर उस घोषणा पत्र को भरना अनिवार्य नहीं होगा, जिसे लेकर आयोग के भीतर ही तीखा विरोध दर्ज कराया गया था। अब जिन राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया जारी है, वहां भी आवेदकों को ECINet पोर्टल पर फॉर्म-6 और SIR घोषणा अलग-अलग जमा करनी होगी।

यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब दोनों निर्वाचन आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—द्वारा पिछले 10 महीनों में दर्ज कराई गई कड़ी आपत्तियों के बाद आयोग अपने कई विवादित फैसलों को या तो वापस ले चुका है या उनमें जरूरी बदलाव कर चुका है।

फॉर्म-6 से क्यों हटाई गई यह घोषणा?

नए मतदाताओं के ऑनलाइन पंजीकरण के लिए निर्धारित फॉर्म-6 में सेक्शन J और K के बीच एक विशेष डिक्लेरेशन जोड़ा गया था। इसके तहत आवेदकों को तीन में से किसी एक विकल्प को चुनना अनिवार्य किया गया था:

  1. क्या उनका नाम 2000 के दशक की शुरुआत में हुए पिछले विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की मतदाता सूची में दर्ज था?

  2. क्या उनके माता-पिता या दादा-दादी में से किसी का नाम उस समय की सूची में था?

  3. क्या उनका या उनके माता-पिता का नाम उस सूची में दर्ज नहीं था?

इस बदलाव को लेकर निर्वाचन आयुक्त विवेक जोशी ने 16 मई को दर्ज टिप्पणी में स्पष्ट किया था कि मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित फॉर्म में कानूनी संशोधन किए बिना ऐसा कोई बदलाव नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। वहीं 13 अगस्त को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने इस कदम को सीधे तौर पर “अनधिकृत और अवैध” करार देते हुए तुरंत हटाने की मांग की थी। हालांकि यह डिक्लेरेशन अब मुख्य फॉर्म-6 से हटा दिया गया है, लेकिन पोर्टल पर एक अलग दस्तावेज के रूप में उपलब्ध रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा: ‘एकल OTP की सुविधा के लिए जोड़ा गया था कॉलम’

छह सप्ताह के भीतर फॉर्म-6 पर यह आयोग का तीसरा अलग रुख है। सुप्रीम कोर्ट में 26 अक्टूबर को दाखिल जवाबी हलफनामे में निर्वाचन आयोग ने जानकारी दी कि उसके मतदाता सूची (ER) प्रभाग ने 21 अक्टूबर को ही दोनों प्रक्रियाओं को अलग करने का निर्णय ले लिया था।

आयोग ने शीर्ष अदालत में दलील दी कि फॉर्म-6 के साथ घोषणा पत्र को जोड़ने का उद्देश्य केवल प्रक्रिया को सरल बनाना था, ताकि आवेदक को दो अलग-अलग OTP और दो ई-सिग्नेचर की जगह केवल एक OTP और एक डिजिटल हस्ताक्षर करना पड़े। आयोग ने इसे एक “नेकनीयती से लिया गया कदम” बताया। हलफनामे में यह भी कहा गया कि आईटी प्लेटफॉर्म पर इसे इस तरह प्रदर्शित किया गया था जिससे भ्रम पैदा हुआ कि मुख्य फॉर्म में संशोधन कर दिया गया है, जबकि आयोग का ऐसा कोई इरादा नहीं था।

10 महीनों में 14 आपत्तियां: अंदरूनी मतभेदों के बाद बैकफुट पर आयोग

एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार उन प्रशासनिक निर्णयों पर असहमति जताई थी, जो उनके संज्ञान में लाए बिना निर्वाचन आयोग के नाम पर लिए जा रहे थे। इन आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने व जोड़ने, सॉफ्टवेयर नियंत्रण और प्रशासनिक फेरबदल जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे शामिल थे।

विवाद बढ़ने के बाद आयोग ने आयुक्तों द्वारा उठाए गए बिंदुओं पर सुधारात्मक कदम उठाए हैं:

  • बैठकों की कार्यप्रणाली: अब आयोग की प्रत्येक बैठक से पहले एजेंडा सभी सदस्यों को भेजा जाएगा और बैठक के बाद आधिकारिक कार्यवृत्त (मिनट्स) जारी किए जाएंगे।

  • अधिकारियों की विदेश यात्रा: अधिकारियों की विदेश यात्राओं के लिए अब पूरे आयोग की पूर्वानुमति अनिवार्य कर दी गई है।

  • आईटी प्रणालियों पर नियंत्रण: महानिदेशक (आईटी) के अधीन विकसित होने वाले नए पोर्टल और मॉड्यूल पहले अधिकारियों की समिति और फिर पूर्ण आयोग की मंजूरी के लिए रखे जाएंगे।

  • ECINet सॉफ्टवेयर का ऑडिट: 14 अक्टूबर को एक उच्चस्तरीय समिति गठित की गई है, जिसमें IIT बॉम्बे और IISc बेंगलुरु के स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञ भी शामिल हैं, जो पोर्टल के कानूनी व तकनीकी अनुपालन की जांच करेंगे।

  • जमीनी अधिकारियों को अधिकार: सॉफ्टवेयर में बदलाव कर निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (ERO) को तार्किक विसंगतियों पर खुद निर्णय लेने का अधिकार दिया गया है। नोटिस पाने वाले मतदाताओं की व्यक्तिगत सुनवाई को वैकल्पिक करते हुए बीएलओ (BLO) द्वारा घर जाकर सत्यापन को प्राथमिकता दी गई है।

गोवा के मतदाताओं का मामला और नए विशेष अभियान

सॉफ्टवेयर की खामियों के चलते गोवा में 97 मतदाताओं के नाम सत्यापन के बाद भी पोर्टल में बहाल नहीं हो पा रहे थे, क्योंकि सिस्टम में नाम जोड़ने का विकल्प ही बंद था। आयोग ने अब इन मतदाताओं के नाम शामिल कराने की प्रक्रिया शुरू की है, जिसमें से अधिकांश के आवेदन स्वीकार हो चुके हैं।

इसके साथ ही आयोग ने छूटे हुए पात्र नागरिकों के लिए “विशेष अभियान” और 2027 में 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवाओं के लिए 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में “विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण” शुरू करने का आदेश दिया है। इस संक्षिप्त पुनरीक्षण में आवेदन करने वालों को एसआईआर घोषणा पत्र भरने की कोई आवश्यकता नहीं होगी।

पश्चिम बंगाल में अपीलों पर स्थिति और आयोग का पक्ष

पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों द्वारा नाम जोड़े जाने के फैसलों के खिलाफ आयोग के अधिकारियों द्वारा दायर अपीलों पर भी आयुक्तों ने सवाल उठाए थे। हलफनामे में आयोग ने स्पष्ट किया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत अधिकृत अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों के आधार पर ये अपीलें दायर की थीं। जिन मतदाताओं के खिलाफ अपीलें दायर की गई थीं, उनके नाम सूची में बरकरार हैं और उन्होंने मतदान भी किया है।

अदालत में आयोग ने यह दोहराया है कि किसी आयुक्त की व्यक्तिगत प्रशासनिक टिप्पणी आयोग का औपचारिक निर्णय नहीं होती। हालांकि, प्रशासनिक स्तर पर हुई विसंगतियों को सुधारते हुए चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि एसआईआर के दौरान ड्राफ्ट लिस्ट से बाहर हुए नागरिक फॉर्म-6 के जरिए दोबारा नाम जुड़वाने के लिए स्वतंत्र रूप से आवेदन कर सकते हैं।

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