Thursday , 22 October 2026

रामपुर जेल में अखिलेश-आजम की मुलाकात: पश्चिमी यूपी का चुनावी गणित साधने की बिसात, संभल हिंसा और जौहर यूनिवर्सिटी बनेंगे बड़े मुद्दे!

उत्तर प्रदेश की सियासत में जब भी विधानसभा चुनावों की आहट तेज होती है, मुरादाबाद मंडल से लेकर पूरे पश्चिमी यूपी की सियासी हवा पर सबकी निगाहें टिक जाती हैं। समाजवादी पार्टी की राजनीति में कभी ‘मिनी मुख्यमंत्री’ के तौर पर पहचाने जाने वाले कद्दावर नेता मोहम्मद आजम खां भले ही लंबे समय से सलाखों के पीछे हों, लेकिन पार्टी की अंदरूनी सियासत और जमीनी जनाधार पर उनकी पकड़ आज भी उतनी ही मजबूत मानी जाती है। जेल में बंद होने और हालिया चुनावों में परिवार की सीधी भागीदारी न होने के बावजूद सपा के रणनीतिक व नीतिगत फैसलों में आजम खां का रसूख कायम है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का लगातार उनसे और उनके परिवार से संपर्क साधना साफ दर्शाता है कि पश्चिमी यूपी की चाबी आज भी आजम के इर्द-गिर्द घूमती है।

2022 का रण और आजम फैक्टर: मुरादाबाद मंडल में सपा का दबदबा

वर्ष 2022 के पिछले विधानसभा चुनाव गवाह हैं कि टिकट बंटवारे से लेकर जमीनी चुनाव प्रबंधन तक सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने आजम खां के मशविरों को पूरी तवज्जो दी थी। उस चुनाव में पश्चिमी यूपी के दायरे में आने वाली 126 विधानसभा सीटों में से सपा-रालोद गठबंधन ने 41 सीटों पर कब्जा जमाया था, जिनमें अकेले सपा के 33 विधायक चुनकर आए थे। खास तौर पर आजम के प्रभाव वाले मुरादाबाद मंडल की 27 सीटों में से सपा ने 17 सीटों पर एकतरफा जीत दर्ज कर अपनी मजबूत सियासी पैठ साबित की थी। यही वजह है कि आगामी चुनावी समर के लिए सपा किसी भी कीमत पर इस दुर्ग को कमजोर नहीं होने देना चाहती।

जौहर यूनिवर्सिटी पर कानूनी शिकंजा और संभल हिंसा रिपोर्ट बनेगी सियासी ढाल

सियासी जानकारों का मानना है कि रामपुर जेल में दोनों शीर्ष नेताओं के बीच पश्चिमी यूपी के उन ज्वलंत मुद्दों पर विस्तृत रणनीति बन रही है, जिन्हें भुनाकर सपा चुनावी हवा अपने पक्ष में मोड़ सके। इसमें सबसे बड़ा मुद्दा आजम खां और उनके ड्रीम प्रोजेक्ट ‘मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी’ पर जांच एजेंसियों का कसा शिकंजा और छात्रों का लंबा आंदोलन रहने वाला है, जिसे सपा सरकार की बदले की भावना के रूप में पेश करने की तैयारी में है। इसके अलावा, हाल के दिनों में सुर्खियों में रहा संभल का ‘हरिहर मंदिर बनाम जामा मस्जिद’ विवाद, इसके बाद भड़की हिंसा और सदन में पेश की गई न्यायिक जांच रिपोर्ट भी सपा के चुनावी एजेंडे का अहम हिस्सा बनने जा रही है।

सपा-कांग्रेस गठबंधन और सीटों का पेच: समन्वय बनाना बड़ी चुनौती

मुलाकात के दौरान संभावित गठबंधन और सीटों के बंटवारे का गणित भी बातचीत के केंद्र में है। राज्य में सपा और कांग्रेस के एक साथ चुनावी मैदान में उतरने की प्रबल संभावनाएं जताई जा रही हैं, लेकिन दोनों दलों के सामने सबसे बड़ा सिरदर्द सीटों का बंटवारा होगा। कांग्रेस भले ही लंबे अरसे से उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर है, मगर पश्चिमी यूपी के कई जिलों और मुस्लिम-दलित बाहुल्य सीटों पर कांग्रेसी दावेदार अपनी मजबूत दावेदारी ठोक रहे हैं। ऐसे में आजम खां के प्रभाव क्षेत्र वाली सीटों पर सपा और कांग्रेस के बीच तालमेल बैठाना और स्थानीय स्तर पर नेताओं की नाराजगी थामना आसान नहीं होगा।

 

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