
उत्तर प्रदेश विधान परिषद (MLC) चुनाव के हालिया नतीजों ने 2027 के विधानसभा रण से पहले सियासी तापमान बढ़ा दिया है। समाजवादी पार्टी ने 11 में से 5 सीटों पर परचम लहराकर अपनी सियासी जमीन को जरूर मजबूत किया है, लेकिन क्षेत्रवार नतीजों की बारीकियों ने पार्टी नेतृत्व के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का अभेद्य किला, ब्रज में कांटे की टक्कर और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह क्षेत्र गोरखपुर में सपा प्रत्याशी का तीसरे पायदान पर फिसलना अखिलेश यादव की चुनावी रणनीति, प्रत्याशी चयन और कोर वोट बैंक की एकजुटता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
पश्चिमी यूपी और रुहेलखंड में भाजपा का गढ़ भेदने में नाकाम रही सपा
पश्चिमी उत्तर प्रदेश और रुहेलखंड की सीटों पर आए चुनावी आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि इस अंचल में भाजपा की सियासी पकड़ बदस्तूर कायम है। सहारनपुर से लेकर मेरठ की दोनों सीटों और बरेली-मुरादाबाद शिक्षक सीट पर भाजपा ने एकतरफा विजय दर्ज की। इन महत्वपूर्ण सीटों पर सपा के सूरमा भाजपा को कड़ी टक्कर देने में भी नाकाम रहे। ब्रज क्षेत्र की बात करें तो आगरा की दो सीटों में से एक सपा और एक भाजपा के खाते में जाने से मुकाबला बराबरी का जरूर दिखा, लेकिन पूरे इलाके का मिजाज सपा के लिए अधिक उत्साहजनक नजर नहीं आया। सत्ता का रास्ता पश्चिमी यूपी से होकर गुजरता है, जहां 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की प्रचंड जीत की मजबूत नींव रखी गई थी। पिछले विधानसभा चुनाव में रालोद के साथ गठबंधन के बावजूद सपा यहां भाजपा की घेराबंदी तोड़ने में पीछे रह गई थी।
सिर्फ गठबंधन और नेताओं की जॉइनिंग से नहीं बनेगी बात, अखिलेश के सामने सामाजिक समीकरण साधने की चुनौती
अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती मुस्लिम-जाट गठजोड़ के साथ-साथ गुर्जर, कश्यप, सैनी और अन्य अति पिछड़े वर्गों के समर्थन को ठोस वोटों में तब्दील करने की है। हाल के दिनों में इन समाजों के कई प्रमुख नेताओं ने साइकिल की सवारी शुरू की, लेकिन एमएलसी चुनाव के नतीजे गवाही दे रहे हैं कि यह जुड़ाव जमीन पर असरदार वोट में नहीं बदल सका। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल चुनावी गठबंधन और दूसरे दलों के नेताओं को शामिल करने से चुनावी वैतरणी पार नहीं होगी। सपा को बूथ स्तर तक अपना सांगठनिक ढांचा मजबूत करना होगा और विभिन्न सामाजिक तबकों के समर्थन को प्रभावी चुनावी ताकत में बदलने के लिए जमीनी रणनीति पर काम करना होगा।
गोरखपुर में टिकट बदलने का दांव पड़ा उल्टा, यादव वोट बैंक में बिखराव ने बढ़ाई चिंता
गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक एमएलसी सीट का जनादेश समाजवादी पार्टी के लिए सबसे बड़ा आत्ममंथन का विषय बन गया है। यहां सपा प्रत्याशी संजयन त्रिपाठी तीसरे स्थान पर खिसक गए, जबकि निर्दलीय प्रत्याशी राजीव यादव ने मुकाबले को बेहद कड़ा और दिलचस्प बना दिया। इस सीट पर पार्टी ने पहले कमलेश यादव को टिकट थमाया था, लेकिन ऐन वक्त पर उनका पत्ता काटकर संजयन त्रिपाठी को चुनावी मैदान में उतार दिया गया। टिकट बदलने के इस फैसले से यादव समाज में उपजी नाराजगी नतीजों में साफ झलक गई। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या सपा के पारंपरिक यादव वोट बैंक का बड़ा हिस्सा पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार को छोड़कर सजातीय निर्दलीय उम्मीदवार के पाले में चला गया। इसी तरह बनारस स्नातक सीट पर सपा के बागी उम्मीदवार सुनील यादव करीब 6000 वोट बटोर ले गए, हालांकि राहत की बात रही कि वाराणसी की दोनों सीटों पर सपा जीत दर्ज करने में सफल रही। पारंपरिक कोर वोट बैंक का प्रत्याशी चयन से असंतुष्ट होना भविष्य के लिए पार्टी के लिए खतरे का संकेत है।
2027 के रण में टिकट के दावेदारों की लंबी कतार, बागियों को साधना होगी अखिलेश की सबसे बड़ी परीक्षा
गोरखपुर के परिणाम ने साफ कर दिया है कि टिकट वितरण में चूक और स्थानीय नेताओं व कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का सीधा फायदा विरोधी खेमे को मिलता है। 2027 के विधानसभा चुनाव में प्रत्येक सीट पर टिकट के दावेदारों की भरमार होगी। ऐसे में टिकट से वंचित नाराज नेताओं को साधना, संगठन में उनकी उपयोगिता तय करना और जमीनी कैडर को एकजुट रखना सपा नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा साबित होगी। यदि समय रहते असंतोष को थामने का तंत्र विकसित नहीं किया गया, तो बागियों की बगावत और वोटों का बिखराव 2027 की राह में बड़ा रोड़ा बन सकता है।
अवध और पूर्वांचल से मिली संजीवनी, ताकत और कमजोरियों के आकलन का वक्त
इन तमाम चुनौतियों के बीच सपा के लिए सकारात्मक पहलू यह रहा कि पार्टी ने पिछली बार की 3 सीटों के मुकाबले इस बार 5 सीटों पर जीत दर्ज की। बनारस की दोनों सीटों पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के साथ ही पार्टी ने झांसी-प्रयागराज सीट पर दोबारा कब्जा जमाया। लखनऊ में भाजपा से सीट छीनकर सपा ने अवध क्षेत्र में अपनी ताकत का मजबूत अहसास कराया है, वहीं आगरा में भी एक सीट सपा की झोली में आई है। साफ है कि एमएलसी चुनाव ने सपा को अपनी ताकत और कमजोरियों का सटीक आईना दिखाया है। अब यह अखिलेश यादव पर निर्भर करेगा कि वे 2027 से पहले पश्चिमी यूपी के शून्य को कैसे भरते हैं और अपनों की नाराजगी को कैसे दूर करते हैं।
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