Wednesday , 28 October 2026

यूपी विधान परिषद चुनाव: 11 सीटों के नतीजों ने बढ़ाई बीजेपी की धड़कन, सपा की बड़ी छलांग; पूर्वांचल-बुंदेलखंड से मिले चौंकाने वाले संकेत

लखनऊ उत्तर प्रदेश विधान परिषद (एमएलसी) की 11 सीटों पर हुए चुनाव के नतीजों और रुझानों ने सूबे का सियासी पारा अचानक चढ़ा दिया है। अब तक सामने आए नतीजों में भारतीय जनता पार्टी 5 सीटों पर विजय हासिल कर चुकी है और 1 सीट पर आगे चल रही है। वहीं समाजवादी पार्टी 2 सीटों पर जीत का परचम लहरा चुकी है, जबकि 3 अन्य सीटों पर मजबूत बढ़त बनाए हुए है। संख्याबल के लिहाज से देखें तो सपा सीधे तौर पर 2 सीटों के फायदे में नजर आ रही है, जबकि बीजेपी नफे-नुकसान से परे अपनी पुरानी स्थिति पर ही ठिठक गई दिखती है। पिछले चुनाव में बीजेपी के खाते में 6 सीटें गई थीं, 2 पर निर्दलीय जीते थे और सपा को 3 सीटें मिली थीं।

हालांकि, राजनीतिक जानकारों का साफ कहना है कि आगामी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आए ये नतीजे भगवा खेमे की पेशानी पर बल लाने के लिए काफी हैं। ये 11 सीटें प्रदेश के 72 जिलों के बड़े दायरे को छूती हैं। इस प्रतिष्ठापूर्ण रण में खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने धुआंधार रैलियां की थीं, जबकि मंत्रियों और विधायकों की पूरी फौज ने पसीना बहाया था। इसके बावजूद परिणाम 2020 की तरह ही सिमट कर रह गए हैं। यहां तक कि सीएम के अपने गृह क्षेत्र गोरखपुर में भी पार्टी बेहद मामूली अंतर से आगे चल रही है।

आगरा और वाराणसी के नतीजों ने सबको चौंकाया बीजेपी के लिए सबसे बड़ा झटका वाराणसी और आगरा की शिक्षक सीटों से आया है, जहां उसे शिकस्त झेलनी पड़ी है। 2020 के चुनाव में भी इन दोनों सीटों पर बीजेपी को पराजय का सामना करना पड़ा था। इसी कसक को दूर करने के लिए पार्टी ने इस बार पूरी ताकत झोंक रखी थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुद मोर्चा संभालते हुए चुनावी जनसभाएं कीं, दिग्गज मंत्रियों को मैदान में उतारा गया और संगठन से लेकर विधायकों तक ने एक-एक शिक्षक वोटर को साधने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी। बावजूद इसके, इन दोनों ही सीटों पर समाजवादी पार्टी ने बाजी मार ली।

झांसी और लखनऊ में भगवा खेमे को बड़ा सेटबैक राजधानी लखनऊ और बुंदेलखंड के केंद्र झांसी की स्नातक सीटों पर भी बीजेपी की उम्मीदों को करारा झटका लगा है और वह पीछे चल रही है। 2020 में लखनऊ स्नातक सीट बीजेपी की झोली में गई थी, जबकि झांसी सीट पर सपा का कब्जा था। इस मर्तबा दोनों ही सीटों को बीजेपी ने नाक का सवाल बना लिया था। सांसद, मंत्री और विधायकों का पूरा अमला लगातार मतदाताओं के घर-घर जाकर संपर्क साध रहा था। मगर जैसे ही मतपेटियां खुलीं, तमाम समीकरण ध्वस्त होते नजर आए। दोनों ही हाई-प्रोफाइल सीटों पर सपा ने अपनी मजबूत बढ़त कायम रखी है।

योगी के गृह क्षेत्र में फंसा पेंच, कांटे की लड़ाई गोरखपुर शिक्षक सीट पर सबसे दिलचस्प और रोंगटे खड़े कर देने वाला मुकाबला देखा जा रहा है। यहां बीजेपी ने अपने निवर्तमान एमएलसी ध्रुव त्रिपाठी को मैदान में उतारा, जिनके सामने सपा ने संजयन त्रिपाठी पर दांव खेला। हालांकि, निर्दलीय उम्मीदवारों के दखल ने इस पूरे मुकाबले को त्रिकोणीय और बेहद उलझाव भरा बना दिया है। निर्दलीय प्रत्याशी राजीव यादव और बीजेपी के ध्रुव त्रिपाठी के बीच हर राउंड में कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है। बीजेपी महज कुछ वोटों की बेहद मामूली बढ़त पर टिकी हुई है। सीएम योगी के अपने गढ़ में इस कदर फंसी सीट ने पार्टी रणनीतिकारों को पशोपेश में डाल दिया है।

मंत्रियों-विधायकों की भारी सक्रियता के बावजूद कड़ा इम्तिहान यह चुनाव इसलिए भी खास था क्योंकि इसके तुरंत बाद उत्तर प्रदेश 2027 के विधानसभा चुनाव के मोड में प्रवेश कर जाएगा। बीजेपी की ओर से शीर्ष नेतृत्व, संगठन के दिग्गज पदाधिकारी, मंत्री और स्थानीय विधायक महीनों से जमीन पर पसीना बहा रहे थे। मुख्यमंत्री की जनसभाओं के जरिए शिक्षक और स्नातक वर्ग के मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ को और मजबूत करने की पूरी रणनीति तैयार की गई थी। इसके बावजूद चुनावी रुझानों और नतीजों से साफ है कि समाजवादी पार्टी ने कई प्रमुख सीटों पर बीजेपी को न सिर्फ कड़ी टक्कर दी, बल्कि अहम मोर्चों पर उसे पीछे भी धकेल दिया।

क्या बीजेपी के लिए यह वाकई बड़ा झटका है? इस नतीजे को बीजेपी के लिए एक बड़ा राजनीतिक सेटबैक मानने से पहले पूरे घटनाक्रम को दो नजरियों से देखना होगा। पहला नजरिया विशुद्ध आंकड़ों का है—साल 2020 में बीजेपी ने 6 सीटें जीती थीं। इस बार यदि 5 पर जीत और 1 पर बढ़त का रुझान कायम रहता है, तो पार्टी का कुल आंकड़ा फिर से 6 पर ही टिकेगा। इस गणित के अनुसार बीजेपी को सीटों का कोई सीधा नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन सवाल यह है कि इतनी भारी-भरकम ताकत झोंकने के बाद भी पार्टी अपनी सीटों की संख्या में इजाफा क्यों नहीं कर पाई?

दूसरा और सबसे अहम पहलू है समाजवादी पार्टी का उभार। पिछली बार 3 सीटों पर सिमटने वाली सपा इस बार 5 सीटों तक पहुंचती दिख रही है। यह बढ़त न केवल विधान परिषद के भीतर उसकी आवाज और ताकत को बुलंद करेगी, बल्कि कार्यकर्ताओं में एक नई ऊर्जा का संचार भी करेगी। साथ ही यह परिणाम सत्ताधारी दल को इस बात पर मंथन करने के लिए मजबूर करेगा कि जिन इलाकों में पूरी सरकारी व सांगठनिक मशीनरी सक्रिय थी, वहां विपक्ष इतनी मजबूत सेंधमारी करने में कैसे कामयाब रहा।

पूर्वांचल और बुंदेलखंड ने बजाई खतरे की घंटी चुनावी नक्शे को देखें तो बीजेपी को सबसे गहरी चोट उसी पूर्वांचल में लगी है, जहां से खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आते हैं और जहां की वाराणसी सीट से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सांसद हैं। वहीं बुंदेलखंड की इकलौती सीट पर भी बीजेपी की चुनावी गाड़ी पटरी से उतर चुकी है। 2027 के महासमर से पहले पूर्वांचल और बुंदेलखंड का यह मिजाज पार्टी के लिए स्पष्ट खतरे का संकेत दे रहा है। हालांकि, पार्टी के लिए राहत की बात यह रही कि पश्चिम यूपी और रूहेलखंड के मैदान में उसका दबदबा पूरी तरह कायम रहा, जहां की चारों सीटों पर बीजेपी ने एकतरफा और धमाकेदार जीत दर्ज की है।

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