Wednesday , 28 October 2026

सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग का दो टूक हलफनामा: CEC के कामकाज में बाधा डालना कानूनन गलत, केवल महाभियोग से ही हटाया जा सकता है पद से

नई दिल्ली। भारत निर्वाचन आयोग (ECI), मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने सुप्रीम कोर्ट में एक संयुक्त हलफनामा दायर कर आयोग के कामकाज पर सवाल उठाने वाली याचिकाओं का कड़ा विरोध किया है। सोमवार, 26 अक्टूबर 2026 की देर रात शीर्ष अदालत में दाखिल किए गए लगभग 250 पन्नों के इस विस्तृत हलफनामे में स्पष्ट किया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज में किसी भी तरह की रुकावट डालने का प्रयास 2023 के कानून का उल्लंघन है। आयोग ने कहा कि संविधान और कानून के तहत मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से केवल उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को पद से हटाया जाता है।

राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं की याचिकाओं पर दाखिल हुआ जवाब

यह संयुक्त हलफनामा मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज के तौर-तरीकों को चुनौती देने वाली याचिकाओं के जवाब में दाखिल किया गया है। इन याचिकाओं में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के अन्य प्रमुख नेताओं के साथ-साथ राकेश कुमार सिंह और अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की याचिकाएं शामिल हैं। याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि आयोग के भीतर निर्णय एकतरफा और कथित तानाशाहीपूर्ण तरीके से लिए जा रहे हैं।

आयोग का एक सुर: ज्ञानेश कुमार, संधू और जोशी की राय पूरी तरह एक

इस हलफनामे के जरिए यह साफ संकेत दिया गया है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्त—सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी—आयोग के कामकाज को लेकर पूरी तरह एकजुट हैं और एक ही राय रखते हैं। हलफनामे में स्पष्ट किया गया कि आयोग ने किसी भी समाचार एजेंसी या मीडिया संस्थान को कोई भी आंतरिक नोट या गोपनीय फाइल न तो जारी की है और न ही इसकी किसी को अनुमति दी गई है। आयोग के भीतर कथित आंतरिक मतभेदों को लेकर चल रही चर्चाओं को पूरी तरह आधारहीन बताया गया है।

‘मीडिया रिपोर्ट्स अदालत में सबूत नहीं बन सकतीं’

निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दलील दी कि मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित नहीं किया जा सकता। हलफनामे में कहा गया कि आयोग के आंतरिक कामकाज, मतभेदों या कथित मनमानी को लेकर छपी अपुष्ट मीडिया रिपोर्टों को अदालत में कानूनी साक्ष्य नहीं माना जाना चाहिए। आयोग ने अदालत से आग्रह किया कि केवल अखबारों और मीडिया रिपोर्ट्स की कतरनों के आधार पर दाखिल की गई ऐसी याचिकाओं को सुनवाई योग्य भी नहीं माना जाना चाहिए।

एकतरफा फैसले की कोई गुंजाइश नहीं, त्रिस्तरीय प्रक्रिया के बाद जारी होती है अधिसूचना

आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को अपनी निर्णय प्रक्रिया का ब्योरा देते हुए बताया कि निर्वाचन आयोग में किसी एक व्यक्ति द्वारा मनमाना या एकतरफा निर्णय लेने की कोई गुंजाइश ही नहीं है। व्यवस्था के अनुसार:

  • किसी भी प्रस्ताव या फैसले की फाइल पहले एक चुनाव आयुक्त के पास जाती है।

  • वहां से परीक्षण के बाद फाइल दूसरे चुनाव आयुक्त के समक्ष प्रस्तुत होती है।

  • दोनों चुनाव आयुक्तों के विचार दर्ज होने के बाद फाइल अंतिम रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के पास पहुंचती है।

  • पूरे आयोग की सहमति और संबंधित फाइलों पर तीनों के हस्ताक्षर होने के बाद ही चुनाव आयोग सचिवालय द्वारा आधिकारिक अधिसूचना जारी कर निर्णय को लागू किया जाता है।

हलफनामे में कहा गया कि यदि आयोग के सदस्यों के बीच किसी बिंदु पर असहमति या मतभेद उत्पन्न होता है, तो ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ की धारा 18 के प्रावधानों के अनुरूप बहुमत के आधार पर लोकतांत्रिक ढंग से फैसला लिया जाता है।

आपातकालीन परिस्थितियों में इलेक्ट्रॉनिक मंजूरी की व्यवस्था

हलफनामे में आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि विशेष व आपातकालीन परिस्थितियों में, जब तत्काल प्रभाव से कोई वैधानिक आदेश जारी करना अनिवार्य हो और तीनों आयुक्तों का एक स्थान पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना संभव न हो, तब इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों (ईमेल/डिजिटल संचार) से सदस्यों की लिखित मंजूरी ली जाती है। इसके उपरांत, संबंधित आदेश को तत्काल आधिकारिक फाइल में दर्ज कर सभी के हस्ताक्षर करा लिए जाते हैं। आयोग ने दोहराया कि सभी महत्वपूर्ण नीतिगत और प्रशासनिक कार्य सामूहिक रूप से पूरे आयोग के दायरे में ही संचालित होते हैं।

 

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