Friday , 23 October 2026

UP Politics: चुनाव से पहले NDA में बगावत की आहट, सहयोगियों के बदले तेवर; डैमेज कंट्रोल के लिए लखनऊ आ रहे अमित शाह

 लखनऊ. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर सियासी खींचतान तेज हो गई है। सहयोगियों के लगातार कड़े होते तेवरों और पार्टी के अंदरूनी असंतोष ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के शीर्ष नेतृत्व की चिंताएं बढ़ा दी हैं। खासकर निषाद पार्टी के तल्ख रुख और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) में जारी बगावत ने गठबंधन की पेशानी पर बल ला दिए हैं। इस बीच, गोरखपुर में भाजपा एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह द्वारा शिक्षक एमएलसी चुनाव में समाजवादी पार्टी प्रत्याशी का खुला समर्थन किए जाने से पार्टी असहज स्थिति में आ गई है। सियासी संकट की इस घड़ी में भाजपा के प्रमुख रणनीतिकार और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह आगामी 30 अक्तूबर को लखनऊ पहुंच रहे हैं, जहां वे नाराज सहयोगियों को साधने और समन्वय बिठाने की कमान संभालेंगे।

संजय निषाद की ‘अलग राह’ वाली चेतावनी और सुभासपा में सेंधमारी से बढ़ी टेंशन

विधानसभा चुनाव की तारीखें नजदीक आते ही गठबंधन के सहयोगी दलों ने सीटों और सियासी वजूद को लेकर दबाव की राजनीति शुरू कर दी है। निषाद पार्टी के प्रमुख और प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री डॉ. संजय निषाद ने हाल ही में दिल्ली की रैली में अलग राह चुनने तक का खुला अल्टीमेटम देकर भाजपा के रणनीतिकारों को चौंका दिया है। दूसरी तरफ, सपा प्रमुख अखिलेश यादव लगातार सुभासपा में सेंधमारी कर रहे हैं। राजभर के कई प्रमुख नेताओं को तोड़कर सपा में शामिल कराया जा चुका है, जिससे ओमप्रकाश राजभर के सियासी गढ़ में सेंध लगने का खतरा पैदा हो गया है। चुनाव में अभी करीब तीन माह का वक्त बाकी है, ऐसे में अमित शाह का लखनऊ दौरा सहयोगियों को एकजुट रखने और नए सिरे से सोशल इंजीनियरिंग साधने के लिहाज से निर्णायक माना जा रहा है।

टिकट वितरण से उभरा असंतोष, गोंडा में सियासी समीकरण बिगड़ने की आशंका

भाजपा के सामने सिर्फ सहयोगियों की नाराजगी ही नहीं, बल्कि अपने ही कुनबे में उठ रहे बगावती सुरों से निपटना भी बड़ी चुनौती बन गया है। हाल ही में एमएलसी और राज्यसभा चुनाव के दौरान पार्टी द्वारा कई नए चेहरों को तरजीह दिए जाने से पुराने और दिग्गज नेताओं में असंतोष पनप रहा है। अवध क्षेत्र के अहम जिले गोंडा में कई भाजपा नेताओं का सपा में जाना चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है। वहीं, टिकट न मिलने की स्थिति में पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह के भी नए सियासी ठिकाने की तलाश करने की चर्चाएं राजनीतिक गलियारों में जोरों पर हैं, जिससे पार्टी के लिए देवीपाटन मंडल में मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

कुनबा बढ़ाने की कवायद: ‘राजा भैया’ से मुलाकात के क्या हैं सियासी मायने?

एक तरफ जहां पुराने सहयोगियों के छिटकने का खतरा मंडरा रहा है, वहीं भाजपा ने नए समीकरणों को साधने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) के राष्ट्रीय अध्यक्ष रघुराज प्रताप सिंह उर्फ ‘राजा भैया’ से हालिया मुलाकात को इसी कवायद से जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि भाजपा प्रतापगढ़ और आसपास के क्षत्रिय बहुल इलाकों में अपने सामाजिक आधार को और मजबूत करने के लिए राजा भैया को एनडीए के पाले में लाने की तैयारी कर रही है। अमित शाह के 30 अक्तूबर के लखनऊ प्रवास के दौरान सहयोगियों की सीट शेयरिंग, अंदरूनी गुटबाजी पर लगाम और नए दलों को गठबंधन में शामिल करने की अंतिम रूपरेखा तैयार होने की उम्मीद है।

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