Thursday , 1 October 2026

राम मंदिर चढ़ावा चोरी केस: चार्जशीट के बाद चंपत राय को लेकर बड़ा फैसला, 2027 चुनाव तक अयोध्या में ही रहने की तैयारी; जानिए क्या है पूरी इनसाइड स्टोरी

अयोध्या में भव्य राम मंदिर के चढ़ावा चोरी प्रकरण में पुलिस की जांच पूरी होने और विशेष अदालत में विस्तृत चार्जशीट दाखिल होने के बाद श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय के भविष्य को लेकर सियासी व धार्मिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। विश्वस्त सूत्रों से मिल रही जानकारी के मुताबिक, चंपत राय को अयोध्या से बाहर किसी अन्य केंद्र पर भेजे जाने की योजना को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। ताजा रणनीतिक समीकरणों को देखते हुए अब उनके आगामी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव तक रामनगरी अयोध्या में ही बने रहने की प्रबल संभावना जताई जा रही है।

चार्जशीट में नहीं हैं आरोपी, गवाह के रूप में दर्ज है नाम

चढ़ावा चोरी प्रकरण में पुलिस द्वारा अदालत में पेश की गई चार्जशीट में चंपत राय को किसी भी प्रकार से आरोपी नहीं बनाया गया है। जांच एजेंसी ने उन्हें इस बहुचर्चित मामले में सरकारी गवाहों की सूची में शामिल किया है। ऐसे में वर्तमान कानूनी स्थिति के अनुसार चंपत राय की भूमिका किसी मुल्जिम की नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण गवाह की है। कानूनी जानकारों का मानना है कि अब आगे अदालत में मुकदमे के ट्रायल, गवाहों के बयानों और जिरह के दौरान ही उनकी भूमिका का अंतिम न्यायिक पक्ष निर्धारित हो सकेगा।

जांच के दौरान अयोध्या से बाहर भेजने की थी योजना, अब क्यों टली?

सूत्रों का कहना है कि जब चढ़ावा चोरी की जांच एसआईटी और पुलिस द्वारा की जा रही थी, उस दौरान चंपत राय को अयोध्या से हटाकर किसी दूसरे केंद्र पर स्थानांतरित करने पर उच्च स्तर पर मंथन हुआ था। संगठन और ट्रस्ट के भीतर उनके केंद्र में बदलाव को लेकर गंभीर चर्चाएं चल रही थीं। हालांकि, अब जब जांच पूरी हो चुकी है और अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी गई है, तब इस विकल्प को फिलहाल के लिए टाल दिया गया है। इस रणनीतिक फैसले के पीछे अयोध्या की स्थानीय संवेदनशीलता और 2027 के चुनावी समीकरणों सहित कई महत्वपूर्ण पहलुओं को मुख्य वजह माना जा रहा है।

अचानक बाहर जाने से विरोध और जनआक्रोश भड़कने का था अंदेशा

चढ़ावा चोरी मामले में भले ही पुलिस जांच पूरी हो चुकी हो, लेकिन अयोध्या के संतों, पुजारियों और स्थानीय नागरिकों के बीच इस मुद्दे को लेकर चर्चाएं और सुगबुगाहट पूरी तरह शांत नहीं हुई हैं। अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि ऐसे नाजुक वक्त में यदि चंपत राय को अचानक अयोध्या से बाहर भेजा जाता, तो इससे स्थानीय स्तर पर असंतोष, विरोध या आक्रोश की स्थिति पैदा हो सकती थी। लोग इसे कार्रवाई या दोषारोपण के तौर पर भी देख सकते थे। इसी खतरे को भांपते हुए शीर्ष स्तर पर फिलहाल उन्हें अयोध्या में ही यथावत बनाए रखने पर सहमति बनती दिख रही है।

राम मंदिर आंदोलन से दशकों पुराना नाता भी बना ढाल

चंपत राय का अयोध्या और राम मंदिर आंदोलन से जुड़ाव दशकों पुराना और बेहद गहरा रहा है। साल 2020 में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की स्थापना के बाद से ही उन्होंने महासचिव के रूप में मंदिर निर्माण, व्यवस्थाओं और प्रबंधन में केंद्रीय भूमिका निभाई है। चढ़ावा प्रकरण की पूरी जांच प्रक्रिया के दौरान भी वे लगातार अयोध्या में ही डटे रहे। आंदोलन के प्रमुख चेहरे होने और मंदिर निर्माण की हर व्यवस्था से बारीक वाकिफ होने के चलते संगठन उन्हें इस वक्त रामनगरी से दूर करने का जोखिम नहीं लेना चाहता।

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले नए सियासी विवाद से बचने की रणनीति

उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं है और राम मंदिर से जुड़ा हर छोटा-बड़ा घटनाक्रम पहले से ही सियासी विमर्श के केंद्र में है। विपक्षी दल चढ़ावा चोरी प्रकरण को लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं। ऐसी स्थिति में चुनाव से ठीक पहले चंपत राय को अयोध्या से बाहर स्थानांतरित करने का फैसला विपक्ष को बैठे-बिठाए एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा दे सकता था। विश्व हिंदू परिषद (VHP) के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार भी हाल ही में यह कह चुके हैं कि चढ़ावा प्रकरण को आगामी विधानसभा चुनाव में राजनीतिक मुद्दा बनाने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे में चुनाव से पहले कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाया जाना तय माना जा रहा है, जिससे नए सवाल खड़े हों या विपक्ष को हमलावर होने का अवसर मिले।

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