Saturday , 26 September 2026

यूएन में नेपाल का बड़ा दांव: हिमालय पर मंडराते संकट से निपटने के लिए भारत और चीन संग मिलकर ‘क्लाइमेट मैकेनिज्म’ का प्रस्ताव, भीषण आपदा पर छलका दर्द

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें ऐतिहासिक सत्र को पहली बार संबोधित करते हुए नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने वैश्विक मंच से हिमालयी क्षेत्र को बचाने के लिए एक दूरगामी पहल की पेशकश की है। तेजी से बदलते वैश्विक तापमान और प्राकृतिक आपदाओं के खतरे को रेखांकित करते हुए उन्होंने भारत, चीन और नेपाल के संयुक्त नेतृत्व में एक नए त्रिपक्षीय मंच ‘हिमालयन क्लाइमेट रेजिलिएंस मैकेनिज्म’ (Himalayan Climate Resilience Mechanism) के गठन का औपचारिक प्रस्ताव रखा। उन्होंने आगाह किया कि हिंदू कुश हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी में आने वाला संकट केवल पर्वतीय देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समूचे उपमहाद्वीप के जीवन तंत्र को अस्त-व्यस्त कर देगा।

नेपाल में आई जल प्रलय का दर्द: 1400 से अधिक मौतें, 6000 अब भी लापता

अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने 26 अगस्त को नेपाल में मची भयानक तबाही का भावुकता से उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि अप्रत्याशित मूसलाधार बारिश, बाढ़ और भूस्खलन के तांडव ने अब तक 1,451 निर्दोष लोगों की जान ले ली है, जबकि 6,000 से अधिक लोग अब भी लापता हैं। उन्होंने कहा कि धरती का बढ़ता तापमान और अनियंत्रित मौसमी बदलाव सीधे तौर पर हिमालय की प्राकृतिक संरचना को हिला रहे हैं, जिसके गंभीर परिणाम सीमा पार भारत और चीन तक देखे जा रहे हैं।

2 अरब लोगों की लाइफलाइन है हिंदू कुश हिमालय

नेपाल के प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र को केवल एक भौगोलिक परिदृश्य या अलग-थलग इलाका मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह समूचा क्षेत्र करीब 2 अरब इंसानों के लिए पेयजल, कृषि, पर्यावरण और आजीविका की प्राथमिक जीवनरेखा है। उन्होंने रेखांकित किया कि पहाड़ों के पिघलने और अस्थिर होने का सीधा दुष्प्रभाव मैदानों तक पहुंचेगा। इसी कारण उन्होंने भारत और चीन जैसे शक्तिशाली पड़ोसी मुल्कों को एक साथ आकर साझा तंत्र विकसित करने का आह्वान किया।

‘हिमालयन क्लाइमेट रेजिलिएंस मैकेनिज्म’ से क्या बदलेगा?

प्रस्तावित नए तंत्र के तहत तीनों देशों के बीच क्षेत्रीय वैज्ञानिक सहयोग की मजबूत नींव रखने की बात कही गई है:

  • सैटेलाइट डेटा और तकनीकी साझाकरण: तीनों देश अंतरिक्ष उपग्रहों से प्राप्त रीयल-टाइम डेटा और मौसम संबंधी विशेषज्ञता एक-दूसरे से साझा करेंगे।

  • ग्लेशियल झीलों पर निगरानी: तेजी से पिघलते ग्लेशियरों के कारण बनने वाली खतरनाक झीलों (GLOF रिस्क) की निरंतर मैपिंग और निगरानी की जाएगी।

  • मजबूत अर्ली वॉर्निंग सिस्टम: किसी भी संभावित फ्लैश फ्लड या भूस्खलन की पूर्व चेतावनी सीमा पार समय रहते पहुंचाने का संयुक्त ढांचा तैयार होगा।

  • सीमा-पार त्वरित राहत अभियान: आपदा की स्थिति में तीनों देश सीमाओं की बाधाओं से परे जाकर संयुक्त खोज एवं बचाव अभियान चला सकेंगे।

बालेंद्र शाह ने अपील की कि हिमालय को राजनीतिक सीमाओं और विभाजित जानकारियों का क्षेत्र बनाने के बजाय अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग की एक खुली ‘लिविंग लैब’ के रूप में देखा जाना चाहिए।

पिघलता पर्माफ्रॉस्ट और कमजोर होती पर्वत शृंखलाएं

प्रधानमंत्री शाह ने पर्माफ्रॉस्ट (सदियों से जमीन के नीचे जमी बर्फ की परत) के तेजी से पिघलने को एक मूक आपदा करार दिया। उन्होंने तकनीकी रूप से समझाया कि पर्माफ्रॉस्ट के क्षरण से ग्लेशियरों के नीचे मौजूद पहाड़ों की ढलानें खोखली और कमजोर हो रही हैं। इसके परिणामस्वरूप विशाल हिमखंडों और चट्टानों के खिसकने, विनाशकारी भूस्खलन और नदी तंत्र में अचानक आने वाली बाढ़ का जोखिम कई गुना बढ़ गया है। उन्होंने याद दिलाया कि हालिया आपदा में भी नेपाल-चीन सीमा से शुरू हुई विभीषिका ने आगे बढ़कर भारतीय सीमावर्ती इलाकों तक तबाही का असर दिखाया।

 

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