Tuesday , 22 September 2026

विवेक तिवारी हत्याकांड: कोर्ट में गिड़गिड़ाता रहा बर्खास्त सिपाही, अदालत ने सुनाई 10 साल की सजा; जानें फैसले की बड़ी बातें….8 साल पहले गोमतीनगर में क्या हुआ था?

राजधानी लखनऊ के बहुचर्चित विवेक तिवारी हत्याकांड में जिला एवं सत्र न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए बर्खास्त सिपाही प्रशांत कुमार चौधरी को 10 साल के कठोर कारावास और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। सजा के बिंदु पर सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम का माहौल बेहद भावुक और तनावपूर्ण रहा, जहां दोषी सिपाही सजा से बचने के लिए जज के सामने रहम की भीख मांगता नजर आया। उसने अपनी पारिवारिक मजबूरियों और जेल में बिताए आठ वर्षों का हवाला देकर रिहाई की गुहार लगाई, लेकिन अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए सजा का ऐलान कर दिया।

सुनवाई के दौरान सिपाही प्रशांत चौधरी ने कहा, “हुजूर! घर पर बूढ़े माता-पिता हैं, इस मुकदमे की वजह से 2023 में पत्नी भी तलाक देकर छोड़कर चली गई। एक अविवाहित भाई है और मेरा पहले का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा है। मैं 36 साल का हो चुका हूं और आठ साल से जेल में बंद हूं। अब तक जेल में काटी गई अवधि को ही पूरी सजा मानकर मुझे रिहा कर दिया जाए।”

वहीं, पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता प्रांशु अग्रवाल ने सिपाही की दलीलों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कोर्ट में जोरदार बहस करते हुए कहा कि एक वर्दीधारी ने निर्दयतापूर्वक एक निहत्थे और बेकसूर व्यक्ति की जान ली है। यह अत्यंत जघन्य अपराध है और समाज में कड़ा संदेश देने के लिए दोषी को कानून के तहत अधिकतम सजा मिलनी चाहिए।

अदालत का रुख: गैरइरादतन हत्या में माना दोषी

अदालत ने आरोपी प्रशांत चौधरी को आईपीसी की धारा 302 (हत्या) की बजाय गैरइरादतन हत्या का दोषी ठहराया। कोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए माना कि 29 सितंबर 2018 की दरमियानी रात जब आरोपी सिपाही अपने साथी संदीप कुमार के साथ गोमती नगर इलाके में गश्त कर रहा था, तब उसने सामने से आ रही संदिग्ध एक्सयूवी कार को रुकने का इशारा किया था।

फैसले के अनुसार, कार चालक ने गाड़ी रोकने के बजाय पुलिसकर्मियों की बाइक में टक्कर मार दी, जिससे सिपाही की जान को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया था। इसी आत्मरक्षा (सेल्फ डिफेंस) की स्थिति में प्रशांत ने अपनी सरकारी पिस्टल से कार की विंडस्क्रीन पर गोली चलाई, जो सीधे विवेक तिवारी को जा लगी और उनकी जान चली गई। इसी आधार पर अदालत ने इसे पूर्व-नियोजित हत्या न मानकर गैरइरादतन हत्या माना।

आठ साल पहले गोमती नगर में क्या हुआ था?

यह दिल दहला देने वाला वाकया 29 सितंबर 2018 की रात का है। एप्पल कंपनी के एरिया सेल्स मैनेजर विवेक तिवारी अपनी कंपनी के नए मोबाइल मॉडल की लॉन्चिंग पार्टी खत्म करने के बाद अपनी सहकर्मी सना को कार से छोड़ने जा रहे थे। गोमती नगर विस्तार में मकदूमपुर पुलिस चौकी के पास गश्त कर रहे सिपाही प्रशांत चौधरी और संदीप ने उनकी गाड़ी रोकने का प्रयास किया।

चश्मदीद सहकर्मी सना ने अपने बयानों में दर्ज कराया था कि देर रात वर्दीधारियों को देखकर घबराहट और डर की वजह से विवेक गाड़ी नहीं रोक सके। इसी दौरान सिपाही संदीप ने कार की खिड़की के भीतर डंडा डाल दिया और बाइक से उतरते ही प्रशांत चौधरी ने सीधे पिस्टल निकालकर विंडस्क्रीन पर फायर झोंक दिया। गोली विवेक तिवारी के गले और सिर के पास लगी, जिससे अनियंत्रित होकर कार कुछ दूरी पर अंडरपास के एक पिलर से टकरा गई। वारदात को अंजाम देकर दोनों सिपाही मौके से फरार हो गए थे।

राष्ट्रीय स्तर पर गरमाया था मुद्दा, चार स्तर पर हुई थी जांच

वारदात के बाद पुलिस कंट्रोल रूम की सूचना पर घायल विवेक को फौरन डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। आम जनता से लेकर राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने सड़कों पर उतरकर पुलिस की इस बर्बरता के खिलाफ उग्र प्रदर्शन किए थे। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी इस घटना की गूंज सुनाई दी थी।

मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन आईजी रेंज सुजीत पांडेय के नेतृत्व में विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया था। इसके अलावा थाना महानगर पुलिस द्वारा विवेचना, मजिस्ट्रेटी जांच और मानवाधिकार आयोग (NHRC) की अलग से जांच कराई गई थी। इन सभी चारों जांच रिपोर्टों में प्रशांत चौधरी के खिलाफ अत्यधिक बल प्रयोग और गंभीर लापरवाही की पुष्टि हुई थी।

घटना के बाद बिखर गया था परिवार

मृतक विवेक तिवारी की पत्नी कल्पना तिवारी के मुताबिक, घटना के वक्त वे परिवार समेत न्यू हैदराबाद कॉलोनी स्थित आकाश गंगा अपार्टमेंट में किराए पर रहते थे। पति की असमय मौत के बाद पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। शासन की मदद से नौकरी और आवास मिलने के बाद वर्ष 2019 में उन्होंने महानगर इलाके में अपना आशियाना बनाया और वहीं रहने लगीं। अदालत के इस फैसले के साथ आठ साल से इंसाफ की राह देख रहे परिवार को आखिरकार कानूनी राहत मिली है।

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