Tuesday , 22 September 2026

आखिर कहाँ जा रहा हमारा समाज? नाबालिगों को सड़क पर नोचा, गांव में खंभे से बांधा: जमुई-कोडरमा की घटनाओं ने खड़े किए 5 बड़े सवाल

बिहार के जमुई में सड़क किनारे एक नाबालिग छात्रा और उसके सहपाठी के साथ मनचलों की दरिंदगी और पड़ोसी राज्य झारखंड के कोडरमा में तीन नाबालिगों को बंधक बनाकर बिजली के खंभे से बांधने की बर्बर घटना ने पूरे समाज और कानून-व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। एक ओर जहां जमुई में सात शोहदों ने दिनदहाड़े एक बेबस नाबालिग लड़की को घेरकर अभद्रता की पराकाष्ठा पार कर दी, वहीं दूसरी ओर कोडरमा में उग्र भीड़ खुद कानून की ठेकेदार बन बैठी और बच्चों को अमानवीय यातनाएं दे डालीं। ये दोनों घटनाएं साफ तौर पर दर्शाती हैं कि किस तरह भीड़तंत्र (मॉब जस्टिस) और बेलगाम अपराधियों का खौफ आम नागरिकों के बुनियादी अधिकारों को कुचल रहा है।

केस 1: जमुई में कोचिंग छात्रा से सड़क पर छेड़खानी, एसआईटी ने दबोचे तीन आरोपी

पहला मामला बिहार के जमुई जिले के नगर थाना क्षेत्र का है, जहां 19 सितंबर की शाम कोचिंग से लौट रहे नाबालिग छात्र और छात्रा को बीच सड़क पर मनचलों ने रोक लिया और उनके साथ घिनौनी हरकतें कीं। 21 सितंबर को जब इस करतूत का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, तो शासन-प्रशासन में खलबली मच गई।

मामले की गंभीरता को देखते हुए जमुई पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 74, 76(3)(5) और पॉक्सो एक्ट की धारा 8 व 12 के तहत नामजद प्राथमिकी दर्ज की। एसपी विश्वजीत दयाल के निर्देश पर एसडीपीओ दीप्ति मोनाली के नेतृत्व में विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया, जिसने त्वरित कार्रवाई करते हुए चिन्हित 7 आरोपियों में से 3 को गिरफ्तार कर लिया है। मामले में बिहार राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष अप्सरा ने डीएम से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है, जबकि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी समेत प्रमुख राजनीतिक दलों ने घटना की कड़ी निंदा करते हुए दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग उठाई है।

केस 2: कोडरमा में ग्रामीणों का अमानवीय चेहरा, नाबालिगों को खंभे से बांधकर गांव में घुमाया

दूसरी दहला देने वाली घटना झारखंड के कोडरमा जिले स्थित लोचनपुर गांव से सामने आई। रविवार देर रात एक नाबालिग लड़की से मिलने उसके दो नाबालिग दोस्त घर पहुंचे थे। सोमवार सुबह जब ग्रामीणों को इसकी जानकारी मिली, तो उन्होंने कानून को ठेंगा दिखाते हुए खुद ‘कंगारू अदालत’ लगा दी।

भीड़ ने तीनों नाबालिगों को बंधक बनाया, गांव की गलियों में घुमाकर अपमानित किया और फिर बिजली के खंभे से रस्सियों से बांधकर जबरन माफी मंगवाई। सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस ने मौके पर पहुंचकर बच्चों को भीड़ के चंगुल से मुक्त कराया और जांच शुरू की।

कानून और सभ्य समाज के सामने खड़े 5 तीखे सवाल

1. क्या किसी नागरिक या भीड़ को सजा सुनाने का अधिकार है? संविधान और कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को बंधक बनाना, पीटना या खंभे से बांधना संगीन गैर-कानूनी कृत्य है। न्याय और दंड का निर्धारण केवल सक्षम अदालतों का अधिकार क्षेत्र है, किसी अनियंत्रित भीड़ का नहीं।

2. नाबालिगों के अधिकारों और कानूनी सुरक्षा का क्या? जुवेनाइल जस्टिस एक्ट (JJ Act) और पॉक्सो एक्ट के कड़े प्रावधानों के तहत नाबालिगों की पहचान उजागर करना, उन्हें शारीरिक यातना देना या मानसिक प्रताड़ना पहुंचाना गैर-जमानती अपराध है। कोडरमा की घटना नाबालिगों के मौलिक और विधिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है।

3. किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर पहरा बैठाने का हक भीड़ को किसने दिया? भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को निजता और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। यदि कोई संदिग्ध गतिविधि दिखती भी है, तो एकमात्र वैध प्रक्रिया पुलिस को सूचित करना है, न कि नैतिक पुलिसिंग के नाम पर कानून हाथ में लेना।

4. तमाशबीन समाज और मूकदर्शकों की चुप्पी पर रोक कैसे लगे? ऐसी घटनाओं के समय वीडियो बनाने या तमाशा देखने के बजाय नागरिकों का प्राथमिक कर्तव्य पुलिस हेल्पलाइन (112) या चाइल्ड हेल्पलाइन (1098) पर तुरंत सूचना देना है। कानून के तहत मदद करने वाले सजग नागरिकों को पूरी सुरक्षा मिलती है और उन्हें पुलिसिया प्रक्रियाओं में बेवजह उलझाया नहीं जाता।

5. पीड़ितों को कानूनी, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पुनर्वास कैसे मिले? पॉक्सो और जुवेनाइल जस्टिस अधिनियम के तहत ऐसे मामलों में जिला बाल संरक्षण इकाई (DCPU) और बाल कल्याण समिति (CWC) के जरिए पीड़ितों को निःशुल्क विधिक सहायता, पुनर्वास और पेशेवर मानसिक काउंसलिंग की व्यवस्था उपलब्ध कराई जाती है, ताकि वे इस सदमे से उबरकर सामान्य जीवन में लौट सकें।

 

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