ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भारतीय एथलीटों के शानदार और प्रेरणादायक प्रदर्शन ने एक बार फिर पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। भारत की झोली में लगातार आ रहे पदकों को देखकर हर देशवासी का उत्साह सातवें आसमान पर है। जब भी हम अपने खिलाड़ियों को पोडियम पर चमकता हुआ स्वर्ण पदक (Gold Medal) पहनते हुए देखते हैं, तो हमारे मन में अक्सर यह जिज्ञासा जरूर जागती है कि क्या यह मेडल पूरी तरह से शुद्ध सोने का होता है? या फिर इसमें सोने की मात्रा कितनी होती है? आइए जानते हैं इस चमकदार मेडल के पीछे की असली सच्चाई क्या है।
कितना सोना और कितनी चांदी होती है एक गोल्ड मेडल में?
यदि आप यह सोचते हैं कि विजेता खिलाड़ियों को मिलने वाला यह स्वर्ण पदक पूरी तरह से 100% शुद्ध सोने (Pure Gold) का बना होता है, तो वास्तविकता इससे काफी अलग है। अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) और खेल आयोजनों के तय मानकों के मुताबिक, एक सामान्य गोल्ड मेडल का कुल वजन लगभग 500 से 550 ग्राम के आसपास होता है।
इस मेडल का सबसे बड़ा और मुख्य हिस्सा लगभग 92.5 प्रतिशत बेहतरीन क्वालिटी की शुद्ध चांदी (Sterling Silver) से तैयार किया जाता है। यानी कि इस पूरे मेडल में करीब 500 ग्राम हिस्सा केवल चांदी का ही होता है। इसके बाद, इस चांदी के बेस पर कम से कम 6 ग्राम शुद्ध सोने की परत (Gold Plating) चढ़ाई जाती है। सरल शब्दों में कहें तो जिसे हम गर्व से ‘गोल्ड मेडल’ कहते हैं, उसमें असलियत में केवल 6 ग्राम ही सोना मौजूद होता है।
इतिहास में कब बांटे गए थे आखिरी बार शुद्ध सोने के मेडल?
यदि हम खेल इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें, तो पता चलता है कि हमेशा से ऐसा नियम नहीं था। आज से एक सदी पहले, साल 1912 के स्टॉकहोम ओलंपिक खेलों में विजेता एथलीटों को 100% शुद्ध सोने से बने मेडल दिए गए थे।
लेकिन इसके बाद दुनियाभर में सोने की कीमतों में तेजी से उछाल आने लगा। खेल आयोजकों पर लगातार बढ़ते आर्थिक बोझ और वित्तीय लागत को देखते हुए मेडल बनाने के तरीकों में बड़ा बदलाव करना पड़ा। तब से लेकर आज तक चांदी के बेस पर सोने की परत चढ़ाने की यह पारंपरिक प्रथा चली आ रही है, जिसे आज भी पूरी दुनिया में अपनाया जाता है।
क्या होती है एक गोल्ड मेडल की वास्तविक बाजार कीमत?
किसी भी गोल्ड मेडल की वित्तीय या मौद्रिक कीमत उसमें मौजूद 6 ग्राम शुद्ध सोने और लगभग 500 ग्राम चांदी के मौजूदा बाजार भाव (Market Value) के आधार पर ही आंकी जाती है।
हालांकि, किसी भी खिलाड़ी, उसके परिवार और देश के लिए इस मेडल की असली कीमत रुपयों-पैसे में कभी नहीं आंकी जा سکتی है। सालों की कड़ी मेहनत, सुबह-शाम का कड़ा अभ्यास, त्याग और देश के लिए तिरंगा फहराने का अदम्य जुनून इस मेडल को दुनिया की हर चीज से अनमोल बना देता है।
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