कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में पिछले डेढ़ दशक से एकछत्र राज करने वाली ममता बनर्जी के लिए यह समय किसी बड़े सियासी दुस्वप्न से कम नहीं है। 15 साल तक सत्ता के शिखर पर रहने के बाद न सिर्फ उनकी सरकार हाथ से निकल गई, बल्कि उनके अपने गढ़ भवानीपुर ने भी उन्हें ‘बड़ा धोखा’ दे दिया है। कभी नंदीग्राम की हार को एक इत्तेफाक बताने वाले राजनीतिक पंडित आज हैरान हैं, क्योंकि शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को उन्हीं के घर में पटखनी देकर उनके चमकदार राजनीतिक करियर पर एक गहरा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।
कैसे पलटा भवानीपुर का ‘खेला’? 17 हजार की बढ़त बनी 15 हजार की हार
भवानीपुर का यह मुकाबला किसी रोमांचक फुटबॉल मैच की तरह रहा, जहां अंतिम समय में गोल पोस्ट ही बदल गया। मतगणना की शुरुआत में शुभेंदु अधिकारी ने बढ़त बनाई थी, लेकिन तीसरे राउंड के बाद ममता बनर्जी ने तेजी पकड़ी। सातवें राउंड तक आते-आते ममता 17 हजार वोटों के भारी अंतर से आगे चल रही थीं। उस वक्त टीएमसी कैंप में जश्न का माहौल था और माना जा रहा था कि दीदी अपनी सीट बचा लेंगी। लेकिन असली ट्विस्ट आना अभी बाकी था। जैसे-जैसे शुभेंदु के प्रभाव वाले इलाकों की ईवीएम मशीनें खुलीं, ममता की बढ़त बर्फ की तरह पिघलने लगी। 16वें राउंड में शुभेंदु ने पहली बार बढ़त बनाई और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। अंततः 15,105 मतों के अंतर से शुभेंदु ने ‘दीदी’ को उन्हीं के आंगन में परास्त कर दिया।
साखावत मेमोरियल स्कूल की वो पांच घंटे की बेचैनी
मतदान के दिन से ही ममता बनर्जी के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती थीं। नतीजों वाले दिन वे खुद साखावत मेमोरियल हाई स्कूल स्थित काउंटिंग सेंटर पर मोर्चा संभाले हुए थीं। पांच घंटे तक वे वहां डटी रहीं, लेकिन 18वें राउंड के बाद जब जीत की उम्मीदें धुंधली होने लगीं, तो वे केंद्र से बाहर निकल गईं। बाहर निकलते समय ममता के चेहरे पर हार की कड़वाहट और गुस्सा साफ झलक रहा था। उन्होंने विरोधियों पर बदसलूकी और शारीरिक हमले तक के गंभीर आरोप लगाए, जो राज्य की गिरती राजनीतिक मर्यादा की ओर इशारा कर रहे हैं।
एंटी-इंकम्बेंसी और ध्रुवीकरण ने बिगाड़ा टीएमसी का खेल
बंगाल के इस चुनावी नतीजों ने पूरे देश को चौंका दिया है। सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency), धार्मिक ध्रुवीकरण और भाजपा की मजबूत घेराबंदी ने ममता बनर्जी के करिश्मे को फीका कर दिया। जिस तृणमूल कांग्रेस को कभी अजेय माना जाता था, वह महज 80 सीटों पर सिमट गई। वहीं, भाजपा ने आक्रामक चुनाव प्रचार के दम पर 200 का जादुई आंकड़ा पार कर इतिहास रच दिया। भवानीपुर की यह हार महज एक सीट की हार नहीं है, बल्कि बंगाल की राजनीति में एक युग के अंत और एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत है।
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