
उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की 10 सीटों के लिए होने वाले आगामी चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) ने उद्योगपति और रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के ग्रुप प्रेसिडेंट धनराज नथवानी को मैदान में उतारकर बड़ा सियासी उलटफेर कर दिया है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के इस अप्रत्याशित कदम को राजनीतिक जानकार एक रणनीतिक ‘मास्टर स्ट्रोक’ मान रहे हैं, वहीं विपक्षी दल इसे लेकर सवाल खड़े करने लगे हैं। नथवानी की उम्मीदवारी के साथ ही उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10वीं सीट के लिए मुकाबला बेहद दिलचस्प और पेचीदा हो गया है।
सपा ने तीसरे प्रत्याशी पर बनाए रखा सस्पेंस, भाजपा के सामने एकजुटता की चुनौती
विधानसभा के मौजूदा संख्या बल के अनुसार, सपा अपने दम पर दो सीटें और भाजपा सात सीटें आसानी से जीत सकती है। हालांकि, सपा के तीसरे और भाजपा के आठवें उम्मीदवार के लिए जरूरी मतों का कोटा पूरा नहीं है। सपा ने अपने तीसरे प्रत्याशी को लेकर फिलहाल पत्ते नहीं खोले हैं और पर्दादारी बनाए रखी है। यदि मैदान में 11वां प्रत्याशी उतरता है, तो भाजपा को अपने आठवें प्रत्याशी की विजय सुनिश्चित करने के लिए एनडीए गठबंधन के हर एक वोट को सहेजकर रखना होगा। उत्तर प्रदेश के राज्यसभा चुनावों का इतिहास गवाह रहा है कि जब भी अतिरिक्त उम्मीदवार मैदान में आया है, तो दूसरी वरीयता के मतों के प्रबंधन, प्राथमिकताओं के आवंटन और अंतरात्मा की आवाज के नाम पर क्रॉस वोटिंग का खेल देखने को मिला है। ऐसे में कई बार नतीजे अप्रत्याशित साबित होते हैं और कम उम्मीद वाले प्रत्याशी भी बाजी मार लेते हैं।
क्रॉस वोटिंग का डर: किस खेमे में होगी सेंधमारी?
वर्ष 2024 के राज्यसभा चुनाव में सपा के कई विधायकों ने पार्टी लाइन से अलग हटकर क्रॉस वोटिंग की थी, जिससे पार्टी को झटका लगा था। इस बार पासा पलटता दिख रहा है और सपा की निगाहें सीधे तौर पर एनडीए खेमे में शामिल दलों के विधायकों पर टिकी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एनडीए के असंतुष्ट विधायकों का समर्थन जुटाने में उद्योगपति धनराज नथवानी के व्यक्तिगत और कॉरपोरेट प्रभाव की अहम भूमिका होगी। इसके अलावा, भाजपा और सपा दोनों ही खेमों के वे विधायक, जिन्हें आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में अपना टिकट कटने की आशंका सता रही है, वे भी सुरक्षित भविष्य की तलाश में पाला बदल सकते हैं। फिलहाल दोनों ही प्रमुख दलों के सामने अपने-अपने कुनबे को एकजुट रखने की कड़ी अग्निपरीक्षा है।
सुभासपा, निषाद पार्टी और रालोद विधायकों पर सपा की पैनी नजर
एनडीए के घटक दलों—सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा), निषाद पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल (रालोद)—में कई ऐसे विधायक मौजूद हैं जो पहले किसी न किसी रूप में समाजवादी पार्टी का हिस्सा रहे हैं या सपा के सिंबल पर चुनाव लड़ चुके हैं। सपा रणनीतिकारों का विशेष जोर पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) पृष्ठभूमि से आने वाले विधायकों पर है। चर्चा है कि सुभासपा के तीन विधायकों और रालोद के दो मुस्लिम विधायकों को अपने पाले में लाने का जिम्मा सपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दो दिग्गज नेताओं को सौंपा है। पार्टी को उम्मीद है कि नथवानी की मौजूदगी से तीसरे प्रत्याशी की राह आसान होगी। ठीक वैसे ही, जैसे पिछले चुनाव में भाजपा प्रत्याशी संजय सेठ सपा विधायकों में क्रॉस वोटिंग के सहारे जीत दर्ज करने में सफल रहे थे।
अनिल अंबानी के दौर की यादें हुईं ताजा, विरोधियों ने साधा निशाना
यह पहला मौका नहीं है जब सपा ने किसी बड़े उद्योगपति को उच्च सदन भेजने का फैसला किया है। इससे पहले साल 2004 में भी सपा ने उद्योगपति अनिल अंबानी को निर्दलीय के रूप में राज्यसभा भेजा था, जब रिलायंस उत्तर प्रदेश के दादरी में एक विशाल पावर प्रोजेक्ट लगाने पर काम कर रही थी (हालांकि बाद में उन्होंने इस्तीफा दे दिया था)। अब रिलायंस समूह के शीर्ष अधिकारी और राज्यसभा सांसद परिमल नथवानी के बेटे धनराज नथवानी पर दांव लगाकर सपा ने भाजपा के सामने मुश्किलें तो खड़ी की हैं, लेकिन खुद भी तीखे हमलों के घेरे में आ गई है। सुभासपा और एआईएमआईएम ने इसे पीडीए की राजनीति के विपरीत बताकर कड़ा विरोध जताया है, वहीं कांग्रेस भी तंज कसने से नहीं चूक रही। इसके साथ ही सपा के भीतर भी पूर्व आईएएस आलोक रंजन और पूर्व केंद्रीय मंत्री सलीम इकबाल शेरवानी जैसे दिग्गज दावेदारों की मौजूदगी के बीच नथवानी को टिकट दिए जाने से अंदरूनी सुगबुगाहट तेज हो गई है।
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