
उत्तर प्रदेश में अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। तमाम सियासी दलों के साथ मुख्य विपक्षी भूमिका में जुटी कांग्रेस भी जमीन पर सक्रिय नजर आ रही है। इसी बीच चुनाव से ऐन पहले प्रदेश संगठन में बड़े फेरबदल की अटकलों ने जोर पकड़ लिया है। पार्टी गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष अजय राय की कुर्सी और उनके सियासी भविष्य को लेकर हो रही है। इस पर हाल ही में कांग्रेस के यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने यह कहकर सस्पेंस और बढ़ा दिया कि प्रदेश अध्यक्ष पद पर कोई भी फैसला केंद्रीय नेतृत्व के अधिकार क्षेत्र में आता है।
अजय राय के नेतृत्व पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
अजय राय को अगस्त 2023 में यूपी कांग्रेस की कमान सौंपी गई थी। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ मोर्चा संभाला। उनके कार्यकाल को लेकर संगठन के भीतर दो अलग-अलग राय नजर आ रही हैं। एक गुट का तर्क है कि चुनाव से चंद महीने पहले सेनापति बदलना संगठन के संतुलन को बिगाड़ सकता है, क्योंकि मौजूदा टीम ने पिछले कुछ वर्षों में जमीनी स्तर पर चुनाव की रूपरेखा तैयार की है। वहीं, दूसरा धड़ा 2027 के महासमर को देखते हुए प्रदेश में नए सामाजिक और जातीय समीकरणों को साधने के लिए बदलाव की वकालत कर रहा है।
रेस में सबसे आगे आराधना मिश्रा ‘मोना’ का नाम
यदि आलाकमान बदलाव का मन बनाता है, तो इस पद की दौड़ में कांग्रेस विधानमंडल दल की नेता और प्रतापगढ़ की रामपुर खास सीट से तीन बार की विधायक आराधना मिश्रा ‘मोना’ का नाम सबसे प्रमुखता से उभरकर सामने आ रहा है। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता प्रमोद तिवारी की बेटी आराधना मिश्रा के पास यूपी के संगठन और विधायी राजनीति का लंबा तजुर्बा है। हाल ही में सितंबर महीने में यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम की प्रमोद तिवारी और आराधना मिश्रा से हुई मुलाकात के बाद इन अटकलों को और अधिक बल मिला है।
ओबीसी और मुस्लिम चेहरों पर भी मंथन, कार्यकारी अध्यक्षों का फॉर्मूला संभव
कांग्रेस के भीतर चर्चा सिर्फ सवर्ण या ब्राह्मण चेहरे तक सीमित नहीं है। पार्टी एक बड़े सामाजिक वर्ग को साधने के लिए ओबीसी या मुस्लिम नेतृत्व पर भी विचार कर रही है। जून में राजेंद्र पाल गौतम के प्रभारी बनने के बाद राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी और सीतापुर से सांसद राकेश राठौर के नाम भी सियासी गलियारों में तैरते रहे हैं। इसके अलावा पार्टी एक अन्य हाइब्रिड मॉडल पर भी विचार कर सकती है, जिसके तहत एक प्रदेश अध्यक्ष के साथ एक ओबीसी और एक मुस्लिम कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर विभिन्न सामाजिक वर्गों को एक साथ साधा जा सके।
क्या होगा अजय राय का अगला सियासी कदम?
यदि प्रदेश संगठन में शीर्ष स्तर पर बदलाव होता है, तो अजय राय की नई भूमिका क्या होगी, इस पर भी कई कयास लगाए जा रहे हैं। चर्चा है कि उन्हें केंद्रीय संगठन में राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी दी जा सकती है। हाल ही में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से उनकी हुई मुलाकात के बाद इस तरह की चर्चाओं ने रफ्तार पकड़ी है। इस बीच अजय राय ने खुद भी आगामी विधानसभा चुनाव में वाराणसी की सीट से चुनावी मैदान में उतरने का एलान कर दिया है, जिससे साफ है कि वे प्रदेश की सक्रिय चुनावी राजनीति में पूरी तरह बने रहेंगे।
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