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मुलायम की सियासी विरासत को आगे बढ़ाने की चुनौती, अखिलेश यादव का होगा इम्तिहान, 2027 के लिए सपा कितनी तैयार?

मुलायम सिंह यादव ने साल 2012 में उत्तर प्रदेश की सत्ता की बागडोर पूरे स्नेह और भरोसे के साथ अपने बेटे अखिलेश यादव के हाथों में सौंपी थी। हालांकि, 2017 आते-आते पार्टी के भीतर वर्चस्व की जंग छिड़ गई। अखिलेश ने पिता से सीधे टकराकर समाजवादी पार्टी की कमान अपने हाथों में ले ली। उस वक्त पार्टी में बड़ी टूट का अंदेशा था, लेकिन मुलायम सिंह यादव ने बेटे की राह आसान करने के लिए खुद कदम पीछे खींच लिए। दशकों के संघर्ष से तैयार किए गए जनाधार को बिखरने से बचाने के लिए पिता मान गए, मगर यह सवाल सियासी गलियारों में तैरता रहा कि क्या अखिलेश अपने पिता की इस विशाल राजनीतिक पूंजी को संभाल पाएंगे?

बगावत के बाद मुलायम पीछे हटे, अखिलेश के हाथ आई सपा की कमान

मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी को जमीनी संघर्ष, सटीक सामाजिक समीकरणों और मजबूत कैडर के दम पर खड़ा किया था। जनवरी 2017 में जब अखिलेश यादव ने पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद संभाला, तो पिता-पुत्र के बीच तल्खी चरम पर थी। पिता अपनी बनाई सल्तनत पर पकड़ बनाए रखना चाहते थे, जबकि पुत्र को पार्टी के भविष्य के लिए नई पीढ़ी की ताजपोशी जरूरी लग रही थी। आखिरकार पिता ने समझौता किया; वे पार्टी कार्यालय तो आते रहे, लेकिन संगठन और फैसलों में उनकी दखल खत्म हो गई। अखिलेश के सामने अब विरासत को चुनावी सफलता में बदलने की सबसे बड़ी चुनौती थी।

2017 का विधानसभा चुनाव: पिता की असहमति और गठबंधन का नाकाम दांव

परिवार की जंग जीतने के बाद जनता की अदालत में इम्तिहान बाकी था। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ हाथ मिलाया, जबकि मुलायम सिंह यादव इस गठबंधन के सख्त खिलाफ थे। नतीजे सपा के लिए करारा झटका साबित हुए। 2012 में 224 सीटें जीतने वाली समाजवादी पार्टी महज़ 47 सीटों पर सिमट गई, जबकि कांग्रेस केवल 7 सीटें जीत सकी। मोदी लहर और सत्ता विरोधी रुझान (एंटी-इनकंबेंसी) के सहारे भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया। इस हार ने यह संदेश दिया कि मुलायम के राजनीतिक अनुभव के बिना अखिलेश की राह बेहद पथरीली है।

2019 का लोकसभा चुनाव: बसपा से हाथ मिलाया, पर दांव पड़ा उल्टा

2017 की हार के बाद अखिलेश यादव ने 2019 के लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ ऐतिहासिक गठबंधन कर सबको चौंका दिया। 1995 के गेस्ट हाउस कांड के बाद मुलायम और मायावती के रिश्ते कटु थे, इसलिए मुलायम इस मेल के भी पक्ष में नहीं थे। उन्हें गठबंधन के स्थायित्व पर संदेह था। अखिलेश को उम्मीद थी कि ‘एम-वाई’ (मुस्लिम-यादव) और दलित वोटों का गठजोड़ भाजपा को रोक देगा। परिणाम आए तो फायदा सिर्फ बसपा को हुआ, जो शून्य से 10 सीटों पर पहुंच गई, जबकि सपा 5 सीटों पर ही अटकी रह गई। चुनाव खत्म होते ही मायावती ने गठबंधन तोड़ दिया और मुलायम की आशंका सच साबित हुई।

2022 में वापसी की उम्मीद और 2024 में ‘PDA’ का चमत्कारी फॉर्मूला

लगातार दो बड़े झटकों के बाद अखिलेश यादव ने अपनी रणनीति बदली। 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बड़े दलों के बजाय छोटे और क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन किया। भले ही सपा सत्ता से दूर रही, लेकिन 2017 की 47 सीटों के मुकाबले 111 सीटें जीतकर उसने जोरदार वापसी की। सपा का वोट शेयर बढ़कर 32.06 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो 2012 के 29.15 प्रतिशत से भी अधिक था।

असली सियासी उलटफेर 2024 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला। अखिलेश यादव ने पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक यानी ‘पीडीए’ (PDA) का नया सामाजिक समीकरण गढ़ा। साथ ही ‘संविधान बचाओ’ के नैरेटिव ने जमीन पर काम किया। सपा ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और यूपी की 80 में से 37 लोकसभा सीटें जीतकर इतिहास रच दिया—जो पार्टी के इतिहास का सर्वश्रेष्ठ लोकसभा प्रदर्शन है। भाजपा 33 सीटों पर सिमट गई और इस नतीजे ने अखिलेश को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया।

2027 की तैयारी: एकजुट सैफई कुनबा और अपनी शर्तों पर कांग्रेस से गठबंधन

2027 के विधानसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी पूरी तरह से भाजपा से सीधे मुकाबले के मूड में है। इस बार परिस्थितियां अखिलेश के अनुकूल दिख रही हैं। 2017 जैसी पारिवारिक कलह अब नहीं है; चाचा शिवपाल यादव सहित पूरा सैफई कुनबा अब अखिलेश के नेतृत्व को पूरी तरह स्वीकार कर चुका है।

बसपा का जनाधार लगातार खिसक रहा है, जिससे गैर-भाजपा वोटों का मुख्य केंद्र सपा बन चुकी है। 2024 की जीत के बाद कांग्रेस राज्य में 150 सीटों की मांग कर रही है, लेकिन मजबूत स्थिति में पहुंचे अखिलेश यादव गठबंधन अपनी शर्तों पर ही करना चाहेंगे। राहुल गांधी के गढ़ रायबरेली से चुनावी अभियान की शुरुआत कर अखिलेश ने यह संकेत दे दिया है कि वे बड़े भाई की भूमिका में ही मैदान संभालेंगे।

क्या मुलायम की राजनीतिक पूंजी संभाल पाए अखिलेश?

आंकड़ों के नजरिए से देखें तो मुलायम सिंह यादव के दौर में सपा ने 2012 में 224 विधानसभा सीटें और 2004 में अधिकतम 36 लोकसभा सीटें जीती थीं। अखिलेश के नेतृत्व में 2024 में सपा ने 37 लोकसभा सीटें जीतकर मुलायम के रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया है। 2022 में सीटें भले 111 रहीं, लेकिन वोट प्रतिशत के मामले में पार्टी का जनाधार बढ़ा है। आज उत्तर प्रदेश का चुनावी परिदृश्य पूरी तरह से भाजपा बनाम सपा के आमने-सामने के मुकाबले में तब्दील हो चुका है, जिसने 2027 के महामुकाबले को बेहद दिलचस्प बना दिया है।

 

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