तेहरान/वाशिंगटन। पश्चिम एशिया में जारी भीषण तनाव के बीच ईरान ने दुनिया के सबसे व्यस्त और रणनीतिक समुद्री जलमार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने के लिए अमेरिका के समक्ष एक बड़ा कूटनीतिक प्रस्ताव रखा है। ईरान ने स्पष्ट किया है कि यदि अमेरिका उसकी तीन मुख्य शर्तें स्वीकार कर लेता है, तो महज सात दिनों के भीतर इस अहम समुद्री मार्ग को जहाजों की आवाजाही के लिए खोल दिया जाएगा। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच ठप पड़ी परमाणु वार्ता भी दोबारा पटरी पर लौट सकती है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने गेंद वाशिंगटन के पाले में डालते हुए साफ कर दिया है कि अब अगला कदम अमेरिका को ही तय करना है।
कतर के जरिए पहुंचाया गया शांति प्रस्ताव
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के अनुसार, तेहरान ने यह औपचारिक प्रस्ताव खाड़ी देश कतर की मध्यस्थता के जरिए अमेरिका तक पहुंचाया है। इस योजना के तहत अमेरिका को तय समयसीमा के भीतर कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। अराघची ने रेखांकित किया कि ये मांगें पूरी तरह नई नहीं हैं, बल्कि दोनों पक्षों के बीच जून में बनी पूर्व सहमति का ही हिस्सा हैं। जैसे ही अमेरिका इन शर्तों पर अपनी आधिकारिक सहमति देगा, सात दिवसीय समयसीमा की उलटी गिनती उसी दिन से शुरू हो जाएगी।
ईरान की वो 3 शर्तें जिन पर टिका है पूरा फैसला
तनाव घटाने और समुद्री मार्ग को बहाल करने के लिए ईरान ने अमेरिका के समक्ष तीन प्रमुख मांगें रखी हैं:
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नौसैनिक नाकाबंदी की समाप्ति: ईरानी बंदरगाहों के आसपास लगाई गई अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी को तुरंत हटाया जाए।
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तेल प्रतिबंधों में राहत: ईरान के कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय व्यापार और बिक्री पर लगे कड़े प्रतिबंधों में ढील दी जाए।
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व्यापक युद्धविराम: क्षेत्र में ऐसा संपूर्ण युद्धविराम लागू किया जाए, जिसके दायरे में लेबनान भी अनिवार्य रूप से शामिल हो।
अराघची ने कार्ययोजना समझाते हुए कहा कि अमेरिका की ओर से इन कदमों को पूरा करने में चार से पांच दिन का समय लगेगा। इसके बाद छठे दिन ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह खोल देगा और सातवें दिन दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम पर औपचारिक बातचीत फिर से शुरू कर दी जाएगी।
‘दबाव या धमकी के आगे नहीं झुकेगा ईरान’
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स से बातचीत में अब्बास अराघची ने दो टूक शब्दों में कहा कि फैसला पूरी तरह अमेरिका के हाथ में है। उन्होंने कड़े लहजे में चेतावनी दी कि ईरान किसी भी प्रकार के दबाव, सैन्य धमकी या डराने-धमकाने की नीति को कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। तेहरान किसी भी बाहरी दबाव में अपने संप्रभु अधिकारों से एक इंच भी पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने दोहराया कि यदि अमेरिका सकारात्मक रुख दिखाता है, तो समझौते के सभी आवश्यक तकनीकी व कूटनीतिक प्रबंध पहले से ही पूरे हैं।
ट्रंप और शी जिनपिंग की वार्ता में भी गूंजा मुद्दा
मिडिल ईस्ट का यह गहराता संकट अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई उच्चस्तरीय बैठक में भी प्रमुखता से उठा। रॉयटर्स के अनुसार, राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ट्रंप से आग्रह किया कि अमेरिका को ईरान के साथ पहले तय हुए सहमति पत्र (MOU) के ढांचे पर वापस लौटना चाहिए।
चीन की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का खुला रहना बेहद संवेदनशील है। खाड़ी देशों से चीन को होने वाली तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। सप्लाई चेन में रुकावट आने पर चीनी बाजार सीधे प्रभावित होते हैं, यही वजह है कि बीजिंग इस संकट के शांतिपूर्ण समाधान को लेकर लगातार सक्रिय है।
तेहरान ने किया बीजिंग के कूटनीतिक रुख का स्वागत
इस कूटनीतिक हलचल के बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजश्कियान ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के रुख का पुरजोर स्वागत किया। राष्ट्रपति पेजश्कियान ने सोशल मीडिया मंच पर आभार जताते हुए कहा कि वे इस्लामाबाद समझौते की बहाली और संवाद के जरिए विवाद निपटाने की वकालत करने के लिए शी जिनपिंग के आभारी हैं। ईरान का यह कदम साफ दर्शाता है कि पश्चिमी प्रतिबंधों के साये में वह चीन जैसे अपने मजबूत सहयोगियों के साथ रणनीतिक तालमेल मजबूत बनाए रखना चाहता है।
जून का 60 दिवसीय समझौता क्यों हुआ था विफल?
ईरान की ताजा पेशकश जून महीने में हुए उस अंतरिम समझौते से काफी मेल खाती है, जिसमें 60 दिनों की अस्थायी शांति व्यवस्था बनाई गई थी। हालांकि, आपसी विश्वास की भारी कमी के कारण वह व्यवस्था लंबे समय तक नहीं टिक पाई। दोनों देशों ने एक-दूसरे पर समझौते के प्रावधानों के उल्लंघन का आरोप लगाया। बाद में परमाणु वार्ता के बीच ईरान पर अमेरिका और इजरायल के सैन्य हमलों के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों पर फिर से हमले शुरू हो गए और हालात दोबारा जंग के मुहाने पर पहुंच गए।
सऊदी अरब की सतर्कता और हूती हमलों का साया
रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब इस नए ईरानी प्रस्ताव को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं है। शुरुआत में खाड़ी के कुछ देशों ने बातचीत का समर्थन करते हुए सुझाव दिया था कि ईरान को होर्मुज के प्रबंधन में कुछ समय के लिए साझीदारी दी जा सकती है। हालांकि, यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा तेज किए गए हमलों और सऊदी अरब की तेल पाइपलाइन को निशाना बनाए जाने के बाद रियाद का रुख काफी सख्त हो गया है और वह किसी भी समझौते पर फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है।
दुनिया के 20 फीसदी तेल व्यापार की लाइफलाइन
गौरतलब है कि जंग के बादल छाने से पहले तक पूरी दुनिया के कुल तेल और प्राकृतिक गैस (LNG) व्यापार का लगभग 20 फीसदी हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के संकरे समुद्री गलियारे से ही होकर गुजरता था। वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से यह दुनिया का सबसे नाजुक ‘चोकपॉइंट’ माना जाता है। इस मार्ग पर जरा सा भी व्यवधान कच्चे तेल की कीमतों को आसमान पर पहुंचा देता है, जिससे दुनिया भर में महंगाई और आर्थिक संकट गहराने का खतरा पैदा हो जाता है।
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