Thursday , 24 September 2026

फॉर्म 6 में आखिर ऐसा क्या बदला, जिस पर खड़ा हुआ बखेड़ा? कांग्रेस ने CEC का मांगा इस्तीफा

 

नई दिल्ली नए मतदाताओं के ऑनलाइन पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले फॉर्म 6 (ECINet) में किए गए गुप्त और तकनीकी बदलावों को लेकर देश के प्रशासनिक और सियासी हलकों में बड़ा भूचाल आ गया है। तीन सदस्यीय भारत निर्वाचन आयोग के भीतर से ही फूटी बगावत और असहमति की आवाजों के बाद यह पूरा प्रकरण अब सीधे तौर पर संवैधानिक, विधिक और राजनीतिक संग्राम का रूप ले चुका है। आयोग के दो मौजूदा चुनाव आयुक्तों—डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी द्वारा इस प्रक्रिया पर कड़ी कानूनी आपत्तियां जताते हुए आधिकारिक ‘डिसेंट नोट’ (असहमत पत्र) दर्ज कराने के बाद, समूचा विपक्ष केंद्र सरकार और मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) के खिलाफ आक्रामक रुख अख्तियार कर चुका है।

फॉर्म 6 में आखिर ऐसा क्या बदला, जिस पर खड़ा हुआ देशव्यापी बखेड़ा?

डिजिटल पोर्टल पर नए वोटरों के पंजीकरण के लिए उपलब्ध फॉर्म 6 में ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) से संबंधित एक नया स्व-घोषणा खंड (डिक्लेरेशन पार्ट) गुपचुप तरीके से जोड़ दिया गया। इस बदलाव के तहत विशेष रूप से पहली बार मतदान करने वाले 18 वर्ष के युवाओं और नए आवेदकों के सामने उनके पूर्वजों के चुनावी रिकॉर्ड को लेकर तीन पेचीदा विकल्प रखे गए। युवाओं से अनिवार्य तौर पर पूछा गया कि क्या 2000 के दशक की शुरुआत में हुए एसआईआर पुनरीक्षण के दौरान वोटर लिस्ट में उनका स्वयं का नाम मौजूद था? दूसरा विकल्प यह था कि क्या उस पुरानी सूची में उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी/नाना-नानी का नाम दर्ज था? तीसरा सवाल यह रखा गया कि क्या उस पुरानी लिस्ट में न तो उनका और न ही उनके किसी परिजन का नाम शामिल था? हालांकि तकनीकी रूप से इस कॉलम को ‘गैर-अनिवार्य’ (नॉन-मैंडेटरी) दर्शाया गया था, लेकिन जमीनी हकीकत यह थी कि इन तीनों में से किसी एक विकल्प को चुने बिना पोर्टल पर फॉर्म ऑनलाइन सबमिट ही नहीं हो रहा था।

आयुक्तों और पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्तों के 4 सबसे बड़े कानूनी ऐतराज

निर्वाचन आयोग के दोनों आयुक्तों ने इस पूरी कवायद को स्थापित नियमों का सीधा उल्लंघन करार दिया है। उनके इस रुख को पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओ.पी. रावत और पूर्व निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा का भी खुला समर्थन मिला है। आयुक्तों का सबसे पहला और बुनियादी कानूनी तर्क यह है कि फॉर्म 6 पूरी तरह एक वैधानिक (स्टैच्यूचरी) दस्तावेज है, जिसका स्वरूप ‘रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960’ के विधिक प्रावधानों के तहत तय है। इस नियम या फॉर्म में कोई भी फेरबदल करने का अधिकार केवल कानून मंत्रालय के पास है, जो औपचारिक गजट अधिसूचना और विधायी संशोधन के जरिए ही संभव है। आयोग अपने स्तर पर महज कोई प्रशासनिक आदेश या गाइडलाइन जारी कर इसमें मनमाना बदलाव नहीं कर सकता।

दूसरा बड़ा ऐतराज चुनाव आयुक्त डॉ. संधू ने अपने असहमति नोट में दर्ज कराया। उन्होंने स्पष्ट चेताया कि इस तरह के आधे-अधूरे, अस्पष्ट और अनधिकृत घोषणा खंड जोड़ने से पहली बार वोटर बनने जा रहे युवाओं को भारी मानसिक व तकनीकी परेशानी झेलनी पड़ेगी और वे अपने मौलिक मताधिकार से पूरी तरह वंचित हो सकते हैं। तीसरा ऐतराज जताते हुए पूर्व CEC ओ.पी. रावत ने रेखांकित किया कि एसआईआर की इस जटिल प्रक्रिया ने आम नागरिकों और युवाओं के मन में एक गहरा भय भर दिया है, जो किसी भी जीवंत लोकतंत्र के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। जिन परिवारों के नाम वर्ष 2000 के पुनरीक्षण के दौरान किसी भी प्रशासनिक चूक से छूट गए थे या काट दिए गए थे, उनके बच्चों के सामने अब वोट का अधिकार हासिल करने के लिए पीढ़ीगत संकट खड़ा हो गया है। चौथा गंभीर आक्षेप यह लगा कि समूचे देश के डिजिटल चुनावी डेटाबेस (ECINet और ERONet) का नियंत्रण विकेंद्रीकृत व्यवस्था से छीनकर दिल्ली मुख्यालय में केंद्रित किया जा रहा है। इससे फील्ड में तैनात निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (EROs) के अधिकार और कार्यप्रणाली की स्वतंत्रता छीनी जा रही है। प्राप्त दस्तावेजों के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने बीते 10 महीनों के भीतर इस मनमानी पर कम से कम 14 बार लिखित रूप से कड़े ऐतराज दर्ज कराए थे। हालांकि आयोग ने इन अंदरूनी मतभेदों पर सफाई देते हुए कहा कि निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय है जहां विचारों की भिन्नता, आंतरिक टिप्पणियां और आलोचनाएं एक स्वस्थ प्रक्रिया का हिस्सा हैं और चुनावी पुनरीक्षण से जुड़े सभी अंतिम फैसले पूरी सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

तानाशाही का आरोप: कांग्रेस ने CEC का इस्तीफा मांगा, सिंघवी ने खोली आंकड़ों की पोल

फॉर्म 6 में किए गए इस बदलाव के सार्वजनिक होते ही विपक्षी दलों ने सरकार और निर्वाचन आयोग के शीर्ष नेतृत्व को आड़े हाथों लिया है। कांग्रेस पार्टी ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि इस सनसनीखेज खुलासे के बाद मुख्य निर्वाचन आयुक्त को अपने पद पर एक सेकंड भी बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है, वे अविलंब इस्तीफा दें। मुख्य विपक्षी दल ने आरोप लगाया कि सत्ताधारी भाजपा ने ‘लोकतंत्र की हत्या’ का खुला दफ्तर बना रखा है और देश की संस्थाओं पर ‘डबल-बुलडोजर’ चलाया जा रहा है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त की कार्यप्रणाली को निरंकुश बताते हुए पार्टी ने कहा कि एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था को बंधक बना लिया गया है। कांग्रेस प्रवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट की नजीर का हवाला देते हुए याद दिलाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त कोई सर्वोच्च या निरंकुश सत्ता नहीं हैं, बल्कि वे आयोग के तीनों सदस्यों में केवल ‘समान पदों में प्रथम’ (फर्स्ट अमंग इक्वल्स) की हैसियत रखते हैं।

कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद और जाने-माने विधिवेत्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि असहमति ही स्वस्थ लोकतंत्र की सबसे बड़ी ढाल है, कोई अड़ंगा नहीं। उन्होंने दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा निर्भीकता से दर्ज कराए गए ‘डिसेंट नोट्स’ की सराहना करते हुए मांग की कि चुनाव प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने के लिए इन सभी लिखित असहमति पत्रों को तुरंत सार्वजनिक पटल पर लाया जाना चाहिए। सिंघवी ने आरोप लगाया कि यह पूरा उपक्रम सत्ताधारी दल के येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतने के बेकाबू जुनून और विपक्ष के पूर्ण सफाए की मंशा को उजागर करता है। उन्होंने पश्चिम बंगाल के संदर्भ में तंज कसते हुए कहा कि यह दुनिया का पहला अजूबा है जहां औपचारिक विपक्ष खुद सरकार का समर्थन करने में जुटा है।

इसके साथ ही डॉ. सिंघवी ने मतदाता सूचियों से नाम काटे जाने के खौफनाक आंकड़ों का खुलासा किया। उन्होंने बताया कि एसआईआर (SIR) के पहले और दूसरे चरण के दौरान ही 7.8 करोड़ मतदाताओं के नाम काट दिए गए, जो कि तत्कालीन वोटर लिस्ट का कुल 13 प्रतिशत हिस्सा था। वर्तमान में देश के 16 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में चल रहे अगले चरण के तहत अब तक 6.18 करोड़ नाम (लगभग 17 प्रतिशत) हटाए जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त 5.43 करोड़ मतदाताओं को ‘संदिग्ध’ की श्रेणी में डालकर अतिरिक्त दस्तावेज पेश करने के नोटिस थमाए गए हैं। सिंघवी ने गहरी आशंका जताई कि यदि इस एसआईआर प्रक्रिया को तुरंत नहीं रोका गया, तो पूरे देश में मतदाता सूची से बाहर किए जाने वाले कुल नागरिकों का आंकड़ा 15 करोड़ के पार पहुंच सकता है।

 

Check Also

दिल्ली आस्था कुंज गैंगरेप कांड: खुद को पुलिस बताकर नाबालिग छात्रा से दरिंदगी, एलएलबी पास आरोपी ने धो डाले खून सने कपड़े; एनकाउंटर के बाद 3 गिरफ्तार

नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली के कालकाजी इलाके में स्थित 150 एकड़ में फैले …