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अल नीनो का साया: फरवरी 2027 तक 100% असर रहने का अनुमान, सूखे और भीषण लू से खेती व भूजल संकट की चेतावनी, फसलों को भारी नुकसान का डर

प्रशांत महासागर में अल नीनो की सक्रियता तेजी से बढ़ रही है, जिसके संकेत भारत के मौसम, कृषि और ग्रामीण जनजीवन के लिए चिंताजनक साबित हो सकते हैं। विश्व मौसम संगठन (WMO) के ताजा आकलन के अनुसार, फरवरी 2027 तक अल नीनो के प्रभावी बने रहने की संभावना लगभग 100 प्रतिशत है। इस मौसमी परिघटना के चलते देश में औसत तापमान में वृद्धि, मानसूनी वर्षा के मिजाज में अप्रत्याशित बदलाव और जल स्रोतों में भारी कमी का संकट गहराने की आशंका है।

65 सालों में साढ़े तीन गुना बढ़ा सूखे और लू का संयुक्त दायरा

भारत में सूखा और भीषण लू का दोहरा प्रकोप पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक हो चुका है। ‘नेचुरल हैजर्ड्स एंड अर्थ सिस्टम साइंसेज’ में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 1951 से 2016 के बीच सूखे और लू की दोहरी मार झेलने वाले क्षेत्रों का दायरा 10 प्रतिशत से बढ़कर 35 प्रतिशत तक पहुंच गया। यानी लगभग 65 वर्षों के दौरान इस दोहरी मौसमी मार की जद में आने वाले इलाकों में साढ़े तीन गुना का इजाफा हुआ है। चिंता की बात यह भी है कि यह संकट अब केवल उत्तर-पश्चिम भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि असम, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे परंपरागत रूप से नम राज्यों में भी इसका असर लगातार बढ़ रहा है।

धान और गेहूं की पैदावार पर सीधा प्रहार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर खतरा

मौसम की यह दोहरी मार कृषि उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ पर सीधा वार करती है। शोध आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि सूखे और लू के संयुक्त प्रभाव वाले वर्षों के दौरान भारत में चावल के उत्पादन में 12.1 प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज की गई। वहीं गेहूं की फसल में दाना पकने के संवेदनशील दौर में यदि तापमान में केवल 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी होती है, तो कुल पैदावार में 3 से 4 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। बारिश में कमी और बढ़ते पारे का यह चक्र न सिर्फ फसलों को बर्बाद करता है, बल्कि खेतिहर मजदूरों की दैनिक आय, पशुधन के चारे और गांवों में पेयजल सुरक्षा को भी गहरे संकट में डाल देता है।

अल नीनो और बढ़ते तापमान का घातक चक्र

अल नीनो की स्थिति तब बनती है जब मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य औसत से काफी अधिक हो जाता है। इसका सीधा असर वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण और मानसूनी हवाओं पर पड़ता है। भारत में इसके प्रभाव से मानसूनी बारिश कमजोर पड़ने का जोखिम रहता है। इस बार मुख्य चिंता यह है कि अल नीनो के चलते गर्मी और सूखे का एक दुष्चक्र बन रहा है। मिट्टी की नमी घटने से जमीन और सतही हवा तेजी से गर्म होती है, और यह बढ़ा हुआ तापमान जमीन की बची-खुची नमी को भी सोख लेता है। अब यह मौसमी बदलाव उन क्षेत्रों में भी दस्तक दे रहा है जहां पहले भरपूर बारिश होती थी, जिससे राजस्थान और गुजरात के साथ-साथ पूर्वी व दक्षिणी भारत के कृषि बेल्ट के लिए भी सतर्कता जरूरी हो गई है।

जल जीवन मिशन का विस्तार, मगर आपूर्ति की निरंतरता पर सवाल

ग्रामीण इलाकों में पेयजल संकट से निपटने के लिए केंद्र सरकार के जल जीवन मिशन के तहत तेजी से काम हुआ है। अगस्त 2019 में जहां केवल 17 प्रतिशत ग्रामीण घरों तक नल कनेक्शन उपलब्ध था, वहीं जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार दिसंबर 2025 तक यह आंकड़ा बढ़कर 81 प्रतिशत से अधिक हो चुका है। हालांकि बुनियादी ढांचा तैयार होने के बाद पानी की निरंतर और पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना अब भी एक बड़ी चुनौती है। वर्ष 2024 में 2.37 लाख से अधिक ग्रामीण परिवारों के सर्वेक्षण में पाया गया कि 86.5 प्रतिशत घरों में नल सुचारू रूप से चालू थे, लेकिन जरूरत के अनुरूप पर्याप्त पानी केवल 80.2 प्रतिशत परिवारों को ही मिल पा रहा था। वहीं समयबद्ध जलापूर्ति 83.6 प्रतिशत और तय गुणवत्ता का पानी 76 प्रतिशत परिवारों तक पहुंच रहा था।

पारंपरिक जल स्रोतों की बहाली और पूर्व तैयारियों की दरकार

अल नीनो के संभावित खतरों से निपटने के लिए ग्रामीण स्तर पर अग्रिम जल प्रबंधन रणनीतियां लागू करना अनिवार्य हो गया है। ग्राम पंचायत स्तर पर भूजल स्तर और प्राकृतिक स्रोतों का सटीक ऑडिट कर सालभर के जल बजट की योजना तैयार करनी होगी। इसके तहत पुराने जोहड़ों, तालाबों और पारंपरिक जल संरचनाओं का पुनरुद्धार प्राथमिकता के आधार पर किया जाना जरूरी है। साथ ही मनरेगा जैसी योजनाओं में जल संरक्षण कार्यों का मूल्यांकन केवल बजट खर्च या ढांचा निर्माण तक सीमित न रखकर वास्तविक जल संचयन क्षमता के आधार पर करने की आवश्यकता है, ताकि लंबे सूखे और भीषण गर्मी के दौर में भी खाद्य सुरक्षा व ग्रामीण आजीविका सुरक्षित रह सके।

 

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