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यूपी चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन पर रार? 200 सीटों की जिद पर अड़ी कांग्रेस, अखिलेश का फॉर्मूला उलझाएगा पेंच

लखनऊ उत्तर प्रदेश के आगामी सियासी रण को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की बिसात बिछने लगी है। हालांकि, सीट बंटवारे की पहली ही मेज पर दोनों दलों के दावों और हकीकत के बीच तगड़ा फासला नजर आ रहा है। कांग्रेस जहां प्रदेश में अपनी खोई हुई सियासी जमीन को दोबारा हासिल करने के लिए भारी-भरकम सीटों पर दावा ठोक रही है, वहीं सपा किसी भी कीमत पर ड्राइविंग सीट छोड़ने के मूड में नहीं है। अखिलेश यादव पूरी चुनावी रणनीति और गठबंधन की कमान अपने हाथ में रखने की तैयारी कर चुके हैं, जिससे बातचीत की राह बेहद पेचीदा नजर आ रही है।

दावों का टकराव: 200 पर कांग्रेस की नजर, सपा का मूड 65 का

राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि शुरुआत में 150 से कम सीटों पर बात न करने का दम भरने वाली कांग्रेस अब अपनी दावेदारी 200 सीटों तक ले आई है। पार्टी नेताओं का तर्क है कि राज्य में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के लिए व्यापक स्तर पर उतरना जरूरी है। वहीं, सपा की रणनीति इसके ठीक उलट है। सपा अपने आंतरिक सर्वे और जमीनी समीकरणों के आधार पर कांग्रेस को 60 से 65 सीटों के आसपास से बातचीत की शुरुआत कराने की योजना बना रही है। हालांकि, अंतिम रूप से सीटों का जादुई आंकड़ा क्या होगा, इस पर अभी दोनों ओर से पत्ते पूरी तरह नहीं खोले गए हैं।

अखिलेश का सीधा संदेश: संख्या नहीं, जीत की गारंटी जरूरी

सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव पहले ही इस बात के साफ संकेत दे चुके हैं कि गठबंधन में सीटों की गिनती से ज्यादा अहम जीत की संभावना (विनेबिलिटी) है। सपा का रुख स्पष्ट है कि सीट उसी के खाते में जाएगी, जिसका उम्मीदवार बूथ स्तर पर जीत दर्ज करने की कूवत रखता हो। बातचीत की मेज पर दोनों दलों के संगठनों की सक्रियता, स्थानीय कैडर, संभावित प्रत्याशियों का जनाधार और सामाजिक ताना-बाना ही अंतिम मुहर तय करेगा।

पुराने रिपोर्ट कार्ड की कसौटी: 2022 का झटका बनाम 2024 की ताकत

सीट शेयरिंग की चर्चाओं में बीते चुनावों के नतीजे बेहद अहम हथियार साबित होने जा रहे हैं। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 399 सीटों पर जोर आजमाइश की थी, लेकिन सफलता सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई थी। सपा इस कमजोर प्रदर्शन को ढाल बनाकर कांग्रेस के 200 सीटों के दावे को कमजोर करने की कोशिश करेगी। दूसरी ओर, कांग्रेस वर्ष 2024 के लोकसभा नतीजों को अपना मजबूत तर्क बनाएगी। आम चुनाव में सपा ने 37 तो कांग्रेस ने 6 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जिसमें विधानसभा क्षेत्रों के लिहाज से सपा को 183 और कांग्रेस को 39 हलकों में बढ़त मिली थी। कांग्रेस का दावा है कि लोकसभा चुनाव ने राज्य में उसके पक्ष में माहौल बदला है।

बगावत का डर: अपनों को साधना दोनों दलों के लिए बड़ी अग्निपरीक्षा

सपा ने प्रदेश की सभी सीटों का गहन आंतरिक आकलन कराया है, जिसमें जीत की संभावनाओं को परखा गया है। लेकिन अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने ही स्थानीय नेताओं और संभावित दावेदारों को साधे रखने की होगी। जिन मजबूत सीटों पर सपा नेता वर्षों से तैयारी कर रहे हैं, अगर वे सीटें समझौते में कांग्रेस को गईं, तो भीतरघात और बगावत का खतरा बढ़ जाएगा। वहीं, अगर कांग्रेस को उम्मीद से बहुत कम सीटें मिलती हैं, तो उसके कार्यकर्ताओं में निराशा फैलने और गठबंधन में महज ‘पिछलग्गू’ बनने का संदेश जाने का डर है। ऐसे में दोनों शीर्ष नेताओं के लिए सीटों की अदला-बदली, उम्मीदवारों की सर्वस्वीकार्यता और चुनावी जीत के बीच बारीक संतुलन साधना सबसे कठिन चुनौती साबित होगा।

 

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