Wednesday , 7 October 2026

RBI MPC Meeting: क्या आम आदमी की जेब पर फिर बढ़ेगा बोझ? ब्याज दरों में 25 बेसिस प्वाइंट के इजाफे की आहट, आज के फैसले पर टिकी नजरें

भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति यानी एमपीसी की अहम बैठक पर आज 7 अक्टूबर को पूरे वित्तीय बाजार और देश के कारोबारियों की निगाहें जमी हुई हैं। बीते लंबे वक्त से नीतिगत ब्याज दरों में स्थिरता का दौर बना हुआ था, लेकिन अब मैक्रो-इकोनॉमिक मोर्चे पर बदलते समीकरण नीति निर्माताओं को कड़े फैसले की ओर धकेल रहे हैं। बाजार के अधिकांश विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि केंद्रीय बैंक आज रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट यानी 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी का ऐलान कर सकता है। अगर समिति की मुहर इस प्रस्ताव पर लगती है, तो देश में रेपो रेट बढ़कर सीधे 5.5 फीसदी के स्तर पर पहुंच जाएगा।

फरवरी 2023 के बाद यह पहला ऐसा मौका होगा जब देश का केंद्रीय बैंक नीतिगत ब्याज दरों में बढ़ोतरी का रास्ता चुनेगा। वित्तीय हलकों में इस बढ़ोतरी की चर्चा काफी पहले से चल रही थी, इसलिए एक्सपर्ट्स का कहना है कि महज दरों का बढ़ना ही इकलौती सुर्खी नहीं होगी। असल नजर इस बात पर रहेगी कि गवर्नर अपनी मौद्रिक नीति समीक्षा में आने वाले महीनों के लिए अर्थव्यवस्था और ब्याज दरों को लेकर क्या नया रोडमैप और संकेत सामने रखते हैं।

क्या कर्ज होंगे महंगे और बदलेगा आरबीआई का न्यूट्रल रुख?

एमपीसी की पिछली कई बैठकों के दौरान दरों को यथावत यानी बिना किसी बदलाव के बनाए रखा गया था, लेकिन इस बार आर्थिक मोर्चे पर दबाव साफ महसूस किया जा रहा है। अगर आज 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी पर अंतिम फैसला होता है, तो 5.5 फीसदी का नया रेपो रेट सीधे तौर पर आम उपभोक्ता के होम लोन, कार लोन की ईएमआई से लेकर समूचे बैंकिंग तंत्र की उधारी लागत पर सीधा असर डालेगा। चूंकि बाजार के बड़े हिस्से ने इस कदम को पहले ही भांप लिया है, इसलिए विश्लेषक यह परखना चाहते हैं कि भविष्य को लेकर केंद्रीय बैंक का रुख कितना आक्रामक रहता है। वित्तीय जानकारों के एक वर्ग का अनुमान है कि आरबीआई आगे भी एक और रेट हाइक की गुंजाइश का संकेत दे सकता है, जबकि दूसरे वर्ग में इस बात को लेकर बहस जारी है कि क्या केंद्रीय बैंक अपने मौजूदा न्यूट्रल यानी तटस्थ रुख में कोई बड़ा बदलाव करने जा रहा है।

महंगाई के चढ़ते पारे ने बढ़ाई नीति निर्माताओं की चिंता

केंद्रीय बैंक के इस सख्त रवैये के पीछे सबसे बड़ा ट्रिगर खुदरा महंगाई के हालिया आंकड़े बनकर उभरे हैं। आरबीआई ने अपनी पिछली समीक्षा बैठक में चालू वित्त वर्ष 2027 के लिए खुदरा महंगाई (सीपीआई) का सालाना अनुमान 5 फीसदी निर्धारित किया था। हालांकि बीते दो महीनों के आंकड़ों ने चिंता की लकीरें गहरी कर दी हैं। जहां जुलाई के दौरान खुदरा महंगाई दर 4.45 फीसदी दर्ज की गई थी, वहीं अगस्त में यह तेजी से उछलकर 4.82 फीसदी के स्तर पर पहुंच गई। अब वित्तीय बाजार यह बारीकी से देख रहा है कि क्या केंद्रीय बैंक अपने सालाना महंगाई पूर्वानुमान में कोई संशोधन करता है। आर्थिक विश्लेषकों के मुताबिक कमोडिटी और कच्चे माल की बढ़ती लागत अगर रोजमर्रा के उपभोग की दूसरी वस्तुओं पर असर डालती है, तो आने वाले समय में महंगाई का चौतरफा दबाव और ज्यादा गहरा सकता है।

7.8 फीसदी की मजबूत जीडीपी ग्रोथ और वैश्विक चुनौतियां

महंगाई के मोर्चे पर उभरती चिंताओं के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत रफ्तार ने नीति निर्माताओं को राहत की सांस जरूर दी है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में देश की अर्थव्यवस्था ने विश्लेषकों के अनुमानों को पीछे छोड़ते हुए 7.8 फीसदी की मजबूत विकास दर हासिल की है। हालांकि वित्त वर्ष की दूसरी छमाही को लेकर वैश्विक स्तर पर कुछ गंभीर चुनौतियां साफ नजर आ रही हैं। दुनिया भर के प्रमुख बाजारों में सख्त होती वित्तीय परिस्थितियां और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की चढ़ती कीमतें आने वाले दिनों में देश की वृद्धि दर को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे नाजुक मोड़ पर आरबीआई के सामने यह सुनिश्चित करने की दोहरी चुनौती होगी कि ब्याज दरों को बढ़ाने का कदम देश की तेज आर्थिक विकास रफ्तार को कहीं कुंद न कर दे।

बैंकिंग सिस्टम की अतिरिक्त नकदी पर कड़ा नियंत्रण

रेपो रेट के निर्धारण के अलावा केंद्रीय बैंक के सामने बैंकिंग सिस्टम में मौजूद भारी नकदी यानी लिक्विडिटी सरप्लस को नियंत्रित करना भी एक बड़ी परीक्षा साबित हो रहा है। सितंबर के दौरान बैंकिंग व्यवस्था में लिक्विडिटी का स्तर बढ़कर करीब 12 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड दायरे तक पहुंच गया था। इस भारी नकदी को संतुलित करने के लिए केंद्रीय बैंक ने ओपन मार्केट ऑपरेशंस (OMO) के तहत सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री और वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) नीलामियों का सहारा लिया। केंद्रीय बैंक के इन कदमों के चलते बैंकिंग सिस्टम का नकदी अधिशेष घटकर 4 से 6 लाख करोड़ रुपये के दायरे में आ सका। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 6 अक्टूबर को बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी सरप्लस 5.03 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया था, जिसे संतुलित बनाए रखना आने वाले दिनों में भी आरबीआई की प्राथमिकताओं में शुमार रहेगा।

 

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