
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) इस वक्त अपने सबसे दिलचस्प और संवेदनशील मोड़ पर खड़ी है। पार्टी के भीतर यह संघर्ष सत्ता या संगठन को लेकर नहीं, बल्कि इस गहरे असमंजस का है कि मायावती के बाद गद्दी किसे सौंपी जाए। बसपा सुप्रीमो भले ही सार्वजनिक मंचों से यह दोहराती रही हों कि पार्टी और बहुजन समाज का हित ही उनका एकमात्र लक्ष्य है, लेकिन हकीकत यह है कि राजनीतिक उत्तराधिकारी की उनकी तलाश अपने ही परिवार की चौखट पर आकर सिमट जाती है। अपने छोटे भाई आनंद कुमार के बच्चों के इर्द-गिर्द घूमती इस तलाश में फैसलों के बार-बार पलटने से न केवल पार्टी का जमीनी कैडर असमंजस में है, बल्कि विरोधी दलों को भी हमले का भरपूर मौका मिल गया है।
पार्टी कमजोर, मगर संगठन पर मायावती की मजबूत पकड़
भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों पर किसी एक परिवार का एकाधिकार कोई नई बात नहीं है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक अधिकांश क्षेत्रीय दलों में शीर्ष नेतृत्व के ढलान पर उत्तराधिकार को लेकर खींचतान और कलह देखी गई। चाहे बात आंध्र प्रदेश में तेलगु देशम की हो, तमिलनाडु में द्रमुक, कर्नाटक में जेडी(एस), महाराष्ट्र में शिवसेना-राकांपा, बिहार में राजद, झारखंड में झामुमो या फिर यूपी में समाजवादी पार्टी की—सत्ता हस्तांतरण के दौर में हर जगह टकराव हुआ और जो गुट ताकतवर निकला, उसने पार्टी की कमान संभाली।
बसपा का मिजाज इन सबसे जुदा रहा है। कांशीराम ने अपने राजनीतिक जीवन में मायावती को अपना निर्विवाद वारिस घोषित किया। मायावती के नेतृत्व में पार्टी ने तीन बार गठबंधन और 2007 में पूर्ण बहुमत की ऐतिहासिक सरकार बनाई। हालांकि, इस लंबे सियासी सफर में पुराने दिग्गज और बड़े चेहरे धीरे-धीरे पार्टी से किनारे होते गए। चुनावी मोर्चे पर पार्टी लगातार कमजोर हुई—संसद में बसपा का खाता खाली हो चुका है और यूपी विधानसभा में वह केवल एक विधायक पर सिमट गई है। इस ऐतिहासिक गिरावट के बावजूद संगठन और फैसलों पर मायावती की पकड़ आज भी पूरी तरह अटूट है।
प्रतिद्वंद्वी साध रहे 2027 का समीकरण, बसपा में वारिस की खोज
मिशन 2027 को लेकर उत्तर प्रदेश का सियासी पारा चढ़ने लगा है। भारतीय जनता पार्टी अपनी तीसरी पारी की तैयारी में जुटी है, तो समाजवादी पार्टी पूरे दमखम के साथ सत्ता में वापसी का ताना-बाना बुन रही है। वहीं, राज्य की तीसरी अहम धुरी रही बसपा की चर्चा उसकी चुनावी रणनीति के बजाय उत्तराधिकारी को लेकर मचे घमासान के कारण हो रही है।
विरोधी दलों की फिक्र इस बात की नहीं है कि बसपा का अगला चेहरा कौन होगा, बल्कि उनकी नजर मायावती के कोर वोट बैंक में सेंधमारी करने पर टिकी है। दूसरी तरफ, मायावती अपना बिखरता जनाधार समेटने की जगह वारिस तय करने की आंतरिक उलझन से जूझ रही हैं। वे बार-बार बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर और कांशीराम के सिद्धांतों का हवाला देकर कहती हैं कि बहुजन समाज ही उनका परिवार है और पार्टी किसी की निजी जागीर नहीं है। मगर जब बात नेतृत्व सौंपने की आती है, तो नजरें केवल भाई के परिवार पर टिक जाती हैं। वे इस फैसले को अपने बाद के भरोसे नहीं छोड़ना चाहतीं।
कभी आकाश, कभी दीपिका तो कभी ईशान: 8 दिनों में बदले समीकरण
बसपा के शक्ति केंद्र में नाम बदलने का सिलसिला लगातार जारी है। सबसे पहले भतीजे आकाश आनंद को लॉन्च किया गया, उन्हें नेशनल कोऑर्डिनेटर बनाकर अपना आधिकारिक उत्तराधिकारी घोषित किया गया। इसके बाद अचानक उन्हें पद से हटा दिया गया, फिर माफी के बाद वापसी हुई और जिम्मेदारियां मिलीं। लेकिन लोकसभा चुनाव के दौरान उनके बयानों और शादी के बाद के घटनाक्रमों को आधार बनाकर मायावती ने उन्हें फिर बाहर का रास्ता दिखा दिया। इस दौरान उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ पर भी पार्टी में दखल देने के आरोप लगे।
इसके बाद छोटे भतीजे ईशान आनंद की एंट्री हुई। मगर महज कुछ ही दिनों के भीतर मायावती ने बयान दिया कि दोनों भतीजों को संगठन से दूर रखा जाएगा और जरूरत पड़ने पर उनकी बहन दीपिका आनंद को आगे किया जा सकता है। सस्पेंस यहीं खत्म नहीं हुआ; 20 सितंबर को मायावती ने एक बार फिर रुख बदलते हुए आकाश और दीपिका दोनों को जिम्मेदारियों से बाहर रखने और ईशान आनंद को संगठन में सम्मानजनक भूमिका देने का एलान कर दिया। लगातार बदलते इन फैसलों ने पार्टी समर्थकों को हैरान कर दिया है कि आखिर अंतिम फैसला कब होगा।
2007 का शिखर और फिर लगातार गिरता जनाधार
कांशीराम ने जब बसपा की नींव रखी थी, तब उनका मूल दर्शन ‘व्यक्ति से बड़ा मिशन और परिवार से बड़ा समाज’ था। दलितों, पिछड़ों और अकलियतों को सत्ता में वाजिब हिस्सेदारी दिलाने के इस आंदोलन की सबसे सशक्त नेता बनकर मायावती उभरीं। 2007 में बसपा ने जब 30.43 प्रतिशत वोट पाकर 403 में से 206 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत हासिल किया, तब पार्टी देश के सबसे बड़े सूबे में सत्ता की सबसे मजबूत धुरी बन चुकी थी।
इसके बाद पार्टी का चुनावी ग्राफ लगातार नीचे की ओर लुढ़कता चला गया। 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा 80 सीटों और 25.95 प्रतिशत वोट पर आ गई। 2017 में यह घटकर 19 सीटें (22.23% वोट) रह गई और 2022 में पार्टी 12.88 प्रतिशत वोट के साथ महज 1 सीट पर सिमट गई। लोकसभा में भी यही स्थिति रही—2004 में 19 और 2009 में 20 सीटें जीतने वाली बसपा 2014 में शून्य पर रही। 2019 में सपा के साथ गठबंधन के सहारे 10 सीटें जरूर मिलीं, लेकिन 2024 में अकेले लड़कर पार्टी खाता तक नहीं खोल सकी और उसका वोट शेयर घटकर 9.39 प्रतिशत रह गया। आंकड़े साफ गवाही देते हैं कि पार्टी पर मायावती का नियंत्रण भले ही सौ फीसदी हो, लेकिन जनता के बीच उनका आधार तेजी से खिसका है।
आंदोलन से परिवार तक: क्या है कैडर की सुस्ती का कारण?
बसपा के कमजोर होने के पीछे कई बड़े राजनीतिक कारक रहे हैं—दलित राजनीति में नए चेहरों का उभार, भाजपा और सपा द्वारा गैर-जाटव व अन्य वर्गों में सफल सेंधमारी और चुनावी समीकरणों का बदलना। इन चुनौतियों के सामने बसपा का पारंपरिक आक्रामक तेवर नदारद दिखा। पार्टी का इतिहास रहा है कि जैसे ही कोई नेता मीडिया या जनता में लोकप्रिय होने लगता है, उसे अनुशासनहीनता के नाम पर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।
इसके अलावा, चुनावी रैलियों को छोड़ दें तो जनता के मुद्दों पर जमीन पर उतरकर संघर्ष करने और कैडर को सड़क पर सक्रिय रखने की परंपरा लगभग ठप पड़ चुकी है। जमीनी संघर्ष के अभाव और पारिवारिक फैसलों के सार्वजनिक तमाशे ने कार्यकर्ताओं के मनोबल पर गहरा असर डाला है।
पारंपरिक परिवारवाद से अलग हटकर शुरू हुआ बहुजन आंदोलन आज उसी मोड़ पर खड़ा है, जिसकी आलोचना कभी बसपा के मंचों से की जाती थी। सवाल यह नहीं है कि मायावती के बाद बसपा का क्या होगा, सवाल यह है कि आकाश, ईशान और दीपिका की इस सियासी म्यूजिकल चेयर में पार्टी का मूल मिशन कहां गुम हो गया है।
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