Tuesday , 29 September 2026

₹3 हजार की दवा ₹27 हजार में: सुप्रीम कोर्ट की निजी अस्पतालों पर तीखी टिप्पणी, कहा- ‘सेवा नहीं, उद्योग बन चुके हैं कॉरपोरेट हॉस्पिटल’

नई दिल्ली। देश के निजी और कॉरपोरेट अस्पतालों द्वारा दवाओं पर मनमाना मुनाफा वसूलने और मरीजों की जेब पर पड़ रहे भारी बोझ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। मंगलवार को मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने तीखी टिप्पणी की और कहा कि आज कई कॉरपोरेट अस्पताल मरीजों की सेवा करने वाले संस्थान रहने के बजाय विशुद्ध उद्योग (इंडस्ट्री) की तरह काम कर रहे हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने केंद्र सरकार और संबंधित विभागों से सवाल किया कि दवाओं की खरीद लागत और अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) में जमीन-आसमान के इस अंतर को खत्म करने के लिए ठोस नियम क्यों नहीं बनाए जा रहे हैं।

कैंसर की दवा का उदाहरण: PTR ₹2,700 और MRP ₹27,000 क्यों?

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कैंसर की एक दवा का उदाहरण देते हुए दवाओं के मूल्य निर्धारण में चल रही मनमानी का पर्दाफाश किया। पीठ ने उल्लेख किया कि जिस दवा का प्राइस टू रिटेलर (PTR यानी खुदरा विक्रेता के लिए खरीद मूल्य) करीब ₹2,700 है, उस पर अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) ₹27,000 दर्ज किया जा रहा है।

अदालत ने कहा कि कॉरपोरेट अस्पताल मरीजों को अपनी ही इन-हाउस फार्मेसी से दवा खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। स्थिति इतनी गंभीर है कि अगर कोई मरीज या उसका तीमारदार बाहर के किसी केमिस्ट से सस्ती दरों पर वही दवा खरीदकर लाता है, तो अस्पताल इलाज के नतीजों की जिम्मेदारी और गारंटी लेने से ही इनकार कर देते हैं।

सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं पर असर: ‘अस्पतालों का मुनाफा, टैक्सपेयर्स पर भारी बोझ’

खंडपीठ ने इस अंधाधुंध मुनाफे को केंद्र और राज्य सरकारों की स्वास्थ्य योजनाओं से जोड़ते हुए बड़ा सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि जब कोई मरीज किसी सरकारी स्वास्थ्य योजना के तहत प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराता है, तो अस्पताल ₹3,000 की वास्तविक लागत वाली दवा का बिल ₹27,000 बनाकर सरकार से क्लेम करता है।

अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि यह अतिरिक्त राशि सीधे तौर पर देश के आम करदाताओं (टैक्सपेयर्स) की गाढ़ी कमाई से जाती है। पीठ ने पूछा कि जब पैसा जनता का खर्च हो रहा है, तो दवाओं के उचित मूल्य और अस्पतालों के प्रॉफिट मार्जिन को नियंत्रित करने के लिए पूरे देश में एक पारदर्शी और समान नियम क्यों नहीं लागू किया जा सकता?

जरूरी और गैर-जरूरी दवाओं के फर्क पर सवाल, 16% मार्जिन की सीमा तय करने का सुझाव

सुप्रीम कोर्ट ने मूल्य नियंत्रण के मौजूदा ढांचे पर भी सवाल खड़े किए। पीठ ने केंद्र सरकार से पूछा कि नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स (NLEM) के तहत आने वाली अनुसूचित आवश्यक दवाओं और गैर-अनुसूचित (Non-scheduled) दवाओं के मूल्य निर्धारण में इतना बड़ा अंतर क्यों रखा गया है?

अदालत ने केंद्र को सुझाव दिया कि क्या सभी दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य पर 16 प्रतिशत के फिक्स्ड प्रॉफिट मार्जिन की सीमा तय नहीं की जा सकती? कोर्ट ने सरकार को इस पूरे प्राइसिंग फ्रेमवर्क पर गंभीरता से पुनर्विचार करने का निर्देश दिया।

भारी अंतर से मरीजों में भरोसे का संकट: ‘सस्ती दवा को नकली समझने लगते हैं लोग’

कीमतों में 900 से 1000 प्रतिशत के इस अंतर के मनोवैज्ञानिक पहलू को रेखांकित करते हुए जजों ने गहरी चिंता व्यक्त की। पीठ ने कहा कि अगर कोई ईमानदार केमिस्ट ₹27,000 एमआरपी छपी हुई दवा को उसकी वास्तविक लागत यानी ₹3,000 में किसी मरीज को देने की पेशकश करता है, तो मरीज को सबसे पहले यह शक होने लगता है कि कहीं दवा नकली या घटिया गुणवत्ता की तो नहीं है। कीमतों का यह बेतुका अंतर बाजार में दवाओं की प्रामाणिकता और मरीजों के भरोसे का गंभीर संकट खड़ा कर रहा है।

केंद्र सरकार का पक्ष: ‘संतुलित समाधान निकालेंगे’, 12 अक्टूबर को अगली सुनवाई

केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत की चिंताओं से सहमति जताई और माना कि इस समस्या का समाधान निकालना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि सरकार को फार्मा उद्योग, अस्पताल और मरीजों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाते हुए एक व्यावहारिक रास्ता तलाशना होगा। इसके लिए संबंधित मंत्रालयों और अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय विमर्श किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को नीतिगत जवाब तैयार करने के लिए समय देते हुए मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर तय की है।

क्यों हो रही है सुनवाई? क्या है किशन चंद जैन की याचिका

सर्वोच्च अदालत यह अहम सुनवाई किशन चंद जैन द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर कर रही है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि:

  • डॉक्टरों के लिए ब्रांडेड के बजाय जेनेरिक दवाइयां लिखना अनिवार्य किया जाए।

  • गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमतों पर निर्माण स्तर से ही सख्त कैपिंग और मूल्य नियंत्रण लागू हो।

  • सभी मेडिकल डिवाइसेज और उपकरणों का अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) पारदर्शी तरीके से तय किया जाए।

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